अंतर्नाद - नारायण प्रसाद ठाकुर

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा:कन्हैया साहू
प्रथम संस्करण : 2015
मूल्य : 150 रुपये
कॉपी राइट : लेखकाधिन
ISBN- 81-89244-02-7
BY :
Published by
Vaibhav Prakashan
Amin Para, Purani Basti
Raipur, Chhattisgarh  (India)
First Edition : 2015
Price: Rs.150

अंतर्नाद
समर्पण
मनोज ठाकुर (पुत्र)
श्रीमती भावना ठाकुर (पुत्रवधु)
सुरेन्द्र ठाकुर (पुत्र)
श्रीमती अमरजीत ठाकुर (पुत्रवधु)
मिथलेश ठाकुर (पुत्र)
श्रीमती अनुभूति ठाकुर (पुत्रवधु)
अशोक सराठे (दामाद)
श्रीमती मंजुला सराठे (पुत्री)
अंतर्नाद के बारे में...

लगता है कि कविता और दर्द का रिश्ता बहुत करीब का है। तभी तो 'आह से उपजा होगा गानÓ जैसी पंक्तियों की उत्पत्ति हुईं। अन्र्तमन में भाव हों और संवेदनाएं आलोडि़त होने लगें, समष्टि का दर्द स्वयं में सुनाई दे तो कविता बेबुलाऐ ही दौड़ी चली जाती है और झंकृत कर देती है समूचे अस्तित्व को।
'अंतर्नादÓ में उसी दर्द का नाद कई-कई रूपों में सुनने को मिला है। यों इसको रचयिता नारायण प्रसाद ठाकुर भिलाई इस्पात संयंत्र की भट्टिों से तपकर निकले हैं। इसीलिए दर्द के साथ-साथ कठिन परिश्रम व गीता के कर्मयोग से साधने वाली कविताएं भी लगता है स्वमेव फूट पड़ी हैं। वे अध्यात्म के कवि भी कहे जा सकते हैं। उनकी कविताओं में पुकार है। वह पुकार जो ईश्वर के साथ-साथ प्रकृति से भी उन्हें सीधे जोड़ती है।
अंतर्नाद की समस्त कविताएं पठनीय हैं। इसलिए भी कि नारायण प्रसाद ठाकुर स्वयं में सादा जीवन उच्च विचार का मंत्र आत्मसात करने वाले जीव हैं। उसकी प्रतिध्वनि है अंतर्नाद।
इस कविता संग्रह के लिए मेरी अशेष शुभकामनाएं और भी संग्रह लिखने के लिए उनकी सह धर्मिणी श्रीमती विराज रानी ठाकुर कविता के समान ही उनसे सम्पृक्त होकर सम्बल देती हैं यह भी ईश्वरीय कृपा है।

शिवनाथ शुक्ल
वरिष्ठ पत्रकार एवं सहित्यकार
लिंक रोड, कैंप-2
भिलाई (छत्तीसगढ़)

इस्पात नगरी की यह 'अंतर्नादÓ

यूं तो भिलाई को लघु भारत के रुप में जाना जाता है, क्योंकि यहाँ देश के अलग-अलग राज्यों के लोग निवास करते हैं, अपनी प्रतिभाओं की धनुषी सतरंगी किरणें बिखरने वाली यहां की प्रतिभाओं ने ना केवल शिक्षा बल्कि कला, संस्कृति, साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। और वह परंपरा आज भी निर्बाध रुप से पल्लवित, पुष्पित हो रही है उन्हीं में से एक साहित्य प्रतिभा के समृद्ध व्यक्तित्त्व हैं कवि नारायण प्रसाद ठाकुर। जिन्होंने भिलाई इस्पात संयंत्र में अपनी सेवायें देते हुए इस्पात नगरी की साहित्य परंपरा को राष्ट्र पटल पर 'अंतर्नादÓ के रुप में उकेरना का कार्य किया है।
मित्रों एक कवि की 'अंतर्नादÓ ना केवल समाज के हर वर्ग के लिए उपयोगी सिद्ध होती है, बल्कि समाज को आईना दिखाकर समाज की बुराईयों से लोगों को मोड़कर अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरित करती है। भारत की स्वतंत्रता में जितना योगदान देशभक्त क्रांतिकारी जवान शहीदों का रहा है, उतना ही योगदान यहां के कवि, साहित्यकार तथा पत्रकारों का भी रहा है, जिन्होंने हमेशा देश की स्वतंत्रता के लिए माँ भारती के बेटों को उठ खड़ा होने के लिए जागृत करने का कार्य किया।
जब मुझे पता चला कि उसी साहित्य परम्परा को आगे बढ़ाते हुए कवि नारायण प्रसाद ठाकुर ने 'अंतर्नादÓ (काव्य संग्रह) का प्रकाशन कर रहें हैं, मैं उस समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन (10 सितम्बर 2015) में भाग लेने आया हुआ था। मुझे यह सूचना अत्यन्त प्रसन्न कर देने वाली थी। मैं इस्पात हिन्दी साहित्य संसद एवं छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद की ओर से ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हुं।
इस्पात नगरी की यह 'अंतर्नादÓ विश्व के मानचित्र पर साहित्यिक अंर्तस्वर बनकर उभरेगी।
शुभकामनाओं सहित.
तुंगभद्र राठौर
वरिष्ठ साहित्यकार
प्रांतीय सचिव: छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद
अध्यक्ष : इस्पात हिन्दी साहित्य संसद

(चंद शब्द लेखक के नाम)

आध्यात्म जगत में 'अंतर्नादÓ वह नाद है जिसकी व्यापकता अखिल ब्रह्माण्ड में स्थित है, तभी तो ऋषि परम्पराओं से गौरवान्वित हमारे भारत के दार्शनिकों ने बाह्य जगत में व्याप्त निनाद, स्वर लहरियों को, जीव के अन्तस की स्वर लहरियों के समूह को 'जीवात्माÓ तथा बाह्य जगत के स्वर को 'परमात्माÓ की संज्ञा दी, जहां जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों का समावेश हो जाये उसी शक्ति का नाम 'नादब्रह्मÓ है । जब भी व्यक्ति एकान्त में दत्तचित्त हो शरीर के बाह्य छिद्र जैसे नाक, कान तथा नेत्र आदि को बन्द कर अपने शरीर के अन्दर के स्वर (नाद ब्रह्म) में डूबता है, और उस समय जिन स्वर लहरियों की धुन को सुनते हुए उन अनुभवगम्य प्रवाह को लेखनीबद्ध कर लौकिक जगत अर्थात संसार को अवगत कराता है वही 'काव्यÓ है, मुनष्य के अन्तस से निकली नाद जिसे आप अन्तर्नाद के रुप में जानते हैं । प्रस्तुत है कवि नारायण प्रसाद ठाकुर के अन्तस से निकली स्वर लहरियों की यह काव्य रचना 'अंतर्नादÓ।
जीवन में हो रही हर छोटी बडी चीजों को व्यक्ति देखता सुनता और समझने की कोशिश करता है, लेकिन समय की रफतार में मानों हर चीजें तेजी से आती हैं और उसी रफ्तार से निकल जाती है। समय का ये पहिया वर्षों से इसी तरह से दौड़ रहा है और असंख्य जीवन चल रहे हैं । वक्त के साथ लोगों की प्राथमिकताएं भी हर पल बदल रही है। लेकिन इस समाज के कुछ ऐसे जागरूक लोग भी है जो समाज की हर चीजों की ओर बारीकी से देखते समझते और महसूस करते है। उन्हीं में से एक हैं 'नारायण प्रसादÓ ठाकुर। वर्तमान में समाज का अनुभव 'दशहरे के पावन पर्व परÓ 'अंतर्नादÓ को कलमबद्ध कर काव्य के रुप में कवि नारायण इस प्रकार अपनी अंतर्नाद को प्रकट किये हैं-
भारत की संस्कृति विकास की,
हो रही सत्यानाश़।।
क्योंकि आज लोगों को मन में,
बना हुआ रावण का वास।। 01।।
भारतीय संस्कृति का उल्लेख करते हुए हमारी पुरातन परम्पराओं को पुन: अग्रसरित करने पर बल दिया, क्योंकि भारतीय संस्कृति पारस्परिक भाईचारे के ढ़ांचे पर खड़ी एक इमारत है जिसकी नींव सत्य, अहिंसा तथा प्रेम है, वहीं मर्यादा रुपी गारा तथा विधर्मियों को दण्ड दिये जाने रुपी चुना का मिश्रण है, और इसी इमारत का नाम 'भारतीय संस्कृतिÓ है।
आगे इन्होने इसी कड़ी में आज के युवा साथियों को आवाहित करते हुए कहा कि-
उठो ए वीर जवानों,
पुन: जागृति लाना है।।
रावण रुपी सब दुर्गुण को,
जन से मार भगाना है।।05।।
जहां वेदांत इस बात की घोषणा करता हैं वहीं आध्यात्म जगत में शिखरस्थ यह सूत्र 'आत्मा परमात्मा चेतिÓ जो आत्मा के परिष्कृत रुप की शूचिता की अन्तिम पराकाष्ठा तक पहुंचने के बाद साधारण मानव जाति को भी परमात्मा बना देती है, जैसे भागवान राम, कृष्ण आदि, तो इससे यह प्रतिष्ठित होता है कि 'नरÓ में 'नारायणÓ छिपा होता है और हर आत्मा में परमात्मा का वास होता है।
इस गूढ़ रहस्य का अनुभव करने व अपने शिष्य जनों को वहां तक पहुंचने का मार्ग बतलाने वाले ही तो गुरु, ऋषि तथा महर्षि कहलाते हैं, और उन्हें परम संत कबीरदास जी कहते हैं कि-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काकू लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताये।।
अर्थात् समाज को आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक सुखद जीवन जीने की सूत्र को बताने वाले गोविन्द से भी बड़े होते हैं उनका प्रथम नमन, वन्दन करना चाहिए। अत: उन्हीं भावनाओं को लेखनी बद्ध तरीके से इस कविता के माध्यम से कम शब्दों में जीवन को आत्मा से परमात्मा तक की उड़ान भरने के सीख देतें है- कवि ने संत जीवन (महापुरुषों) पर केन्द्रीत अपनी अन्तस के उद्गार में कुछ इस प्रकार लिखते हैं-
निंदा एक ऐसी ज्वाला है,
जिससे बचते न सभी कोई।।
हो पुरुष कोई कितना महान,
पर बचते नहीं सुनो कोई।। 03।।
यह समाज में स्वयंभू तथाथित महापुरुषों पर व्यंगात्मक टिप्पणी है साथ ही उन्होनें आगे कहा कि-
है संत स्वभाव उदार महा,
जो दया सभी पर करते हैं।।
दुर्जन करते उनकी निन्दा,
उपकार तब भी, वे करते है।।08।।
कवि के कृति में कवि की आकृति दिखनी चाहिए और वह मैने कवि नारायण प्रसाद ठाकुर के दैनिक दिनचर्या में हमें बखूबी मिलता है साल के 365 दिन 24 घंटे और सातों दिन सिर्फ ये अपनी आत्मा से परमात्मा की बातें करते नहीं थकते । जहाँ उनकी लेखनी शब्दों की सहजावस्था को उकेरती है वहीं सरल बोधगम्य बुंदेलखण्डी शब्दों का सम्मिलन जैसे 'घड़ौनाÓ शब्द दिखता है जैसे उन्होंने 'मानव तनÓ के संदर्भ में कहा है कि-
अन्दर यह बड़ा ही घिनौना,
माँस हड्डी का है ये खिलौना।।
चाम ऊपर से ही है सलौना।।
है भरा मल-मूत्र से घड़ौना।। 03 एवं 04।।
और वही इनके स्वभाव भी सहजता से सरल और व्यवहार कुशलतापूर्ण 82 बसंत के पड़ाव पर उनकी यह कृति 'अन्तर्नादÓ में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। वास्तव में हम हिन्दी साहित्य की सुरम्य वाटिका के मंद, सुगंध तथा बयार के हलके झोंकों से आधिभौतिक शांति एवं उल्लास की अनुभूति प्रकृति-ईश्वर की पारस्परिक तारतम्यता का बोध कराती हैं वहीं कवि नारायण प्रसाद जी के इस कृति में कविताओं के श्रृंखला में 'बसन्त बहारÓ 'प्रेमÓ भिलाई दर्शन, ईश्वरोपासना, देशभक्ति, पेट, समय का फेर आदि कविताओं में भिन्न-भिन्न साहित्य के रसों के आश्वादन किया जा सकता है ।
यदि वीर रस की चर्चा की जाय तो पाकिस्तान के द्वारा बार-बार सीमा पार से सी•ाफायर उलंघन से जब-जब हमारे देश के जवान शहीद होते हैं तो केवल शहीद के घर वाले ही दु:खी नहीं होते बल्कि कवि का कोमल हृदय भी तिक्ष्ण हो शब्द रुपी शस्त्र से कैसे प्रहार करता है देखिये इन पंक्तियों में-
नाम नवाज़ शरी$फ मगर, शराफत का है काम नहीं,
बाज़ न आते इस हरकत पर, इसमें कोई लिहाज नहीं।।
पहन लिबाज सराफत का हरदम करते गद्दारी है,
ऐसे बे-ईमान दोस्त से, रखो वरना कभी यारी है।।02।।
यह उस समय की कविता जब भिलाई लाडला कौशल यादव कारगील युद्ध में दुश्मनों को मुंहतोड़ जबाब देते हुए शहीद हो गये थे, उस समय कवि नारायण प्रसाद जी भी इतने आहत हुए की उन्होंने वीर रस में जहां पाकिस्तान को ललकारा वहीं भारत के शहीद जवानों के प्रति अपनी संवेदना करुण रस में लेखनीबद्ध किया।
कवि की लेखनी ने समाज में नैतिक शिक्षा के हो रहे पतन, तथा प्रेरणास्त्रोत महापुरुषों के जीवनगाथा पढऩे व समझने से वंचित युवाओं में जिस प्रकार निराशा घर कर जाती है और वे संघर्ष करने के बजाय आत्महत्या जैसे गलत कदम उठा लेतें हैं उन पर भी कवि नारायण लिखते हैं कि-
धीर वीर बनकर रहो, करो नन आत्मघात।
प्रभु ने यह तन दिया है, सखो प्रभु से नात।।
अर्थात् युवाओं को धीर, वीर बनने की सीख देते हुए उन्हें आत्महत्या जैसे कुकृत्य को गलत बताते हैं। यह समाज को आशावादी बनाने की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रुप में माना जा सकता है।
कुल मिलाकर हमें तो इस काव्य संग्रह में हिन्दी साहित्य के वे सभी रस मिलते हैं जिन्हें एक पाठक ढ़ूंढ़ता है, अब सुधि पाठकों पर निर्भर करता है कि वे 'अंतर्नादÓ के इन स्वर लहरियों रुपी रसालय (रससागर) में वे कितनी गहराई में गोता लगाकर रसों का आश्वादन कर पाते हैं।
श्री प्रसाद जी यह कृति ना केवल साहित्य जगत के लिए महत्त्वपूर्ण है बल्कि आज के सभी परिवेश में हम युवा साथियों को आध्यात्मिक चेतना का संचार करती रहेगी।
कवि नारायण के इस कृति को देखकर मैं स्वरचित यह रचना समर्पित करता हूं -
लाल कहाँ हो भारत, 'अंतर्नादÓ पुकारती है,
उद्गार है, उद्घोष, और जयघोष है।।
अहंकारी मदमस्त मांद पर गाज़ है,
आर्यभूमि को जगाने वाली ज्ञानचक्षु की थाप है।। 01।।

भूले पथिक, भटके रसिक, अटके हुए भ्रमजाल में,
काश़्ा ज़माने में यूँ होता अन्तर्मन में नाद जहाँ। हर माँ कौशिल्या होती, राम होते संसार में,
कृष्ण, बुद्ध और विवेकानन्द, गांधी का 'अन्तर्नादÓ जहाँ।। 02।।

उस जहां में उदय हो रहा इण्डिया का,
भारत ही इण्डिया है या इण्डिया ही है भारत।।
पश्चिमी की सभ्यता पाशविक मनमोहनी,
लाल कहाँ हो भारत, 'अंतर्नादÓ पुकारती।।03।।

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे,
संपादक- 'ज्योतिष का सूर्यÓ राष्ट्रीय मासिक पत्रिका
पता: जीवन ज्योतिष भवन, सड़क नं.26,
कोहका मेन रोड, शांतिनगर, भिलाई
जिला- दुर्ग (छ.ग.)-490023,
चलित दूरभाष-09827198828

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