अद्वितीय रचनाकार माधवराव सप्रे

डाॅ. सच्चिदानंद जोशी
चिंतन की त्रिवेणी - माधवराव सप्रे
प्रखर पत्रकार, हिंदी सेवी और अनन्य राष्ट्र भक्त पं. माधवराव सप्रे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। हिंदी भाषा को सेवा व्रत उन्होंने आजन्म निभाया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पूरी क्षमता राष्ट्रवादी चेतना के विकास में लगा दी। इसके लिये उन्होने लेखन की अलग अलग विधाओं का सहारा लिया। पत्रकारिता, साहित्य साधना, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक चिंतन और इतिहास चिंतन सभी में सप्रेजी का राष्ट्रवादी भाव उभरकर सामने आता था। वे अपने लक्ष्य के प्रति इतने ज्यादा जागरूक और समर्पित थे कि उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि इस लेखन से उन्हें व्यक्तिगत लाभ कितना और कैसे होने वाला है। उन्होंने कई नवोदित लेखकों को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और उनका मार्गदर्शन भी किया। उन्होंने अलग भाषाओं के ऐसे प्रसिद्ध लेखों का अनुवाद करने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई, जिससे समाज में राष्ट्रीय चेतना जागृत होती हो। इसमें ऐसे कई लेख है जिनका अनुवाद यदि सप्रेजी नहीं करते तो हिन्दी भाषी पाठक उनके बारे में जान भी नहीं पाते। इससे एक बात और भी साबित होती है कि सप्रेजी में जबर्दस्त अध्ययन क्षमता थी। सप्रेजी अपने सृजन और रचानाकर्म के माध्यम से नवजागरण अलख जगाने वाले अद्वितीय रचनाकार थे।
सप्रे जी का पत्रकारिता का चिंतन उन्हें एक महान् राष्ट्रवादी विचारक एवं कुशल नेतृत्व का निर्माता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन सप्रेजी का दायरा इसमें ही सीमित नहीं था। उन्होंने अपने जीवन में विभिन्न साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विषयों पर भी लिखा है जिसका भी बहुत व्यापक स्वागत हुआ।
सप्रेजी का साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिंतन पृथक से उनके इन विषयों पर प्राप्त अधिकार को प्रदर्शित करता है साथ ही यह भी दर्शाता है कि उनका सोच समग्रता में ऐसे राष्ट्रवादी समाज का निर्माण था, जिसमें साहित्य, समाज और संस्कृति तीनों का अद्भुत समन्वय हो।
सप्रेजी ने जिस तरह अपने जीवन में राष्ट्र के लिये समर्पित व्यक्तियों का निर्माण किया उसी तरह उन्होंने विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं का निर्माण भी समाज हित में किया। यह सप्रे जी का समाज के लिये एक महान अवदान था।
इसके अलावा सप्रेजी ने अपने आध्यात्मिक चिंतन से भावधारा को एक नई दिशा दी। यह सप्रेजी के ही अथक परिश्रम का परिणाम था कि हमें ‘दासबोध‘, ‘गीता रहस्य‘ जैसे महान मराठी गं्रथों के हिंदी अनुवाद पढ़ने को मिल सके हैं। ऐसे महान ग्रंथों को सरल हिंदी में अनुदित कर सप्रेजी ने ऐसा महान कार्य किया है जिसका ऋण चुकाना किसी भी समाज के लिये कठिन हैं। इन्हें हम एक ऐसे सार्थक परोपकार की श्रेणी में रख सकते हैं जिसमें व्यक्ति स्वयं को बिल्कुल परे रख कर सिर्फ देश और समाज के हित में ही सारे कार्य संपादित करता है। यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि सप्रेजी ने जिस समय में इन ग्रंथों का अनुवाद किया उसी समय में अपनी किसी मौलिक कृति की रचना कर कही अधिक यश और ऐश्वर्य अपने हिस्से में डाल सकते थे। लेकिन सप्रेजी ने कभी अपने हित, स्वयं के यश अथवा ऐश्वर्य का विचार नहीं किया। इसीलिये वे गं्रथों की अनुवाद रचना कर पाये।
सप्रेजी की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं इतिहास चिंतन ने समाज और देश का मार्गदर्शन किया और ऐसा संबल प्रदान किया जिसकी तत्कालीन भारतीय समाज को आवश्यकता थी। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि सप्रेजी के ऐसे चिंतन की आज प्रासंगिकता नहीं है। बल्कि सप्रेजी द्वारा किया गया चिंतन तो कालजयी है, जिसकी प्रासंगिकता हर युग में और हर समाज में बराबर बनी रहेगी।
सप्रजी ने विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर निरंतर लेख लिखे तथा समय समय पर समाज को ऐसे ज्वलंत विशयों से साक्षात्कार कराया जो बेहतर तथा कारगर जीवन को उत्प्रेरित करते हैं। सप्रेजी द्वारा लिखे गये लेखों में जीवन की सार्थक दृष्टि होती थी जो प्रेरणा देने का काम करती थी। विशेष बात यह है कि सप्रेजी ने किसी भी खास विषय से बँध कर लेखन न करते हुए स्वतंत्र विचार एवं विषयों का ऐसा व्यापक ताना बाना बुना जो उनके व्यक्तित्व और चिंतन की विराटता को उजागर करने मे सक्षम हुआ।
सप्रेजी का विचार एकांगी भी नहीं था। वे सदा सभी की दृष्टि से विचार किया करते थे। इसलिए वे सभी के लिए ग्राहय और अनुकरणीय थे। उस समय की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में सप्रेजी के लेखों का प्रकाशन यह दर्शाता है कि सप्रेजी की स्वीकार्यता सार्वत्रिक थी और उन्हें उस महानता के शिखर पर पहुँचाती थी, जहाँ पहुॅच पाना कई विचारकों के लिए संभव नहीं हो पाता।
सप्रेजी द्वारा लिखित पुस्तकों मंे भी उनके सामाजिक चिंतन की झलक हमें सहज ही देखने को मिलती है। हालाँकि ये पुस्तकें विषय केन्द्रित है, लेकिन सप्रेजी का सामाजिक भाव उनमें स्पष्ट दिखता है। सप्रेजी द्वारा जितने भी सामाजिक विषयों पर निबंध, लेख, टिप्पणियाॅ लिखी गई थी वे व्यापक चर्चा का विषय बनी। यही कारण है कि सप्रेजी से विभिन्न विषयों पर लेख लिखने के लिये निरंतर आग्रह किया जाता था। यह आग्रह भी प्रतिष्ठित लेखकों या स्थापित पत्रिकाओं के सम्पादकों द्वारा किया जाता था। इन लेखों के विषयों की व्यापकता प्रमाणित करती है कि सप्रेजी सभी विषयों पर समान अधिकार रखते थे।
जिस प्रकार सप्रेजी सामाजिक विषयों पर चिंतन कर अपने विचार लेखों के माध्यम से प्रस्तुत करते थे, उसी प्रकार वे गहन सांस्कृतिक चिंतन भी किया करते थे। भारतीय संस्कृति के गौरवशाली अतीत के वे निश्णात् अध्येता थे और उसी आधार पर वे तत्कालीन सांस्कृतिक परिस्थिति का आकलन किया करते थे तथा उस पर अपनी सारगर्भित टीप दिया करते थे। सप्रेजी के गहन गंभीर ऐतिहासिक चिंतन का प्रत्यक्ष प्रमाण ‘‘इतिहास चिंतन‘‘ में देखने को मिलता है।
‘माधवराव सप्रे का इतिहास चिंतन‘ में कुल 14 निबंध संकलित है जो भारत ही नहीं विश्व के अन्य प्रमुख देशों के इतिहास तथा उसमें सम्बन्धित प्रमुख घटनाओं के विषय में हमें जानकारी देते है। इस सारगर्भित चिंतन के माध्यम से सप्रेजी का एक ही अभीष्ट लक्ष्य था भारतीयों में राष्ट्रीयता का अलख जगाना। सप्रेजी में राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी थी। यही कारण था कि वे अपने देश के गौरवशाली अतीत के विशय में हमेशा कहा करते थे, जिस समय यूरोप खंड अज्ञानान्धकार में डूबा हुआ था और इंग्लंैड देश के निवासी निरी जंगली अवस्था में थे उस समय यह भारत भूमि बड़े-बड़े महात्मा और ऋशि-मुनियों के ज्ञान के प्रकाश से जगमगा रही थी। आध्यात्मिक ज्ञान, विज्ञान और साहित्य में इस देश की बराबरी कौन कर सकता था।
सप्रेजी की इतिहास के बारे में दृष्टि एकदम अलग थी और उनका लक्ष्य स्पष्ट था। वे इतिहास को गलत सलत या बढ़ा चढ़ा कर बताने के पक्षधर नहीं थे। वे ऐसा इतिहास प्रस्तुत करने में विश्वास रखते थे जो राष्ट्र के प्रति गौरव का भाव जगाता हो। वे ऐसे इतिहास के पक्षधर थे जो व्यक्तित्व निर्माण में सहायक हो। सप्रेजी का चिंतन कितना कालजयी है, इसका अंदाज उपर्युक्त कथन से ही हो जाता है, आज उनके अवसान के लगभग अठासी वर्ष बाद भी हमारी समाज व्यवस्था अभी तक उन्हीं बुनियादी बातों को टटोलकर उसमें प्रयोग कर रही है, जिनकी ओर सप्रेजी ने इंगित किया था। शिक्षा, संस्कृति, राजनीति और समाज व्यवस्था सभी विषयों पर सप्रेजी की लिखी बातें आज भी शाश्वित है। सप्रेजी का चिंतन और लेखन, राजनीति, समाज, संस्कृति, इतिहास, अर्थशास्त्र और अध्यात्म से जुड़ा है। इस दृष्टि से कहा जाये तो समग्रता में वे राष्ट्रीयता का ही सोच रखते थे। अलग अलग अंशों अथवा संदर्भो के माध्याम से देशोन्नति और राष्ट्रीयता का भाव किस प्रकार जगाया जा सकता है इसी का विचार सप्रेजी सदा किया करते थे।
सप्रेजी उन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों विशेषकर पाश्चात्य विचारों वाले इतिहासकारों की इस धारण को भी खंडित करते है कि भारत में ‘राष्ट्रीयता‘ के तत्व नहीं है और अनेक भिन्नताओं के कारण इसे राश्ट्र की संज्ञा नहीं दी जा सकती। ‘सरस्वती‘ के मार्च 1918 में प्रकाशित निबंध ‘भारत की एक राष्ट्रीयता‘ में सप्रेजी अपनी बात की तर्क एवं तथ्यों सहित विवेचना करते हुए यह सिद्ध करते है कि भारत एक राष्ट्र था और है। जहाँ वे भारत के गौरवशाली अतीत का स्मरण दिलाते है वहीं इसी लेख में एक स्थान पर वे वर्तमान स्थिति का विवेचन करते हुए आशा की किरण भी जगाते हैं, ‘‘भारतवर्ष की वर्तमान दशा को भी देखकर हमें हताश होने का कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता। हमारे देश में अब भी रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेखक, श्री रामकृष्ण परमहंस से आत्मज्ञानी, गोखले और मालवीय जी के समान राजनीतिज्ञ, बाबू सुरेन्द्रनाथ के समान वक्ता, लोकमान्य तिलक के समान राष्ट्र कल्याण के लिये आत्म समर्पण करने वाले अलौकिक पुरूष और गांधी की समान सत्याग्रही कर्मवीर उत्पन्न होते है। हमारे ही कई देश भाई यहाँ के शासन में बडे़-बडे पदाधिकारी हैं इन सब बातों से यही कई सिद्ध होता है कि भारत वर्ष एक जीता जागता राष्ट्र है- वह निस्तेज और निसत्व नहीं हैं।‘‘
नवजागरण के दौरान कुछ विचारकों ने बाहरी पराधीनता के साथ-साथ भारतीय समाज की आंतरिक पराधीनता पर भी चिंतन किया था। उनका ध्यान अंगरेजी राज की पराधीनता की ओर तो था ही साथ ही भारतीय समाज में जातिवाद, रूढ़िवाद, दलितों की स्थिति और स्त्रियों की स्थिति जैसे ज्वलंत विषयों पर भी था। उनका यह मानना था कि इन समस्याओं के कारण जो आंतरिक पराधीनता हमारे अंदर है, उसके कारण हमारा बाहरी पराधीनता से मुक्ति पाना कठिन है। यदि ऐसे में बाहरी पराधीनता से मुक्ति मिल भी गई तो इस प्रकार की समस्याओं के चलते समाज का वांछनीय उत्थान और विकास संभव नहीं होगा।
सप्रेजी का मानना था कि जातिवाद के कारण भारतीय समाज की प्रगति रूक गई हैं। अपने निबंध ‘‘राष्ट्रीय जागृति की मीमांसा‘‘ में उन्होंने लिखा है कि ‘जाति भेद के दृढ़ बंधनों के कारण लोगो की व्यक्ति विषयक स्वाधीनता स्पष्ट हो गई, संसार भर से होने वाला व्यापार रूक गया। ज्ञान का भंडार बंद कर दिया गया और यह देश अपनी राष्ट्रीय मृत्यु के मार्ग में लग गया।‘‘ दलितों की स्थिति के प्रति सप्रेजी चिंतित थे। उन्होंने दिलतों के विकास और उनके साथ हो रहे छुआछूत के प्रति भी दृढ़ता से लिखा था, ‘‘हीन जाति के अछूत लोगों की संख्या भारत की लोक संख्या की एक बटे छः (अर्थात पाॅच करोड़ से अधिक) है। सोचिए तो यह इतनी बड़ी लोकसंख्या के प्रति ‘‘दूर दूर छी छी अलग रहो अलग रहों‘‘ जैसी हीनता दर्शक उद्गार प्रकट करके हम लोगों ने राष्ट्र के श्रम विभाग की दृष्टि से अपने देश की कितनी हानि कर डाली। यदि हिंदुस्तान की सर्वांगीण उन्नति होती है तो यह सामाजिक अन्याय और दुराचार शीघ्र बंद किया जाना चाहिये।‘‘ दलित समस्या और उसके निदान के बारे में इतने वषर्¨ं पूर्व ऐसा सोचना सप्रेजी के ही वश का काम था। सप्रेजी द्वारा लिखे गये ऐसे अनेक वाक्य भविष्य में सूत्र के रूप में राजनीति में आये और उन पर अमल हुआ। फर्क बस इतना रहा कि इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों की थी कि वाक्य सप्रेजी का हैं।
सप्रेजी के चिंतन के केन्द्र में भूल रूप से भारतीय समाज की उन्नति का ही विषय छाया रहता था। यही कारण था कि वे समस्याओं को इतनी गहराई से छूते थे कि उससे पढ़ने वाला हिल जाता था। बिना लाग लपेट कर सीधी भाषा और कारगर विचारों के जरिए सप्रेजी उन कई हजार पाठकों तक अपनी बात न सिर्फ पहुॅचाते थे बल्कि गहरा प्रभाव भी छोड़ते थे।
उनका मानना था कि समाज की उन्नति के लिये स्त्री और पुरूष के बीच समानता आवश्यक है। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा और स्त्रियों की सामाजिक शिक्षा पर कई निबंध लिखे। सप्रेजी का मानना था कि शब्द की उन्नति और अवनति स्त्रियों की उन्नति और अवनति पर अवलम्बित है। स्त्रियों की स्थिति और उत्थान को लेकर छपे उनके लेख सप्रेजी के उस महान सामाजिक दर्षन के परिचायक है, जो उन्हें उस काल का सामाजिक दृष्टा बनाती है।
अपने राष्ट्रवादी दर्शन को पुष्ट और संवर्धित करने के लिये सप्रेजी ने इतिहास का भी सहारा लिया क्योंकि वे मानते थे कि ‘‘मनुष्य जाति की प्रगति में इतिहास के समान कोई शिक्षक नहीं हैं।‘‘ वे ऐतिहासिक संदर्भों को तत्कालीन भारतीय राजीनति के संदर्भों के साथ जोड़कर ऐसी वृत्तियों की रचना करते थे जो न सिर्फ ज्ञानवर्धक बल्कि प्रेरक भी होती थी। युवाओं को पे्ररित करने की दृष्टि से उन्होंने 1907 में एक निबंध ‘इटालियन देशभक्त मेजिनी‘ लिखा था, जिससे स्वदेशी आंदोलन में युवाओं को भाग लेने की प्रेरणा मिली थी। ‘स्वदेशी आंदोलन और बाॅयकाॅट‘ शीर्षक से प्रकाशित निबंध में भी उन्होंने कई ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ दिये थे, जो प्रेरणादायी थे। अपनी निबंधमाला ‘‘यूरोप के इतिहास से सिखने योग्य बातें‘‘ में उन्होंने उन सभी बातों को विवेचन किया है, जिनकी प्रेरणा भारतीय संदर्भो में उपयोगी थी। उन्होंने इस निबंध माला में छः निबंध लिखे थे। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘‘यदि भिन्न-भिन्न प्रांतों में रहने वाले, भिन्न भाषा, भिन्न धर्म रीति-रिवाज का अनुकरण करने वाले हमारे हिंदुस्तानी भाई ग्रीस के इतिहास से जागृत होकर आंतरिक विघ्नों को हटाने का प्रयत्न करें तो हमारी बहुत कुछ उन्नति हो सकती है। ‘‘उन्होंने इंग्लैंड के इतिहास से दृढ़ निश्चय और कत्र्तव्यनिष्ठा सीखने की प्रेरणा दी तो रोम के इतिहास से स्वार्थ त्याग। फ्रांस की राज्य क्रांति का संदर्भ देते हुये उन्होंने विचारों की शक्ति में विश्वास करने की बात कही हैं। उनका मत था कि दूसरे देशों के इतिहास में जो ग्राह्य या अनुकरणीय है, उसे हमें आत्मसात करना चाहिये। तभी हमारी स्वाधीनता का आंदोलन प्रभावी और तेज होगा। ‘‘जापान की विजय को राष्ट्रीय जागृति के लिये उत्प्रेरक की संज्ञा देते हुये उन्होंने लिखा, ‘‘जापान की विजय ने हिंदुस्थानियों को राष्ट्रीय जीवन के विषय में एक नया पाठ पढ़ाया है और पुनरूद्धार का यह समय हिंदुस्थान के वर्तमान इतिहास में सुवर्णाक्षरों में चिरकाल तक अंकित रहेगा।
इतना होने पर भी सप्रेजी भारतीय समाज पर पश्चिम के अवांछनीय प्रभाव को लेकर चिंतित थे और उन्होंने इस विषय पर एक लम्बा निबंध ‘हमारे सामाजिसक ह्रास के कुछ कारणों का विचार‘ लिखा। सप्रेजी को इस बात का अंदेशा था कि जैसे जैसे भारत में राष्ट्रवाद का उदय होगा, वैसे-वैसे नवजागरण के कारण संज्ञान में आई पश्चिमी सभ्यता से संास्कृतिक संघर्ष अवश्य होगा। वे इस बात को भी महसूस कर रहे थे कि हमारे भारतीय समाज में व्याप्त कुछ संकीर्णताओं के कारण समाज का वैसा विकास नहीं हो पा रहा था जैसा होना चाहिए। सप्रेजी ने जैसा कि ऊपर लिखा गया है , पश्चिमी देशों से अच्छी बातें सीखने की प्रेरणा तो दी पर अंधानुकरण के प्रति उनका घोर विरोध था। उन्होंने लिखा भी है, ‘‘पश्चिम की विद्या और सभ्यता की कुंजी मिल जाने पर भी सोचिए तो सही हम पश्चिमी देशों के तत्व वेत्ताओं के सिद्धांतों का आकलन करने में कितने सफल हुए हैं। हम विदेशियों की सभ्यता का बाहरी अनुकरण करने से ही संतुष्ट हैं।’’ सप्रेजी ने अपने लेखन के माध्यम से ऐसे कई नायकों की जीवनगाथाएॅं भी प्रस्तुत की जो समाज के लिये प्रेरक सिद्ध हो सकते थे तथा जिनके जीवन का अनुकरण करने से राष्ट्रीयता की भावना जागृत हो सकती थी। अपने विचार एवं भावनाओं को जनमत के मन में आरोपित करने का यह भी अनूठा तरीका था। उसके लिये सप्रेजी ने जो श्रम किया है वह इसी बात का परिचायक है कि वे हर उस माध्यम से राष्ट्रवादी भाव को जगाना चाहते थे जो उनके लिये संभव था। यहाॅं तक कि उन्होंने राष्ट्रीयता के ओज में अर्थशास्त्र पर भी काफी कुछ लिखा। सप्रेजी का अर्थशास्त्र पर अधिकार तो इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने हिंदी में विज्ञान कोष बनाने का जो कार्य प्रारंभ किया था, उसमें सप्रेजी को राजनीतिक आर्थिक शब्दावली बनाने का काम सौपा गया था। लगभग पैंतीस वर्ष की आयु में सप्रेजी को इतना महत्वापूर्ण काम सौंपा जाना उस समय उनकी स्थापित विद्वत्ता का प्रतीक है। अर्थशास्त्रीय चिंतन की भातीय परंपरा के विकास का कुछ श्रेय सप्रेजी को भी है। सपे्रजी ने हिंदी में समालोचना प्रारंभ करने का कार्य सप्रेजी ने ही किया। समालोचना के दौरान वे निर्भीक और निर्भम थे लेकिन प्रेरक भी थे। समालोचना के माध्यम से उन्होंने जहाॅ तक संभव हुआ राष्ट्रीयता की सही भावना का प्रस्तुतीकरण ही अपने सामने लक्ष्य के रूप में रखा। वे सही को सहीे और गलत को गलत कहने का साहस रखते थे। उम्र के जिस पड़ाव में उन्होंने समालोचना प्रारंभ की थी उसमें यह एक बहुत बड़ा जोखिम था। उस पड़ाव पर किसी को भी स्वयं को स्थापित करने का मोह हो सकता है स्वयं को स्थापित करने के मोह में कई बार दूसरे की झूठी प्रशंसा करे का अथवा किसी पूर्वाग्रह से समालोचना करने का प्रसंग बहुत स्वाभाविक है। लेकिन सप्रेजी ने इस प्रवृत्ति से स्वयं को कोसों दूर रखते हुए खरी-खरी बात कहकर ही अपना स्थान बनाया। उन्होंने एक जगह समालोचना के दौरान लिखा भी है, ‘‘केवल प्रशंसा कर देना ही समालोचना है तो अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं हैं।‘‘
सप्रे जी हमारी मातृभूति के गौरव के झूठे गुणगान के पक्षधर नहीं थें। उनका प्रश्न होता था, ‘क्या इस प्रकार के पाॅलिश चढ़ाए हुए चित्र से भारत का सत्य स्वरूप प्रकाशित हो जाएगा? प्रखर राष्ट्रवादी होते हुए भी समालोचना के दौरान भारत की झूठी प्रशंसा करने पर वे लिखने से नहीं चूकते थे, ‘‘यह बात तो इतिहास के अनुभव के बिल्कुल विरूद्ध जान पड़ती हैै कि भारत वर्ष राजनीति, शिक्षा, सुशासन, गणित, ज्योतिष, भूगोल शिल्प, रसायन आदि में सम्पूर्ण संसार का शिक्षणालय था, जिसने सब प्रकार के विशयों में पूर्ण उन्नति कर ली थी और उसके लिये कोई भी विषय सीखने को बचा न था और न किसी विषय में कुछ उन्नती करने को रह गई थी। यह निरूपण कवि के योग्य है परंतु जो इतिहास के प्रमाणों पर चलना चाहते हैं वे इस प्रकार का निरूपण कदापि पसंद नहीं करेंगे। ऐसी बातें हमारे मन में हमारे पूर्वजों के संबंध में वृथाभिमान उत्पन्न करती है।‘‘ उनके लेखन से प्रभावित होकर कई और लोगों ने इसी दिशा में चिंतन, मनन, लेखन प्रारंभ किया और ऐसी पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई जो राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित और संचालित थी। इसी के साथ ऐसे भी लेखक, पत्रकार और विचारकोें की पीढ़ी सामने आई जो इन राष्ट्रवादी विचारों के बल पर भारत के लिये स्वाधीनता प्राप्त करने का प्रण करके समाज को उत्प्रेरित करने का कार्य कर रही थी। इन सभी राष्ट्रवादी विचारक सपूतों ने भविष्य में देश एवं समाज का सफल नेतृत्व भी किया। ऐसे राष्ट्रवादी विचारकों एवं पत्रकारों की पीढ़ी को तैयार करने का सम्पूर्ण श्रेय श्री माधवराव सप्रे को ही जाता है, जिन्होंनें पाश्र्व में रहकर बिना अपने नाम, यश, श्रेय की परवाह किये सिर्फ पीढ़ियों के निर्माण के लिये अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। सप्रेजी द्वारा तैयार की गई इस पीढ़ी का हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन में तथा नवनिर्माण में कितना बड़ा हाथ रहा है, यह बात सिद्ध करने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष में ही दृष्टिगोचर है और ‘‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणम्।’’ उनके लिखे शब्द आज भी समाज और देश का नेतृत्व करते नजर आते हैं। बल्कि यदि यह कहा जाये कि आज के चुनौतिपूर्ण दौर में सप्रेजी के लिखे वे शब्द और भी अधिक प्रेरक एवं प्रेरणादायी हो गये हैं, तो अतिश्योक्ति न ही होगी।
सप्रेजी के महान अवदान में एक महत्वपूर्ण अवदान छत्तीसगढ़ की अवधारणा का भी है, जो उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य बनने के सौ वर्ष पूर्व ही स्थापित कर दी थी। वह काल था जब कोई पृथक छत्तीसगढ़ प्रांत की बात भी नहीं करता था। ऐसे में छत्तीसगढ़ प्रांत की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि की परख करते हुए सप्रेजी ने पेंड्रारोड से सन् 1900 में ‘‘छत्तीसगढ़ मित्र’’ नाम का समाचार पत्र निकाला। यह बात सप्रेजी के रूप में उस महान दृष्टा का साक्षात्कार कराती है, जो भविष्य के गर्भ में छिपे रहस्यों को भांप कर उसी के अनुसार आचरण करता है।
सप्रेजी छत्तीसगढ़ में सरस्वती के ऐसे उपासक रहे जिन्होंने साहित्य, कला,इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र यानि ज्ञान विज्ञान की सभी विधाओं मे अपनी अद्वितीय रचनात्मकता से लेखन किया। इन सभी विधाओं में इतने विविधवर्णी लेखन का दावा कोई दूसरा लेखक उनके समकालिन अथवा आज तक भी शायद ही कोई कर सकता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ मित्र प्रारंभ करने की उनकी कल्पना सर्वथा मौलिक एवं अद्भूत है, जिसके अन्दर निहित है यह भाव की जो कोई भी छत्तीसगढ़ के हित, प्रगति एवं विकास की बात सोचेगा, वही सच्चा छत्तीसगढ़ मित्र होगा। उस समय कितने लोगों ने कल्पना की होगी कि आज से सौ वर्ष बाद छत्तीसगढ़ नाम का एक नया राज्य अस्तित्व में आएगा, जो भारत भूमि में हृदय की तरह धड़केगा।

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