इस माह 19 जून को पंडित माधव राव सप्रे की 144 वीं जयंती मनायी जा रही है

सप्रेजी तत्कालीन मध्य प्रांत के एक विशिष्ट नायक थे जिन्होंने राष्ट्र सेवा की शुरूआत साहित्य और पत्रकारिता से की थी और फिर वे राजनीति में भी सक्रिय हुए थे। शायद सक्रिय राजनीति सप्रेजी जैसे स्वतंत्रचेता व्यक्ति के लिए उपयुक्त जगह नहीं थी इसीलिए सप्रेजी पुनः साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र की राजनीति को दिशा देने में संलग्न रहे थे।
यह उल्लेखनीय बात है कि व्यौहार राजेन्द्रसिंह ने 1939 में इस बात पर दुख व्यक्त किया था कि सप्रेजी के सम्बन्ध में हिन्दी संसार ने लगभग उपेक्षा बरती है। वे चाहते थे कि सप्रेजी की जीवनी, डायरी, पत्राचार और लेखों का संग्रह प्रकाशित किया जाये क्योंकि ऐसा करना मध्य प्रांत के व्यक्तियों अैर संस्थाओं के इतिहास की दृष्टि से अति आवश्यक है। व्यौहार राजेन्द्रसिंह ने अपने इस लेख में सप्रेजी को ’’महाकौशल के निर्माता’’ के रूप में वर्णित किया था।
जबलपुर में सप्रेजी के प्रयत्न से राष्ट्रीय हिन्दी मन्दिर की स्थापना का कार्य शुरू हुआ था किन्तु वह संस्था आगे नहीं बढ़ सकी। सप्रेजी के समकालीन साहित्यकारों का यह मानना था कि ’राष्ट्रीय हिन्दी मन्दिर’ सप्रेजी के लिए सबसे अच्छा स्मारक होता।
अब यह भी रेखांकन करने योग्य बात है कि भोपाल में श्री विजयदत्त श्रीधर ने सप्रेजी के नाम पर समाचार पत्र संग्रहालय स्थापित किया है और रायपुर में पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सप्रेजी के नाम पर एक शोध संस्थान है। बहरहाल, सप्रेजी के बहुआयामी व्यक्तित्व को देखते हुए, हिन्दी नवजागरण में उनके महत्वपूर्ण योगदान तथा राष्ट्रीय चेतना से आपूरित पत्रकारिता तथा धर्म तथा अध्यात्म के प्रति समर्पण के संदर्भ में उनकी स्मृति में एक स्मारक की स्थापना अब भी जरूरी है। अनेक विद्वानों ने लिखा है कि सप्रेजी ने लोकैषणा शून्य थी किन्तु उनका जीवन और व्यक्तित्व पूरे समाज के लिए एक आदर्श था।
दो वर्ष पहले छत्तीसगढ़ शासन ने सप्रेजी की स्मृति में रचनाधर्मिता को सम्मानित करने के लिए एक राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की घोषणा की थी। अब यह पुरस्कार श्री रामबहादुर राय जैसे वरिष्ठ पत्रकार को दिया जा रहा है। वहीं पं. माधव राव सप्रे साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार श्री बलदेव भाई शर्मा को दिया जा रहा है। दोनों विद्वानों को बधाई। इस पुरस्कार के माध्यम से सप्रेजी के कृतित्व और व्यक्तित्व का पुनः स्मरण किया जा रहा है।
- सुशील त्रिवेदी
वर्ष : 04 अंक : 09 जून - 2015
1. संपादकीय
2. भौतिक प्रभुत का फल
3. चिंतन की त्रिवेणी- माधवराव सप्रे
4. हिन्दी समालोचना के प्रणेता पं. माधवराव सप्रे
5. भूकंप
6. अंग्रेजी के खतरे बहुत हैं
7. राजभाषा हिन्दी-अनुवाद एवं तकनीकी...
8. हिन्दी : राजभाषा से विश्वभाषा तक
9. हिन्दी $ग•ाल की शुद्धता और विकास
10. समकालीन भारतीय नेपाली कविता का सौन्दर्य
11. आधुनिक बा•ाारवाद और लेखकीय संकट
12. नाचा-गम्मत : परिदृश्य
13. गैर पेशेवर
14. पथ स्वयं आयेगा
15. कौन जाए दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

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