एक टोकरी भर मिट्टी

संपादक
डॉ. सुधीर शर्मा

किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थीं। जमींदार साहब को अपने महल का हाता झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले, पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी। उसका प्रिय पति अैर इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी पाँच बरस की एक कन्या को छोडऱ चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपने पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट-फूटकर रोने लगती, और जब से उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गई थी। उस झोपड़ी में उसका ऐसा कुछ मन ल गया था कि बिना मरे वहाँ से यह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गदम कर उन्होंने अदालत से उस झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहाँ से निकला दिया।

बेचारी अनाथ तो थी ही, पांड़ा-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी। एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर पहुँची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे वहाँ से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ''महाराज! अब तो झोपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज क्षमा करें तो एक विनती है।ÓÓ जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ''जब से वह झोपड़ी छूटी है तब सेपोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत समझाया, पर एक नहीं मानती। कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इसे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ।
विधवा झोपड़ी के भीतर आई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। अपने आंतरिक दु:ख को किसी तरह सँभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी, ''महाराज, कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाएँ, जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ।ÓÓ जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार-बार हाथ जोडऩे लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढ़े। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति से बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान में टोकरी रखी थी वहाँ से वह एक हाथ भर भी ऊँची न हुठ्र। तब लज्जित होकर कहने लगे, ''नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।ÓÓ
यह सुनकर विधवा ने कहा, ''महाराज ! नाराज न हों। आपसे तो एक टोकरी भर मिट्टी उठाई नहीं जाती और इस झोपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार जनम भर क्यों कर उठा सकेंगे । आप ही इस बात का विचार कीजिए।ÓÓ
जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे, पर विधवा के उक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गई। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोपड़ी वापस दे दी।

एक टोकरी भर मिट्टी
(पं. माधवराव सप्रे रचित हिन्दी की पहली कहानी)

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