एक पथिक का स्वप्न

पं. माधवराव सप्रे रचित
संपादन
डॉ. सुधीर शर्मा

एक पथिक का स्वप्न
(एक ऐतिहासिक किस्सा)
(पहला भाग)
कंदहार में जंगल में से एक गरीब प्रवासी अकेला जा रहा था। जाते-जाते दोपहर का समय हो गया। सूर्य की गरमी से संतप्त होकर विश्रांति लेने के लिए वह एक झाड़ के नीचे बैठ गया। पास ही एक छोटा-सा नाला बहता था। उसके तट पर हरी दूब देखते ही घोड़ा च रने लगा। वहाँ कई प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष और भाँति-भाँति की सुंदर लताओं के कारण अति रमणीय शोभा दृष्टिगोचर होती थी। कई वृक्ष तो इतने ऊँचे दिखाई देते थे मानो वे आकाश को भेदकर उस पार चले जाने की इच्छा कर रहे हों। जंगल इतना घना था कि सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पहुँच नहीं सकती थीं। हाँ, कहीं-कहीं झाड़ सूखकर गिर पड़े थे और वन में रहनेवालों ने कई झाड़ काट भी डाले थे। उसी जगह से कुछ थोड़ा सा उजाला आता था। वहाँ जंगली जानवरों को मनुष्यों का कदापि सहवास न रहने के कारण कुछ भी डर नहीं मालूम होता था। इस 'पत्र-निर्मित स्वाभाविक छत्रÓ की छाया में सब छोटे-बड़े जीव-जंतु आराम करने के लिए आश्रय ढ़ूँढ़ रहे थे। सच मुच चारों ओर शांति देवता का साम्राज्य देख ऐसा जान पड़ता था कि वनश्री का यह निवास स्थान प्रत्यक्ष इंद्र-भुवन ही है। सृ्िर की अपूर्व शोभा ऐसे ही स्थानों में दीख पड़ती है। इसके अवलोकन मात्र से धामिर्क मनुष्य के अंत:करण में परमात्मा के विषय में आनंद और प्रेम की तरंगें उठने लगती हैं और अनीश्वरवादी के मन पर भी क्षण भर उसकी कुशलता का प्रभाव प्रकट हो ही जाता है।
इस अपूर्व शोभा और चमत्कार को देख वह श्रांत पथिक बिलकुल विस्मित हो गया। उसकी दृष्टि झर-झर बहती हुई उस समीपवर्ती जलधारा की ओर एकटक लग गई। मन में कुछ गंभीर विचार भी आने लगे। इतने में जिधर उसका घोड़ा चर रहा था, उस तरफ से पत्तों की खरखराहट उसके कानों में पड़ते ही वह चौंक उठा। ज्यों ही वह उधर देखता है त्यों ही एक दीर्घ, भयंकर गर्जना सुन पड़ी। पलक मारने की देर थी कि उस बटोही ने अपने घोड़े को एक बड़े सिंह के पंजे से घायल होकर जमीन पर गिरते देखा। फिर क्या ! क्रोध से लाल होकर खड़ा हो गया और हाथ में तलवार लेकर सिंह के पिछले पैर पर ऐसे जोर से वार किया कि वह कट गया। इतने में दूसरे पैर पर भी एक घाव लगाकर उसको पूरा लँगड़ा ही कर डाला। सिंह घाय ल होकर, थोड़े ककर्श स्वर में गरजता हुआ दूर हट गया। परंतु उसके पंजे की चोट इतनी जबरदस्त लग गई थी कि वह बेचारा घोड़ा अंत समय की वेदना से तडफ़ड़ाने लगा। अपना शिकार खो गया और लँगड़ा भी होना पड़ा, इस बात का खेद मानकर सिंह ने अपनी आँखें अंगार के समान लाल थीं, अयाल के बाल खड़े कर दिए और पूँछ पटककर अति घोर गर्जना करता हुआ अगले पैरों से सरकते-सरकते अपने शत्रु पर टूटने के लिए आगे बढऩे लगा। इतने में उस वीर पुरूष ने तलवार का ऐसा एक हाथ चलाया कि सिंह का मस्तक उसके धड़ से बिलकुल अलग हो गया।
घोड़े की मृत्यु देखते ही बटोही अत्यंत दु:खित हुआ। एक जानवर साथ में था, वह भी च ला गया। अब पैरों के बल प्रवास करना पड़ेगा, इस बात की चिंता से उसका मन बहुत उदास हो गया।
कुछ देर में जब उसका मन शांत हुआ तो अपना सामान उठाकर जंगल में च लने लगा। थोड़ी दूर तक जाने के पश्चात् जंगल खत्म हुआ और खुला मैदान दीख पड़ा। वहाँ उसने एक हरिणी को अपने बच्चे के साथ चरते देखा। हरिणी तो डरकर भाग गई, परंतु वह बग बिलकुल छोटा, हाल ही में पैदा हुआ था, इसलिए दौड़ न सका। बटोही ने उसे उठा लिया और उसके पैर बाँधकर बगल में दबा आगे चलने लगा।
सायंकाल होते ही पड़ाव की जगह देखकर बटोही ने काँधे पर से अपना सामान नीचे उतारा और हरिणी के बच्चेे को झाड़ से बाँध दिया। लकडिय़ाँ मिल गई और चकमक पत्थर से आगी बनाकर उस बच्चे के पास गया। इच्छा यह थी कि उसको मारकर अपनी जठराग्नि बुझावे। इतने में थोड़ी दूर पर उसकी माँ हताश होकर कुछ काल तक अपने बच्चे की ओर, फिर उस प्रवासी की ओर, कारूण्य दृष्टि से देखती हुई खड़ी थी। उधर बटोही की नजर पड़ते ही उसने अपनी गरदन ऊँची कर दी। शरीर शिथिल हो गया, नेत्रों से अश्रुकी धारा बहने लगी और अत्यंत दीन मुद्रा धारण करके उसने बच्चे की ओर अपनी दृष्टि लौटाई। बेचारे बच्चे को मालूम भी न था कि उसकी कौन सी दशा होने वाली है। सिर्फ माता के वियोग से वह खिन्न हो गया था। हरिणी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। बटोही भी उसके मन का भाव समझकर कुछ पीछे हट गया। हरिणी एक ही उछाल में बच्चे के पास पहुँच गई और अत्यंत प्रेम से उसको चाटने-सूँघने लगी। परंतु उस मनुष्य को निकट आते देख झटपट कूदकर दूर हो गई और फिर भी दु:खित मुद्रा से उसकी ओर एकटक देखने लगी।
यह अलुत प्रसंग देखकर पथिक का हृदय दया से आद्र्र हो गया। हरिणी का वात्सल्य -भाव अवलोकन कर उसके मन में अनुकंपा का प्रादुभार्व हुआ। कारूकय आदि उत्तमोत्तम चि त्त-विकारों से छाती धड़कने लगी। माँ और बच्चे को एकत्र देख इतना आनंद हुआ कि वह फूला न समाया। अंत में मानसिक उत्साह का प्रभाव तथा पवित्र अंत:करण का संस्कार इतना प्रबल हो गया कि उसे परमात्मा के सवर्साक्षित्व की याद आई और तुरंत ही उसने उस बच्चे को कैद से मुति कर दिया। उसी दम वह अपनी माँ की ओर दौड़ा। दोनों मिलकर जंगल की ओर मुड़े। परंतु जाते-जाते मानो अपनी कृतज्ञता दिखलाने ही के लिए उस हरिणी ने अपने प्रसन्न मुख और आनंदपूर्ण नेत्रों से पथिक की ओर एक बार लौटकर देखा और फिर झाड़ी में अपने छोटे बच्चे को लेकर घुस गई।
सज्जन मनुष्यों का चित्त ऐसे सत्कर्मों से अवश्य ही प्रफुल्लित हो जाता है। जीव जैसी अमूल्य वस्तु दूसरी कोई भी नहीं है। क्या पशुओं को और क्या मनुष्यों को, जीव सभी को प्यारा है। परंतु यह जानबूझकर भी, कई लोग बेचारे गूँगे जानवरों का केवल कौतुकार्थ वध करते हैं; उन्हें कुछ दु:ख होगा या नहीं, इस बात का बिलकुल सोच-विचार नहीं करते। ऐसे नर-पशुओं से क्या कहें ! हरिणी के बच्चे को जीवनदान देने के कारण उस पथिक को बहुत ही हर्ष और समाधान हुआ। उसने अपने झोले से थोड़ा सा बासी भात निकाला और बयारी करके उसी जगह रात भर रहने का निश्चय किया। इधर-उधर से पत्ते बटोरकर अपने बिछौने के नीचे बिछाए। जीवनदान के समान सत्कर्म करने से वह स्थान उसको अति प्रिय मालूम होता था। चारों तरफ चंद्रमा का शुभ्र स्फटिकवत् शीतल प्रकाश और निजर्न वन की अनुपम शांति उसके मन का आणद और भी बढ़ा रही थी। बीच-बीच में श्वापदों की भयंकर गजर्ना और उनके च लने की आहट सुन पड़ती थी। बटोही दिन भर का थका हुआ था। बिछौने पर लेटते ही नींद आने लगी। दोपहर की दुघर्टना का स्मरण होते ही उसको अपने घोड़े की याद आई। फिर वह बहुत ही व्याकुल हो गया। परंतु संध्या समय हरिणी के बच्चे केा बंधनमुति करने के कारण जो समाधान हुआ था, वह अभी तक वैसा ही बना था। इससे उसका मन कुछ शांत हुआ और इसी अवस्था में उसे गहरी नींद ने आ घेरा। मध्य रात्रि के समय उसने एक स्वप्न देखा, वह यह कि एक तेजस्वी पुरूष (कदाचित् पैगंबर हो) इतने जगमगाते हुए वस्त्र पहनकर उसके सन्मुख आया कि उसकी नजर भी वहाँ ठहर न सकी। आते ही उसने कहा-'आज तूने एक गूँगे जानवर का जीवन बचाया है, इस सत्कार्य से परमात्मा बहुत प्रसन्न हुए हैं, इसके पलटे तुझको गजनी का राज्य मिलेगा। जिस प्रकार की भूतदया तूने आज जानवरों के साथ दिखलाई है वैसी सदैव मनुष्यों के साथ रखना।Ó
इतना कहकर वह दिव्य पुरूष लुप्त हो गया और बटोही भी जाग उठा। चंद्रमा का प्रकाश अभी तक मलिन नहीं हुआ था- अर्थात बहुत कुछ रात शेष बची थी। परंतु उस पथिक को फिर से नींद न आई। उसको यह स्वप्न जाग्रत अवस्था में भी नेत्रों के सन्मुख दिखाई देता था, इसलिए बिछौने पर पड़े-पड़े वह अस्ताच ल से नीचे उतरते हुए चंद्रमा की शोभा देखता रहा।
चंद्रास्त होते ही क्षण भर वहाँ अँधियारा-सा छा गया। फिर पूर्व दिशा में अरूणोदय होने लगा। परंतु चारों ओर कुहरा छाया हुआ था, इसीलिए सूर्य का प्रकाश कुछ धुँधला-सा दीख पड़ता था। लता-पर्ण तथा वृक्ष-शाखा मोती के समान चमकनेवाली ओस की बूँदों से सुशोभित हो गई थीं। रात भर में इतनी ओस जम गई थी कि उसके बोझ से पत्ते झुक गए और उनमें से ओस की बूँदें टप-टप करके नीचे गिरने लगीं। थोड़ी देर में सूर्य का प्रकाश पहाडिय़ों की चोटी पर से तराई में पहुँचा और प्रात:काल की मंद हवा बहने लगी। इससे ओस टपककर गिर पड़ी और जमीन ऐसी भीग गई कि मानो रात में वर्षा हुई हो। अब बटोही अपने बिछौने पर से उठा। बिछौने के नीचे जो पत्ते बिछाए हुए थे, उन्हें समेटकर उसने आग सुलगाई और अपना हुक्का तैयार किया। रात को जो भात बच रहा था, उसी का कलेवा किया और पत्ते के दोनों में जो ओस जमा की थी, उसी को पीकर उसने अपना सब सामान अधारी में रख लिया। रास्ता चलने के पहले मक्का शरीफ की तरफ मुँह फेरकर उसने भक्तिपूर्वर्क नमाज पढ़ी और राह में अपनी रक्षा करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करके सामान काँधे पर उठाया और धीरे-धीरे चलने लगा।
अनजान प्रदेश, जंगल का रास्ता और साथ में कोई भी नहीं, ऐसी स्थिति में अकेले चलते-चलते बटोही का जी घबरा उठा। रात्रि का स्वप्न और उस दिव्य पुरूष का भविष्य-कथन बारंबार उसके मन में आने लगा। उसे इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि बेशक मुझपर परमेश्वर की कृपा है, उसकी यही आज्ञा समझना। परंतु वह फिर भी सोच करने लगता कि जो मनुष्य इस देश में बिलकुल अनजान है, जिसे इस दुनिया में रहने के लिए न तो कोई मकान है और न कोई ठिकाना है, जिसे इस संसार में किसी का आधार भी नहीं-वह य:कश्चित गरीब प्रवासी, गजनी ऐसे बलाढ़्य राज्य का अधिपति हो जाएगा-यह बात कैसे संभव हो सकती है ? रंक से राजा होने का अनुभव स्वप्न ही में मिलता है। जो बात प्रत्यक्ष देखने में कभी नहीं आती, वह स्वप्न भी इस प्रकार होगा- ऐसा सोच कर उसका मन किंचित् सशंक हो गया। तथापि यह कितना भी असंभव क्यों न हो, इसमें परमेश्वर का चमत्कार है, इस बात की कल्पना उसके मन में दृढ़तर समा गई थी।
(दूसरा भाग)
पथिक ऐन जंगल में से चलते-चलते उस जगह पर पहुँचा, जहाँ दिन-दोपहर को ही अँधेरा मालूम होता था। उन झाडिय़ों के मध्य भाग में जब आया तब वहां उसे मनुष्यों की आवाज सुनाई देने लगी। कुछ आगे बढ़कर देखता है तो आठ आदमी आग जलाकर उसके आसपास बैठे भोजन कर रहे हैं। उनको खाते देख यह प्रतीत होता था कि वे कई दिन से भूखे हैं; क्योंकि वे अघोरी की नाई सपाटे से निगलते चले जाते थे। यह देख बटोही के मन में शंका आई कि हो न हो, अब शत्रु से गाँठ पड़ी। पर क्या करे ? पीछे लौट नहीं सकता, क्योंकि उसको उन्होंने देख लिया था। इसीलिए हिम्मत करके आगे बढ़ा और उनसे पड़ाव की जगह पूछने लगा। उनमें से एक ने हँसकर कहा, 'भला, यहीं रह जाओगे तो क्या नुकसान है ?Ó
इसपर उन दोनों में बातचीत होने लगी। पथिक ने कहा, 'नहीं, मुझे आगे जाना है। अगर तुम रास्ता बतलाओ तो ठीक है, नहीं तो सेंत-मेंत बड़बड़ करने की मुझे फुरसत नहीं।Ó
'अच्छा, लेकिन जो लोग इस जंगल में आते-जाते हैं, वे यहाँ अपनी रक्षा के लिए कुछ महसूल दिया करते हैं। यह बात तुम्हें मालूम है या नहीं ?Ó
'तुमसे सहायता लेनेे की मुझे कोई गरज नहीं है, इसलिए मैं तुमको एक कौड़ी भी न दूँगा।Ó
'सुनो ! हम यहाँ पर आठ आदमी हैं। क्या तुम इनके साथ पुर सकोगे ? जरा नरम हो ओ और कुछ खयाल करो कि तुम कहाँ हो ? ऐंठ की बातें तो न करो। जब कभी मौका लग जाता है तो हम लोग अपना हक राजा पर भी चला लेते हैं। सच पूछो तो यहाँ के राजा हम ही हैं। तुम्हारा किया कुछ भी न हो सकेगा। सीधी तरह जो कुछ तुम्हारे पास है, चुपचाप हमारे अधीन करो! और वह रास्ता दिखाई देता है उधर से च ले जाओ, नहीं तो तुम्हारे जी पर बीतेगी। समझे? याद रखो कि जिस काम को हम अपना हाथ लगाते हैं उससे फिर पीछे कभी नहीं लौटते !Ó
'तो क्या मैं लुटेरों के फंदे में पड़ गया हूँ ?Ó
'इसमें क्या शक ! कहो तो फिर क्या कहना है।Ó
'अब यही कहना है कि सामने से हट जाओ। मैं तुम्हारी कभी न सुनूूंगा। इस बात को खूब सोच रखो कि सिर्फ आठ ही नहीं, तुम्हारे सरीखे सौ लुटेरे भी आ जाएँ, तो मैं अकेला उनके लिए बस हूँ। क्या मुझे अकेला समझकर डराना चाहते हो ?Ó
वह चोर अपने साथीदारों की तरफ देखकर जोर से हँसा और फिर बोला, 'यह भला आदमी सीधी बातोंसे नहीं मानता। इसे थोड़ी सी खुराक मिले तो ठीक होगा।Ó फिर उस पथिक की ओर लौटकर कहने लगा, 'अरे इधर आ, मेरे सामने तो खड़ा रह। अपना सामान नीचे धर दे और च ल, दिखला तो सही तुझमें कितना दम है ! मैंने तो तुझे पहले ही कह दिया कि तुझे अपना जीव प्यारा है तो हमारी बात मान ले। क्यों, सुनता है कि नहीं ?Ó
'यहाँ जीवन की परवाह किसको है। मैं तो उसकी कुछ कीमत ही नहीं समझता। खुदा का इरादा होगा तो मैं मरने को अभी तैयार हूँ। पर जब तक जीता हूँ, अपना माल तुम्हें न छूने दूँगा। सुख क्या चीज है, यह तो मुझेआज तक मालूम भी नहीं और न कभी आगे जानने की कोई उम्मीद ही है, फिर मैं मौत से क्यों डरूँ? मैं जानता हूँ कि तुम हरामखोर हो ! तुम्हें दया-माया छूकर भी नहीं निकली। चलो, देखूँ तो सही, तुम क्या कर सकते हो मेरा !Ó ऐसा कहकर वह पथिक एक झाड़ से टिक गया और अपना सामान नीचे उतारकर हाथ में तलवार ले खड़ा रहा।
उसका विलक्षण ढांढ़स देखकर वे सब आश्च र्य से स्तबध हो गए। परंतु अपना प्रभाव दिखलाने के लिए उनमें से एक चोर ने पथिक के दाहिने हाथ में (जिसमें तलवार थी) ऐसा बाण च लाया कि वह तीर हाथ को छेदकर झाड़ में जा घुसा। उसने तीर को खींच कर निकाल डाला और तलवार चलाने का प्रयत्न किया; पर उसके हाथ से इतना खून बह रहा था कि वह बिलकुल दुर्बल हो गया। तलवार नीचे गिर पड़ी। डाकू उसके बदन पर टूट पड़े और उसकी मुश्कें बाँधकर सामान टटोलने लगे। पर जब उसमें कोई भी कीमती चीज न मिली तो वे बहुत ही निराश हो गए। इतने से माल के लिए अपने जीवन की परवाह न करनेवाले उस पथिक का उपहास करके, दाँत-होंठ पीसते हुए सब माल इधर-उधर फेंक दिया। और जैसाकि अंदाज किया था वैसा कुछ भी माल हाथ न लगा, इससे खिन्न होकर उन चोरों ने पैसे मिलने की नई युक्ति निकाली। बटोही को अच्छा मजबूत कठमस्त देखकर गुलाम बनाकर बेच ने का उन्होंने इरादा किया। ऐसे गुलाम की कीमत भी बहुत बढिय़ा मिलेगी-यह सोच कर उनमें से एक ने कहा, 'बहादुर, इधर आओ। चलो, अब हमारे साथ घर चलो। जब तक तुम्हारा घाव अच्छा न हो जाए, हमारे यहाँ पहुनाई करो। फिर जल्दी ही तुम्हारे लिए कोई दूसरा बंदोबस्त किया जाएगा। कुछ चिंता मत करो।Ó
फिर पथिक के हाथ उसकी पगड़ी से बाँध दिए और दो चोर उसकी दोनों भुजाओं को पकड़कर उसे ले चले। वन में कुछ दूर जाने पर कई छोटे-छोटे झोपड़े नजर आए। वहाँ पहुँचते ही सब लोग ठहर गए। चोर अपने-अपने लड़के-बच्चें के साथ रहते थे, इसलिए उस पथिक के रहने के लिए एक नई झोपड़ी तैयार की गई।
दो-चार दिनों में जब उसका घाव कुछ अच्छा हुआ तो सब चोरों ने एकत्र होकर उसको अपने सामने खड़ा किया और उनका नाय क कहने लगा -'क्यों भाई ! कहो तुम्हें हमारा धंधा पसंद आया है या नहीं? इस धंधे में मनुष्य को बहुत चालाक और होशियार रहना चाहिए। तुम तो अच्छे, मोटे-ताजे, मजबूत, शूर जवान दिखाई देते हो। अगर हमारे साथ रहना चाहते हो तो कहो ?Ó
प्रवासी ने कहा 'मैं बड़ा धूर्त हूँ। अगर तुम मुझे अपने बेड़े में रखना चाहते हो तो रखो। पर मैं यह नहीं कह सकता कि मैं तुमसे विश्वासघात कभी नहीं करूँगा।Ó
'कुछ हर्ज नहीं, हम तुमको अपने बेड़े में शामिल करते हैं। विश्वासघात करना शूरों का काम नहीं है। तुम पूरे शूर हो, इसलिए हम तुम्हारा विश्वास करते हैं।Ó
'अगर ऐसा ही है तो मैं समझता हूँ कि तुम्हारे समान मूर्ख कोई भी नहीं। शूर पुरूष सदैव सम्माननीय होते हैं। ऐसे डाकुओं पर विश्वास रखना शूरों का काम नहीं है। यदि मैं तुम्हारा विश्वास मानकर चुपचाप बैठा रहूँ तो मुझे निरपराधी मनुष्यों को दु:ख देने का पाप लगेगा।Ó
'तुम इतने ईमानदार होगे, यह बात हमें मालूम न थी। इतना अलबत जानते थे कि तुम बड़े शूर हो। पर अब हमें ऐसा जान पड़ता है कि तू न तो ईमानदार है और न शूर। सिर्फ ढ़ोर चराना या घोड़ा मलना या गुलामी करना, यही तेरा काम है। बस अभी थोड़ी देर में तुझे तेरे लायक धंधा मिल जाएगा।Ó
बटोही के दोनों हाथ बँधे हुए थे। उन्हीं को ऊपर उठाकर कहने लगा 'सच है, ये मेरे हाथ बँधे हैं, इसीलिए तुम इतनी बड़-बड़ कर रहे हो। कायरों का तो यह काम ही है कि जब शत्रु के भय से दूर हों तो शूरवीर बन जाएँ। अरे दुष्ट, अधम, परद्रव्यापहारी नीच! क्या जख्मी और पराधीन को दुर्वचन कहने ही में तू अपनी बहादुरी समझता है ?Ó
यह सुनकर उस चोर को कुछ लघ उत्पन्न हुई। उसने कहा, 'अच्छा, शौर्य और सगई किसे कहते हैं, हम नहीं जानते। इसके लिए तकरार करने से कुछ फायदा नहीं। लेकिन इतने दिन से तुम हमारे यहाँ हो, तुमको खिलाने-पिलाने और दवा-दारू करने में हमारा पैसा लगा है, वह तो मिलना ही चाहिए। तुम्हारे पास तो एक कौड़ी भी नहीं। इसलिए हमारा विचार है कि तुमको गुलाम बनाकर बेच दें और पैसे वसूल कर लें।Ó
फिर वे चोर उस पथिक को नजदीक के गाँव में ले गए। वहाँ किसी व्यापारी के पास बेच कर जो कुछ कीमत मिली, लेकर घर लौट आए। व्यापारी ने उसके घाव पर मरहम-पट्टी वगैरह लगाई और अच्छे-अच्छे पौ्िरक पदार्थ खाने को दिए। उसका पूर्व वृत्तांत पूछकर अच्छी तरह से हिफाजत की। पथिक अपने मन में समझ गया कि उसकी इतनी फिक्र क्यों हो रही है। अब एक दिन अवश्य ही गुलाम बनना पड़ेगा। क्या करे बेचारा! निरूपाय होकर, ईश्वर पर भरोसा रखकर बड़ी कठिनाई से दिन बिताने लगा। जब कभी स्वप्न की याद आ जाती तो अत्यंत व्याकुल और उदास हो जाता। स्वप्न में दूत के वचन पर विश्वास रखकर आज तक जितना मनो राज्य किया, उसके विषय में अब उसको बहुत शर्म मालूम होती थी। अब जो कुछ नसीब में लिखा है, वही होगा- ऐसा समझकर संतोषवृत्ति से रहने का निश्चय किया।
जिस व्यापारी का वर्णन ऊपर कर चुके हैं, वह गुलाब बेचने का रोजगार करता था। जब बटोही बिलकुल चंगा हो गया तो उसको अपने साथ लेकर वह खुरासान को रवाना हुआ। कई दिन तक रास्ता चलने पर वे उस शहर में पहुँचे। वहाँ उसने यह बात प्रकट की कि उसके पास एक अच्छा, खूबसूरत, जवान गुलाम बिकाऊ है। कई ग्राहक आए, पर कीमत न पटी। व्यापारी को आशा थी कि बहुत लाभ होगा। इसलिए उसने कीमत भी अधिक बढ़ा दी थी। जब सब ग्राहक लौट गए तो व्यापारी अत्यंत निराश हो गया। भाग्य वशात् उसको एक हिकमत सूझी। उसने विचार किया कि स्वतंत्रता सबको प्यारी होती है, यदि वह इस मनुष्य को मुक्त कर दे तो कदाचित् यह दूसरों की अपेक्षा अधिक द्रव्य देगा; क्योंकि अपने स्वातंत्र्य की आवश्यकता जितनी इसे होगी, उतनी दूसरे किसी को भी नहीं हो सकती। यह विचार मन में आते ही वह हर्ष से फूला न समाया। तुरंत ही उस बटोही के पास गया और बोला, 'क्यों, तुझे अपनी स्वतंत्रता पाने की इच्छा है क्या ?Ó
'वाह साहिब ! आप यह क्या पूछते हैं ? क्या भूखे को कोई ऐसा भी पूछता है कि तुझे क्या चाहिए ?Ó
'अच्छा, तुझे स्वतंत्रता मिल जाए तो उसके बदले तू क्या देगा ?Ó
'आपको क्या चाहिए ?Ó
'द्रव्य !Ó
'नहीं, यह तो कभी नहीं हो सकता। स्वतंत्रता मनुष्य मात्र को ईश्वर के यहाँ से मिली है, उसे मोल लेनेे की मेरी इच्छा नहीं। सच पूछिए तो तुम्हारे जैसे नीच रोजगार करने वालों का गला काटना ही मेरा कत्र्वय है। पर इस काम के लिए जितना मुझे अधिकार है, उतना ही तुमको मेरी स्वतंत्रता छीन लेनेे का है।Ó
यह सुनते ही उस बूढ़े व्यापारी की नाड़ी ठंडी हो गई। क्रोध से लाल होकर वहाँ से हट गया और उस गुलाम को छल करने को आरंभ किया। उसके गले में पट्टी बाँधकर दिन भर नीच और कठोर काम कराने लगा। परंतु दैवयोग से यह हकीकत खुरासान के बादशाह अलप्तगीन के कानों तक पहुँची। क्यों न हो, भढ्ढों का नसीब कभी-न-कभी जागता ही है। बस, यही कारण है कि बादशाह ने बहुत सा द्रव्य देकर उस गुलाम को अपने पास रख लिया।
(तीसरा भाग)
इस प्रकार से वह पथिक बादशाह के महल में पहुँचा। पहले-पहल तो उसे दूसरे गुलामों के साथ महल के छोटे-मोटे कामों पर रखा गया। फिर उसकी चतुराई और होशियारी देखकर अलप्तगीन ने उसको अपने खास गुलामों में रख लिया। तब से वह निरंतर बादशाह के समीप रहने लगा। थोड़े ही दिनों में बादशाह बहुत खुश हो गया और उसे एक तरक्की की जगह दे दी। इस गुलाम में बहुत कुछ ऊँचे दर्जे की बुद्धि है- यह सोच कर एक दिन उसने उसका जन्म-वृत्तांत पूछा।
गुलाम ने कहा, 'ऐ शहंशाह ! मुझ गरीब की हकीकत क्या पूछते हो। आज मैं यहाँ गुलामी कर रहा हूँ, उसमें कुछ शक नहीं। पर आज तक मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया है कि जिससे मेरे कुल को बट्टा लगे। मैं गरीब हूँ, तथापि स्वतंत्र हूँ। जब ईरान का बादशाह याजीदजद शत्रुओं के साथ लड़ाई में हारकर भाग गया, तब उसके कुटुंब के लोग तुर्किस्तान में ही रह गए। बादशाह को दुश्मनों ने कत्ल कर डाला। उसके कुटुंब में तुर्किस्तान के कई लोगों से शादियाँ हुई। मेरा जन्म उसी के वंश में हुआ है। इसलिए अब मैं तुर्क कहलाता हूँ। जिस समय मेरा जन्म हुआ, मेरे माँ-बाप बिलकुल गरीब थे। हर रोज गुजर होना भी मुश्किल था। तिसपर भी मेरे बाप ने मुझे अच्छी तरह से पढ़ाया, अपने धर्म पर विश्वास रखकर नीति का मार्ग दिखलाया और सदैव सदाचरण करने की सुशिक्षा दी; क्योंकि वह स्वयं कुछ लिखना-पढऩा जानता था और उस शहर में एक बड़ा विद्वान और सद्गुणी मनुष्य में गिना जाता था। युद्ध करना, शिकार खेलना, घोड़े पर सवार होना, हथियार च लाना, आदि वीर पुरूष के योग्य कई उत्तम-उत्तम गुण सीखने का भी मुझे मौका मिला। मैं समझता हूँ कि मेरी शिक्षा राजदरबार में जो कई सरदारों के पुत्र हैं, उनसे यदि अधिक नहीं तो कम भी न होगी। न मालूम क्यों, छुटपन ही से मेरे मन की ऐसी भावना हो गई थी कि मैं जन्म भर यों ही गरीब न बना रहूँगा, कभी-न-कभी मुझसे जरूर कोई बड़ा भारी काम होने वाला है। बस, इसी कल्पना के जोश में अपनी उम्र के उन्नीसवें बरस घर छोड़ बाहर निकल पड़ा। गजनी के लश्कर में पहुँच सिपाहियों में भरती होने के इरादे से गाँव-गाँव, जंगल-जंगल घूमता हुआ च ला आ रहा था कि दुर्भाग्य से एक घने वन में डाकुओं से गाँठ पड़ गई। वे आठ आदमी थे। मुझे अकेला देख, हाथ-पैर बाँधकर अपने घर ले गए और हर तरह की तकलीफ देने लगे। कुछ दिन पहले एक व्यापारी के पास मुझे बेच दिया। वहाँ जो दु:ख मुझे सहना पड़ा, वह कहने के लाय क नहीं है। लेकिन यह उस परमेश्वर की ही कृपा हुई कि हुजूर का गुलाम होकर यहाँ आ पहुँचा।Ó
पथिक की यह वार्ता सुनकर अलप्तगीन बहुत प्रसन्न हुआ और थोड़े ही दिनों में तरक्की देते-देते उसको अमीरूल-उमरा बना दिया। उसने भी कभी ऐसा खराब काम नहीं किया कि जिससे उसके नाम और ओहदे पर बट्टा लगता। अब तो अलप्तगीन ने अपनी सब फौज ही उस सौंप दी और कहा कि राज्य की कुल व्यवस्था तुम ही देखा करो। यह अधिकार मिलते ही उसने फौज को एकशिस्त से कवायद सिखलाना शुरू किया और लड़ाई की ऐसी अच्छी व्यवस्था रखी कि थोड़े ही दिनों में कई दुश्मनों के दाँत खट्टे हो गए। कई तो आप-ही-आप डरकर सीधे हो गए। इधर-उधर शांति होकर बादशाह का अमल पूरा-पूरा स्थापित हो गया। इससे अमीर की बड़ी प्रशंसा होने लगी और फौज का हर सिपाही उसको अपनी जान से भी ज्यादा चाहने लगा। अब उसके मन में अपने स्वप्न की कुछ-कुछ सत्य ता मालूम होने लगी। अपने पुत्र को इस प्रकार के वैभव में देखने का सुख उसके बाप के नसीब में न था। पर उसकी माँ अभी तक जीवित थी। उसको उसने अपने पास बुलवा लिया ! लड़के की यह बड़ाई देख उसे भी बड़ा आनंद हुआ।
देखो तो सही ! इस मनुष्य की स्थिति अल्पकाल में ही कैसी बदल गई। यही पथिक जो कुछ दिन पूर्व गुलामी करता था और सबके सामने घुटने टेककर माथा नवाया करता था, वह अब खुरासान के सब अमीरों का उमराव हो गया है और उसको सब छोटे-बड़े लोग झुककर सलाम करते हैं। कितना बड़ा अंतर है। यह सच है, पुरूष का भाग्य कब खुलेगा, कोई नहीं जानता। बादशाह अपने अमीर से बहुत ही खुश रहने लगा। राजदरबार में उसकी सलाह लिये बिना कुछ भी काम नहीं चलता था। क्या दरबार में और क्या रणभूमि में, उसीकी आज्ञा सबको मान्य होती थी। वह अपने दुश्मन को प्रत्य क्ष काल के समान, राजा को जीव और प्राण के तुल्य, प्रजा को एकमात्र आधार और सेना को सदा विजयी, सग नाय क मालूम होता था; इसीलिए अब वह अपने दु:ख के दिन भूलकर सुख से रहने लगा। ऐसी एक भी चीज न थी जिसपर उसका मन लगता और वह उसे न मिल सकती। उसके स्वप्न की बात पूरी होने में अब कौन सी त्रुटि थी!
अलप्तगीन की जहीरा नाम की एक अत्यंत रूपवती और सद्गुणी कन्या थी। इस समय वह ऐन जवानी में होने के कारण अद्वितीय मालूम होती थी। बड़े-बड़े सरदारों और अमीरों ने उससे शादी करने की बातचीत निकाली, परंतु उसने किसीको भी पसंद न किया। ूहीरा अपने माँ-बाप की इकलौती लड़की थी, इसलिए अलप्तगीन उसको बहुत ही चाहता था। जब उसने यह हाल सुना कि लड़की ने अपने अमीरों में से किसीको भी पसंद नहीं किया, तब उसके मन में बड़ी भारी चिंता उत्पन्न हुई कि अब वंश कैसे च लेगा। तथापि वह भलीभाँति जानता था कि ूहीरा कोई साधारण लड़की नहीं है। वह बहुत समझदार और च तुर है, इसलिए उसने इस काम में कुछ छेड़छाड़ करना ठीक न समझा। जो कुछ हो, लड़की के मन से होना चाहिए। उसके अधिकार में किसी तरह की रोक-टोक न करने का बादशाह ने पूरा-पूरा निश्चय कर लिया।
इस किस्से का मुख्य नायक अमीरूल-उमरा बादशाह के महलों में रहता था। शाहजादी ने उसे कई बार देखा भी था। कभी-कभी तो आपस में उन दोनों की बातचीत भी हुआ करती थी। इस प्रकार के कई प्रसंग आते-आते वे एक-दूसरे को चाहने लगे। चाह से परस्पर अनुराग उत्पन्न हुआ और अमीर को यह भी मालूम हो गया कि उसके सहवास से शाहजादी खुश होती है। परंतु जब उसको याद आ जाती कि शाहजादी ने अमीरों को निराश किया है, तो उसका मन उदास हो जाता। तो भी प्रेम के वश होकर आशा करने लगता कि मुझे इसका पलटा अवश्य ही मिलेगा।
जैसे अमीर के मन में वैसे ही शाहजादी के भी मन में प्रेम का बीज आरोपित हो चुका था और उनकी परस्पर प्रीति बढ़ती ही जाती थी। अब उनका यह भाव आपस में छिप नहीं सकता था। दोनों की आँखें मिलते ही शाहजादी के बरताव में जो एक प्रकार की चंच लता दीख पड़ती थी, उससे तो यह बात स्प्र हो जाती थी कि उसके मन पर प्रेम का पूरा असर हो चुका है। उसके भाषण और नेत्र-संकेत से ऐसा मालूम होता था कि वह बिलकुल परवश हो गई है। अस्तु, उसकी यह दशा देख अमीर को विश्वास हुआ कि ऐसे समय पर यदि अपना मनोगत विचार शाहजादी को बतलाया जावे तो अपमानित होने का डर नहीं है। इसलिए एक दिन शाहजादी को प्रसन्न मुद्रा में देख उसने अपना विचार प्रकट किया। उसका परिणाम भी कुछ खराब न हुआ। शाहजादी लघ से मुसकराकर नीचे देखने लगी।
अमीर आनंदातिशय से प्रफुल्लित होकर बोला, 'ऐ शहजादी, इसमें कुछ शक नहीं कि थोड़े दिन पहले मैं इस महल में गुलाम होकर रहता था। पर मेरा जन्म अच्छे राजघराने में हुआ। मैं समझता हूँ कि मेरे योग से तुम्हारे बड़प्पन में किसी तरह का कलंक नहीं लग सकता।Ó
'ऐ अमीरूल-उमरा।Ó शाहजादी ने कहा, 'अपने जन्म का साथी और सुख-दु:ख का भागी ढूँढने में बहुत होशियारी से काम करना चाहिए। ऐसे समय कुल की अपेक्षा शील ही का अधिक महत्व है। धन-दौलत और कुल तो जन्म ही से प्राप्त होते हैं, परन्तु सत्व, शील और उत्तम नीति सहज नहीं मिलती। श्रीमान मनुष्य मिलना कठिन नहीं है। इस दरबार में ऊँचे कुल के बड़े लोग मैंने कई देखे हैं। आज तक वहाँ ऐसे सैकड़ों अमीर आ चुके जो अपने तईं बादशाह से भी बढ़कर समझते हैं। सदाचारी और सुशील मनुष्य का मिलना बहुत कठिन है। कर्म, धर्म, संयोग से यदि ऐसा सत्पुरुष मिल जाए तो उसे परमात्मा की कृपा ही समझनी चाहिए।।
'ऐ अमीर !Ó जहीरा अत्यंत अनुरागपूवर्क बोली, 'मेरे नसीब में जो सुख-दु:ख लिखा है, वह तुम्हारे साथ जन्म भर भोगने के लिए मैं बड़े संतोष से तैयार हूँँ; परंंतु इसमें मेरे पिता की भी अनुमति होनी चाहिए। पिता की आज्ञा मुझे शिरसा मान्य है। उनकी इच्छा के विरूद्ध मैं कदापि कोई काम नहीं कर सकती। कन्या का युँँही धर्म है कि अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करे। जो कन्या धर्म के अनुसार नहीं चल सकती, वह शादी हो जाने पर, थी-धर्म से कैसे रह सकेगी ? जिसके हृदय में पितृप्रेम नहीं, उसके मन में पतिप्रेम कहाँ से आ सकता है ?Ó
'मैं अभी बादशाह के पास जाकर सब हाल सुनाता हूँँ। मुझे विश्वास है कि बादशाह मुझसे बहुत खुश हैं। परंतु यह तो मानापमान का विषय है। कौन जानता हे कि, अपना संबंध उनको पसंद होगा या नहीं ?Ó
इतना कहकर अमीर ने उसी दिन बादशाह से मुलाकात की और अपना हृदय-विचार उनको कह सुनाया। यह बात सुनते ही क्रोध अथवा आश्चर्य से चकित न होकर अलय्गीन ने बड़े संतोष से कहा-'तुम जानते हो कि जहीरा मेरी एकलौती लड़की है। मेरे लिए आज सोलह वर्ष से वही आनंद का स्थान है। अब उसको भी सुख मिलने के दिन आ गए। मेरा कतर्व्य य ही है कि हर प्रकार से उसके सुख की वृद्धि करूँ। बड़े-बड़े शाहजादों और अमीरों ने उसकी शादी माँगी, पर उसने एक को भी पसंद न किया। अगर वह तुमको पसंद करे तो मेरी मनाही नहीं।Ó
अमीर ने जवाब दिया कि, 'शाहजादी ने मुझ पर अपनी अनुकूलता दिखाने की कृपा की है। सिर्फ आपकी आज्ञा चाहिए।Ó
लड़की की यह इच्छा देखकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। जहीरा ने अत्यंत योग्य वर को ही अपना प्रेम दिखाया। इससे वह अपने तईं को धन्यवाद देने लगा। उसने तुरंत अपनी अनुमति प्रकट की और बड़े समारोह से दोनों की शादी कर दी। जहीरा ने जिन-जिन अमीरों को अस्वीकार किया था, वे अपने मन में जलने लगे; पर शहर के सब लोग बहुत ही प्रसन्न हुए। सारे खुरासान में आनंद की बधाई बजने लगी।
शाहजादी ने बयाह के कुछ दिन पीछे, हिजरी सन् 351 में, अलप्तगीन ने गजनी के बादशाह मनसूर से लड़ाई की तैयारी की। मनसूर हार गया और अलप्तगीन ने अपने दामाद की सहाय ता से गजनी राज्य हस्तगत कर लिया। आगे सन् 975 ई. में (अर्थात् हिजरी सन् 365 में ) अलय्गीन का देहांत हो गया और उसका लड़का अबू इसहाक गद्दी पर बैठा। थोड़े ही दिनों में अपने बहनोई के साथ उसने बुखारा पर चढ़ाई की। मनसूर अमीर के पराक्रम और शौर्य से अपरिचित न था। उसने उन दोनों का बहुत कुछ आदर-सत्कार किया और वहाँ का राज्य भी सौंप दिया। परंतु राज्य -सुख का उपभोग लेने के लिए अबू इसहाक बहुत दिन तक जीता न रहा। सन् 977 ई. में उसके परलोक सिधारने पर प्रजा, अमीर और उमरावों ने एकमत से जहीरा के पति को ( अर्थात हमारे पथिक को ) गजनी का बादशाह बनाया !
इस प्रकार उस पथिक का स्वप्न सग हुआ और जो कुछ दिन पहले गुलाम बनकर दीन दशा में पड़ा था, वही गरीब पथिक एक बलाढ़्य राजा हो गया। दिन के हेर-फेर ऐसे ही होते हैं।
इतिहास में सुबुक्तगीन नाम का जो अत्यंत प्रसिद्ध बादशाह हो गया, वह यही हमारा गरीब पथिक है। उसी के लड़के महमूद गजनवी ने भारतवर्ष को मुसलमानों के अधीन किया।

पप

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