केवल आसुरी सम्पत्ति पर स्थापित

भौतिक प्रभुता का फल - पं. माधवराव सप्रे

पाश्चात्य देशों की तड़क-भड़क, भौतिक सुख साधन की सम्पन्नता क्या मानव समाज को शांति दे पाती है? एकांगी भौतिक प्रगति में ही अनवति की संभावनाएं छिपी रहती हैं।
वास्तव में भौतिक प्रगति के साथ-साथ बिना आध्यात्मिक चेतना के, सच्ची सभ्यता, सच्चा सुधार और सच्ची उन्नति संभव नहीं है।
जो लोग अपना सारा ध्यान केवल शरीर की उन्नति में लगा देते हैं, उनकी मानसिक उन्नति कम होती है। शरीर और बुद्धि, इस नरदेह-रूपी तराजू के दो पल्ले हैं। दोनों की स्थिति समान होने से ही सच्ची उन्नति हो सकती है। यदि दोनों पल्लों को बराबर रखना हो तो दोनों पर बराबर बोझ रखना चाहिए। यदि कोई सिर्फ अपनी बुद्धि की उन्नति करने में ही लगा रहेगा तो उसका स्वास्थ्य ठीक न रहेगा, और यदि कोई सिर्फ शारीरिक व्यायाम ही किया करेगा तो उसके मस्तिष्क की शक्ति क्षीण होने लगेगी। तात्पर्य यह है कि शारीरिक और मानसिक, दोनों शक्तियों को समान महत्व देते हुए, दोनों की एक साथ उन्नति करना चाहिए। जो सिद्धान्त एक व्यक्ति के विषय में उपयुक्त हो सकता है वही एक राष्ट्र, देश या समाज के विषय मेें भी उपयुक्त हो सकता है, क्योंकि राष्ट्र या समाज अनेक व्यक्तियों के समूहों के भिन्न-भिन्न नाम हैं। यदि कोई राष्ट्र या समाज केवल अपनी बाहरी सम्पत्ति बढ़ाने का प्रयत्न करे - केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति में ही तन-मन-धन अर्पण कर दे - तो उसे आध्यात्मिक या आंतरिक उन्नति की ओर ध्यान देने के लिए समय ही न मिलेगा। और अन्त में, आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने की उसकी शक्ति का ह्रास होने लगेगा। इस बात के अनेक उदाहरण हमारे प्राचीन ग्रंथों तथा इतिहासों में पाए जाते हैं, पर उन्हें रहने दीजिए। इस लेख में, वर्तमान यूरोप के सभ्य राष्ट्रों की दशा देखकर, हम यह जानने का प्रयत्न करेंगे कि केवल भौतिक प्रभुता को अपना अंतिम साध्य समझने से क्या फल होता है।
वर्तमान युद्ध के पहले हम लोग यही कहा करते और सुना करते थे कि यूरोप सभ्यता के शिखर पर जा पहुँचा है - उसने जो उन्नति की है और सुधार किया है वह अलौकिक है, अतएव सब देशों के लिए अनुकरणीय है। हमारे देश के समाज-सुधारक भी यही उपदेश दिया करते थे कि यूरोप में जाति-भेद नहीं - इसलिए हमें जाति भेद का नाश कर डालना चाहिए, यूरोप में स्त्रियों को पूरी स्वाधीनता दी गई है - अतएव भारतीय महिलाओं को भी स्वतंत्र कर देना चाहिए, यूरोप में वैज्ञानिक शिक्षा से आशातीत लाभ हुआ है - यहाँ भी वैसा ही होना चाहिए, यूरोप में यंत्रों की सहायता से सुख और सम्पत्ति की अमर्यादित वृद्धि हुई है - हमें भी ऐसा ही करना चाहिए, यूरोप के समाज ने अपने सांसारिक व्यवहार-क्षेत्र से धर्म को बहिष्कृत कर दिया है, अतएव हमें भी धार्मिक बंधनों का त्याग कर देना चाहिए। मतलब यह कि सभ्यता, सुधार और उन्नति के लिए यूरोप ही हमारे लिए आदर्श का काम देता था और उसकी नकल करना ही हम अपना परम कर्तव्य समझते थे। परंतु अब, वर्तमान युद्ध में, यूरोप की सभ्यता के जो लक्षण प्रकट हो रहे हैं, उन्हें देख विचारशील पुरुषों का ध्यान यूरोप के समाज की रचना की ओर आकर्षित हुआ है। सभ्यता, सुधार और उन्नति के विषय में युद्ध के पहले जो मत सर्वमान्य हो चुके थे, अब उनमें विलक्षण क्रांति हो रही है। यूरोप की वर्तमान उन्नति का मूल मंत्र है - वैज्ञानिक आविष्कारों की सहायता से सुखोपभोग-विषयक साधनों की अमर्यादित वृद्धि करना। परंतु जब देखा गया कि जर्मनी ने वैज्ञानिक विद्या का दुरुपयोग किया है - वह निरपराधी मानव समूह का संहार करके सारी दुनिया पर अपनी सैनिक प्रभुता स्थापित करने का यत्न कर रहा है, तब यूरोप की आँखें खुली और मननशील पुरुष कहने लगे - यूरोप का समाज सचमुच सभ्यता के शिखर पर है या असभ्यता की खाई में ? क्या भौतिक सत्ता की वृद्धि ही सुधार और उन्नति का सच्चा लक्षण है ? यूरोप में अपने जीवन के उद्देश्यों को निश्चित करने में कहीं भूल तो नहीं की ?
बेकन नाम के तत्ववेत्ता का कथन है कि आधिभौतिक विद्याओं की वृद्धि मानव-जाति के सुख और संतोष के लिए होनी चाहिए। इसी से यूरोप में यह मत रूढ़ हो गया कि भौतिक विद्या की उन्नति ही सभ्यता और सुधार का प्रधान लक्षण है। परंतु पश्चिमी देशों में भौतिक विद्या का उपयोग राजकीय, सत्ता, औद्योगिक सामथ्र्य और व्यापार बढ़ाने में ही विशेष रूप से होता है। ऐसी अवस्था में तत्वज्ञों के सिद्धांत ग्रंथों में ही रह जाते हैं। देखिए, महायुद्ध के पहले जर्मनी एक अत्यंत सभ्य देश माना जाता था। परंतु उसके सब सुधारों का निरीक्षण करने से मालूम हुआ कि इस देश ने अपनी सभ्यता और उन्नति के विकास के लिए केवल भौतिक प्रभुता को ही अपना अंतिम साध्य समझा है। उनका जितना सामथ्र्य, वैभव और प्रभाव है, वह शस्त्रास्त्रों और यंत्र-कलाओं की शक्ति पर अवलम्बित है। उसकी सभ्यता से आध्यात्मिक विचारों का और उदात्त नीतिमत्ता का कोई संबंध नहीं। यदि यह बात युद्ध के पहले कही जाती तो विश्वास न करता, परंतु इस समय यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान एक स्वर से कह रहे हैं, कि जर्मनी का सारा बड़प्पन, उसकी सभ्यता और उन्नति और सुधार, केवल आसुरी सम्पत्ति पर स्थापित हैं। इस विषय का मनोरंजक वर्णन एक ग्रंथ में किया गया है। प्राचीन यूरोप के तत्ववेत्ताओं की शिक्षा और साधु पुरुष के उद्देश्यों की ओर ध्यान न देकर, जर्मनी ने केवल भौतिक विद्याओं की सहायता से अपनी प्रभुता स्थापित करने का निश्चय किया है। उसने स्वतंत्रता, समता, बंधुभाव, नीति और न्याय का नाश कर डाला है। क्या यही सभ्यता या सुधार है ?
सृष्टि के अनेक प्राणियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके डार्विन ने यह सिद्धांत निकाला है कि जो बलवान होगा वही जिंदा रह सकेगा। इसमें संदेह नहीं कि यह सिद्धांत मनुष्य के अतिरिक्त और सब प्राणियों के विषय में उपयुक्त हो सकता है। परंतु वर्तमान युद्ध ने यह प्रकट कर दिया कि उक्त सिद्धांत मनुष्य के लिए उपयुक्त है, बड़े-बड़े राष्ट्रों के लिए भी उपयुक्त है। जगत केवल बलवान और सामथ्र्यवान लोगों ही के लिए है। इसमें अशक्त, दुर्बल और दीन जनों का निर्वाह नहीं। जिस प्रकार समुद्र में ह्वेल नाम की बड़ी मछली छोटी-छोटी मछलियों को निगलकर अपना जीवन-निर्वाह करती है, उसी प्रकार बलवान राष्ट्र या समाज दूसरे राष्ट्रों या समाजों को अपने अधीन करने का प्रयत्न किया करता है। जब जर्मनी ने इसी नीति का पूरा-पूरा अवलम्बन किया, तब लोग कहने लगे -
क्या डार्विन का सिद्धांत पशु-योनि और मानव योनि के लिए एक ही सा उपयुक्त है? क्या नित्शे का शक्तिवर्धन मंत्र ही नीति का आधार-तत्व और सभ्यता का उत्तम नियम माना जाएगा? तात्पर्य यह है कि इस युद्ध ने यूरोप के बड़े-बड़े विद्वानों को इस विचार में लगा दिया है कि सभ्यता सुधार और उन्नति संबंधी पहले के सिद्धांत सच है या झूठ ? जब लोग यह देखते हैं कि ढाई वर्ष से अधिक समय बीत गया, युद्धों में करोड़ों मनुष्यों के प्राणों की आहुति हो गई, असंख्य द्रव्य का नाश किया गया तो भी अब तक रुधिरप्रिया रणचंडी के शांत और तृप्त होने के कोई लक्षण नहीं दिख पड़ते हैं, तब कहना पड़ता है कि यूरोप में जिसे सभ्यता, सुधार और उन्नति कहते हैं वह सच्ची सभ्यता, सुधार या उन्नति नहीं है। वह तो अवनति और अधोगति का स्पष्टï लक्षण है। भौतिक प्रभुता का यही फल होता है।
केवल बाहरी दृष्टि से देखने वालों को यूरोप के राष्ट्रों में उन्नति की बहुत सामग्री दिख पड़ेगी। परंतु यथार्थ दृष्टि से विचार करने पर मालूम होगा कि यहाँ अवनति का आरंभ सैकड़ों वर्षों पूर्व हो चुका था। इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान यूरोप की सभ्यता के अभिमानी यही कहते हैं - ''हमने पृथ्वी के इस खण्ड में ऐसे शक्तिशाली राज्य स्थापित किए हैं जैसे आज तक किसी ने न किए थे। हमारे भाप के इंजिन, तार, हवाई जहाज, आदि ने हमारे राष्ट्रों को अत्यंत दृढ़ कर दिया है।ÓÓ ऐसी ही ऐसी बातेें सुनकर साधारण लोगों का विश्वास हो जाता है कि यूरोप वालों का उक्त अभिमान यथार्थ है। इस पर जब वे देखते हैं कि पृथ्वी के अन्यान्य भागों पर भी यूरोप ने अपनी प्रभुता संस्थापित कर ली है तब तो यूरोप की अवनति की चिकित्सा का विषय और भी कठिन हो जाता है। साधारण दृष्टि से देखने वालों को यूरोप के देश अपनी भौतिक प्रभुता के कारण अत्यंत आश्चर्यमय प्रतीत होते हैं। यूरोप के कुछ राष्ट्रों की कुबेर की सी संपत्ति, उनके विशाल नाटक-गृह, उनके अद्भुत उद्यान, उनके सुसज्जित आरोग्यालय और उनके गगनचुम्बी बड़े-बड़े प्रसाद आदि देखकर तो कोई भी यही कहेगा कि ये सब यूरोप वालो की सभ्यता के ही निदर्शक हैं। ऐसी अवस्था में यदि कहा जाए कि यूरोप की अवनति हो रही है तो ऐसा कथन हास्योत्पादक ही समझा जाएगा। परंतु इस चित्र का दूसरा भाग बहुत कम लोगों को दिख पड़ता है। अन्धकारयुक्त झोपडि़य़ों में गरीबों का कष्टमयजीवन, अत्यंत घृणा उत्पन्न करने वाली गलियां, जीवन-कलह के लिए करुणोत्पादक व्यवसाय - यह दृश्य मनुष्यों के कनिष्ठ वर्गों में दिख पड़ता है। और कल्पनातीत व्यभिचार, उन्मादक वस्तुओं का प्रचार, प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करने से नाश होने वाली शक्ति को पूर्व स्थिति में लाने की तीव्र अभिलाषा - ये सब बातें उच्च वर्गों में पाई जाती है। क्या इन्हें कोई साधारण दृष्टि से देख जा सकता है । इसके लिए यूरोपीय समाज की रचना के तत्वों को जानने का यत्न करना चाहिए।
यद्यपि कुछ लोग बिना विचार किए ही यूरोप की सभ्यता की सफलता पर आनन्दित हो रहे हैं, तथापि थोड़े विचारशील पुरुषों का एक वर्ग ऐसा भी हो गया है जो यूरोप की सच्ची दशा को आरंभ से ही जानता था। इसका यह विश्वास था कि यूरोप उन्नति के मार्ग पर तो नहीं, किन्तु अवनति के मार्ग पर चल रहा है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में, जब यूरोप वालों का सारा उत्साह विज्ञान का उपयोग कर लेने में लग चुका था, वहाँ के कुछ विचारवान लोगों के सामने यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि यूरोपीय समाज की विचार-प्रवृत्ति उचित दिशा की ओर है या नहीं ? उन लोगों को नवीन यूरोप में उच्च विचारों की हीनता और मानव-जीवन के उदात्त उद्देश्यों का अभाव स्पष्ट दीख पड़ रहा था। जब उन लोगों ने सभ्यता के आवश्यक अंगों का, जैसे कला-कौशल, संगीत, काव्य, तात्विक और धार्मिक विचार आदि का पूरा-पूरा अभाव देखा, तब वे कहने लगे कि उन्नीसवीं सदी का यूरोप आत्मिक जीवन की दृष्टि से कदापि श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि उस समय के यूरोप के विचारों के विरुद्ध समाज की चर्चा होने लगी और यह पुकार मची कि 'मध्ययुगÓ के रहन-सहन और विचार-प्रवृत्ति की ओर फिर झुकना चाहिए। जिन लोगों ने आरंभ में ही इस प्रकार यूरोप की अवनति का सच्चा कारण जान लिया था और उसके सुधार के लिए कुछ रचनाएं भी की थीं, उन्हें समाजहितेच्छु कहते हैं। वे लोग भौतिक सत्ता और वैज्ञानिक शक्ति की नींव पर, यूरोप के नूतन समाज की रचना करना श्रेयस्कर न समझते थे। उनका मत था कि समाज-रचना के मूल तत्वों का विचार करते समय मनुष्य को केवल 'औद्योगिक जन्तुÓ बना देना बड़ी भारी भूल है। इसलिए उन्होंने उस समय के प्रचलित सिद्धांतों से किसी भिन्न सिद्धांत पर समाज की रचना करने की सूचना दी। सारांश यह कि नूतन यूरोप के समय भौतिक सत्ता और वैज्ञानिक शक्ति के विरुद्ध, अर्थात मनुष्य को केवल एक 'औद्योगिक जन्तुÓ मानने के विरुद्ध मध्य-युग को लौट जाने की जो आवाज पहले उठी थी, उसी की प्रतिध्वनि इन लोगों के सुधार-तत्वों में भी सुनाई देने लगी। मुख्य बात यह है कि यूरोप की सभ्यता, सुधार और उन्नति के ह्रास का आरंभ बहुत दिनों पहले ही हो चुका है, और अब अन्त में वह इस महायुद्ध के स्वरूप में प्रत्यक्ष दीख पड़ रहा है। इसे देवासुर-संग्राम नहीं कह सकते, जैसा कि किसी कवि ने कहा है, किन्तु यह भौतिक प्रभुता ही का परस्पर युद्ध है - यही भौतिक, प्रभुता की चरम सीमा और पतन भी है।
अब प्रश्न यह है कि क्या सचमुच ही अगस्त सन 1914 के पहले - वर्तमान युद्ध के पूर्व ही - उन्नीसवीं सदी में यूरोप की सभ्यता अवनति के मार्ग पर पैर रखा था ? जब से यूरोप में विज्ञान के आधार पर औद्योगिक सिद्धांत ही सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के मूल तत्व माने जाने लगे, क्या यथार्थ में तभी से यूरोप की वास्तविक उन्नति पर आघात होना आरंभ हो गया ? क्या उन्नीसवीं सदी में यूरोप का सारा सामाजिक जीवन क्षीण तथा मृत्यु-मुख में पड़े हुए किसी मनुष्य के समान बाह्यï उपचारों से उत्तेजित था? परंतु जब हम जानते हैं कि इसी समय यूरोप ने पृथ्वी के अधिकांश भाग पर अपनी प्रभुता स्थापित कर ली है और उसकी शक्ति गत 50-60 वर्षों में तो और अधिक हो गई है, तब यह भी प्रश्न होता है कि यदि यूरोप में सभ्यता न होती तो वह अन्य देशों को अपने अधीन कैसे रख सकता।
इन प्रश्नों का उत्तर सभ्यता के वास्तविक अर्थ पर विचार करने से दिया जा सकेगा। यदि उसका अर्थ केवल 'शक्तिशाली राज्य संस्थाÓ ही लिया जाए, तो कह सकते हैं कि यूरोप इस समय उन्नति के शिखर पर पहुंच गया है। परंतु सभ्यता का अर्थ ठीक नहीं। कोई भी विचारशील मनुष्य केवल भौतिक शक्ति को ही उन्नति और सभ्यता नहीं मानता। स्वयं यूरोपीय तत्वज्ञों ने इस मत का अनादर किया है। हाल ही में इस मत के विरुद्ध यूरोप में जोर-शोर से चर्चा हो रही है और कहा जाता है कि सभ्यता के इस अर्थ की असत्यता प्रकट करने ही के लिए हमारा मित्रदल महायुद्ध में लड़ रहा है। तात्पर्य यह है कि सभ्यता के विषय में मानव-समाज के जीवन के उद्देश्य के विषय में किसी भी विचारवान मनुष्य का ऐसा आसुरी मत नहीं हो सकता। अब यदि सभ्यता का अर्थ 'आध्यात्मिक उन्नतिÓ लिया जाए तो कहना पड़ेगा कि यूरोप ने अपनी सभ्यता एक शतक पूर्व ही खो दी है।
वर्तमान यूरोप का ध्येय या साध्य ऐसा नहीं जिससे मानवी जीवन की आध्यात्मिक उन्नति हो सके। उसका उद्देश्य मनुष्य को केवल विषय-सुख-सम्पन्न बनाने का है, जिससे वह अपना जीवन आराम से बिता सके। उसकी सभ्यता का सच्चा रहस्य - 'जीवनार्थ-कलहÓ इस शब्द-समूह से ही प्रकट हो जाता है। यह पशु-योनि का धर्म है, न कि मानव-योनि का। यूरोप के इतिहास में एक समय ऐसा था जब वहाँ मठों और आश्रम वासियों की संस्थाएं थीं। उस समय वहाँ आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुत अवसर था परंतु अब तो उस ध्येय का बिल्कुल लोप ही हो गया है। यदि आप यूरोप की वर्तमान सभ्यता का दूसरा नमूना देखना चाहते हैं तो अमेरिका की ओर देखिए। वहाँ आपको भ्रम-जात सभ्यता के सारे अंगों के पूरे-पूरे नमूने दिख पड़ेंगे। क्या अमेरिका ने मानव जीवन के स्थायी सुख के लिए किसी ऐसे तत्व का पता लगाया है, जिसे हम आदर की दृष्टि से देख सकें ? क्या उसने संसार को किसी ऐसे उच्च संगीत का आदर्श दिखलाया है जिससे सब लोग आनन्द-लाभ कर सकेें ? क्या उसने काव्य तथा नाटक मेें कोई ऐसा आविष्कार किया है जिसे हम आश्चर्य से देखें ? इसमें संदेह नहीं कि हम अमेरिका के संयुक्त स्थानों को राजकीयदृष्टि से अत्यंत विशाल राष्ट्र कह सकते हैं, और केवल इसी दृष्टि से वह सभ्य भी माना जा सकता है। अमेरिका की गगनचुम्बित इमारतें, उसका अगणित द्रव्य-संग्रह, मनुष्य के बाह्य जीवन को सुखमय बनाने के उसके अमर्यादित उपाय तथा भौतिक संपत्ति की वृद्धि के लिए उसकी अलौकिक शक्ति को देख कर कहा जा सकता है कि यूरोप की सभ्यता का यह एक अच्छा नमूना है। अमेरिका में सुवर्ण-मुद्राओं की अपरिमित उत्पत्ति है और सुवर्ण मुद्रा ही अमेरिका के जीवन का मूल हेतु है। ठीक यही दशा वर्तमान यूरोप की भी है। परंतु यूरोप और अमेरिका में कुछ भेद है। सुवर्ण-मुद्राओं की इतनी महत्ता बढ़ जाने के पहले ही यूरोप में सच्ची सभ्यता का कुछ प्रचार हो चुका था। प्राचीन समय में उसकी आत्मिक जागृति थी और उस शक्ति का उसने कुछ अनुभव भी किया था। परंतु इधर कई सदियों से उसका उपयोग न होने के कारण वह मलिन हो गई है - उसका सर्वथा नाश नहीं हुआ, इसलिए वर्तमान समय में भी उसका कुछ असर यूरोप के सामाजिक जीवन पर दीख पड़ता है।
उपर्युक्त विवेचन से यह बात प्रकट हो जाएगी कि यूरोप की दुर्दशा का कारण मानव-जीवन के विषय में उच्च तथा उदात्त विचारों का अभाव ही है। यह केवल भौतिक प्रभुता का स्वाभाविक फल है जो युद्ध में दीख पड़ रहा है। इस ह्ïास के कारणों का क्रम देखा जाए तो पहली बात यह मालूम होगी कि वर्तमान यूरोप की भ्रममूलक सभ्यता की जड़ उस सिद्धांत में है जिसे अंगरे•ाी में विद्या का पुनरुद्धार कहते हैं। जब से इसने वहाँ प्रवेश किया, समझ लीजिए, तभी से यूरोप के बुरे दिन आरंंभ हुए। तभी से बुद्धि की उन्नति की ओर यूरोप का ध्यान हद से जियादह आकर्षित हो गया और यही उसकी असफलता का मूल कारण है। यूरोपीय समाज पर इस सिद्धांत का बहुत बड़ा परिणाम हुआ है। मनुष्य के जीवन में केवल बुद्धि की उन्नति ही को सबसे श्रेष्ठ स्थान दिया जाने लगा। बुद्धि की पूजा करते-करते अंत में विज्ञान ही की सहायता अपेक्षित है। परंतु विज्ञान के विषय में पूर्ण आदर रखते हुए भी कहा जा सकता है कि मनुष्यत्व का प्रश्न इतना सरल नहीं है, जो केवल भौतिक विज्ञान की सहायता से हल हो जाए।
विज्ञान-वेत्ताओं की समझ है कि वे मानवी जीवन के सुखों की वृद्धि कर रहे हैं। परंतु यह विषय अत्यंत वादग्रस्त है। विज्ञान से जो हानि है, वह उसके लाभ से कहीं अधिक है। उसका उदाहरण केवल वर्तमान युद्ध मेें नहीं, किंतु इसके पहले भी यूरोप की सामाजिक अवस्था में भली-भाँति दीख पड़ता है। वैज्ञानिक विद्या की उन्नति से मनुष्य की मनुष्यता केवल यंत्रों और कलों से नापी जाने लगी, चित्तवृत्ति के उदात्त भावों की ओर कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया।
यहाँ तक इस बात का विचार हो गया कि सामाजिक जीवन में भौतिक प्रभुता ही को प्रधान स्थान दे देने से यूरोप की सभ्यता कितनी अवनत दशा को पहुंच गई है, इसका कुछ सुधार करने के लिए यूरोप के समाज-सुधार-इच्छुकों और उपोयगितावादियों के द्वारा जो प्रयत्न किया गया, उसमें किसी-न-किसी रूप से भौतिक प्रभुता ही को महत्व का स्थान मिला है। पहले दल के लोगों ने मनुष्य को केवल 'आर्थिक जन्तुÓ बना डाला और दूसरे दल वालों ने अपनी नीति की परिपुष्टि के लिए बाह्य दृष्टि-इन्द्रिय-सुख ही का आधार ग्रहण किया। परिणाम यह हुआ कि प्रयत्न करने पर भी यूरोप का अध:पतन रोका न जा सका। उसकी रक्षा का सच्चा उपाय तो यही है कि वह अपनी अमर्यादित राज्य-वृद्धि की तृष्णा का त्याग कर दे। अरिस्टॉटल का यह मत था कि मनुष्य 'राजनैतिक जन्तुÓ है। यूरोप ने अपनी सभ्यता की वृद्धि के लिए इसी मत को स्वीकार किया है। देखिए, अकेले आक्सफोर्ड विश्वविद्मालय में ही इस मत की शिक्षा देने के लिए प्रति वर्ष 7,50,000 रुपए खर्च किए जाते हैं। इस साम्राज्य-तृष्णा के कारण जो ईष्र्या दीख पड़ती है, उसका शब्द-चित्र कई लेखकों ने खींचा है। वह मनन करने योग्य है।
दूसरी आवश्यक बात यह है कि यूरोप के वैज्ञानिक विद्वान प्रकृति के साथ - सृष्टि के साथ - मित्र-भाव का आचरण करें। प्रकृति को जीत लेने का उनका प्रयत्न केवल अमानुष कहलाएगा। मनुष्य भी प्रकृति का एक स्वाभाविक अंग है। उसे प्रकृति के साथ हिल-मिलकर रहना ही उचित है। मनुष्य केवल भौतिक जीव नहीं, केवल औद्योगिक जीव नहीं, केवल आर्थिक जीव नहीं और न केवल राजनैतिक जीव ही है। यदि वह कुछ है, तो वह सिर्फ आध्यात्मिक जीव है। जब तक यूरोप अपने आधिभौतिक ध्येय को बदल न देगा और आध्यात्मिक ध्येय को स्वीकार न करेगा, तब तक न तो सच्ची सभ्यता प्राप्त कर सकेगा, न सच्चा सुधार, न सच्ची उन्नति।

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