खूबियों का बखान

श्रीमती साधना त्यागी
गैर पेशेवर
चेतन बहुत खुश थे। कई वर्ष पूर्व प्रशिक्षण संस्थान में उनके साथ आधारभूत प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले सिन्हा साहब उनके कार्यालय प्रमुख के रूप में जिला चकबन्दी अधिकारी पदस्थ होकर कार्यभार ग्रहण करने जो आ रहे थे। चेतन व बड़े साहब दोनों ही राज्य के पब्लिक सर्विस कमीशन से चयनित अधिकारी थे। फर्क इतना था कि बड़े साहब प्रथम वर्ग राजपत्रित सेवा में चयनित हुए थे जबकि चेतन का चयन तृतीय वर्ग कार्यपालिक अधिकारी के रूप में हुआ था। बड़े साहब से अपनी जान पहचान के संबंध में जब उन्होने सहायक जिला चकबन्दी अधिकारी वर्मा जी को बताया तो वे भी चेतन स्वरूप से काफी इम्प्रेस हुए। नतीजा यह निकला कि बड़े साहब के लिए सर्किट हाउस की व्यवस्था से लेकर उनके कार्यालय कक्ष की व्यवस्थाओं तक की संपूर्ण जिम्मेदारी चेतन को ही सौंप दी गई। चेतन ने भी इसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। बड़े साहब सर्किट हाउस में नाश्ते में क्या लेंगे? उनके लिए ड्राय फ्रूट्स व फल कहां से लये जायेंगे ? इस सब के लिए, चेतन ने पूरे शहर की दुकानें छानकर सर्वश्रेष्ठ मेवे व फल खरीदे। निर्धारित तिथि को जब बड़े साहब स्टेशन पर सुबह ट्रेन से उतरे तो स्वागत करने वालों में सबसे आगे चेतन ही थे। बड़े साहब भी चेतन से काफी गर्मजोशी से मिले जिससे चेतन की धाक अपने साथियों पर और भी ज्यादा जम गई।
दोपहर पश्चात बड़े साहब कार्यभार ग्रहण करने कार्यालय पहुंचे। वैसे तो बड़े साहब पूर्वान्ह में ही जिला मुख्यालय आ गये थे परन्तु संभवतः ज्योतिषि की सलाह पर शुभ महुर्त वे दोपहर पश्चात कार्यभार ग्रहण करने पंहुचे थे। बड़े साहब की नजदीकी का ध्यान में रखकर स्वागत समारोह के संचालन का दायित्व चेतन को ही सौंपा गया था। वैसे पूर्व में इस तरह के कार्यक्रमों का संचालन वर्मा साहब ही करते रहे थे परन्तु नये साहब के बारे में अधिक मालूमात न होने के कारण वर्मा जी ने इस कार्यक्रम का संचालन हाथ में नहीं लिया था।
भव्य स्वागत समारोह में कार्यालय के सभी वरिष्ठ अधिकारियों-कर्मचारियों ने पुष्पहार एवं पुष्प गुच्छों से बडे़ साहब का स्वागत किया। कर्मचारी यूनियन के नेताओं तथा महिला कर्मियों के गु्रप की ओर से अपनी ताकत का अहसास कराते हुए बड़े साहब को काफी मंहगी पुष्प मालायें व पुष्पगुच्छ भेंट किए गए। स्वागत के समय वक्तव्य के लिए सभी शाखाओं के प्रभारी अधिकारियों, कार्यालय अधीे व कर्मचारी नेताओं तथा महिला प्रतिनिधियों को बुलाया गया। स्वागत समारोह का संचालन करते समय चेतन अपनी ओर से साहब की खूबियों का बखान करते जा रहे थे।
चेतन की निगाह में ईमानदार होना सबसे बड़ा गुण था, अतः वे बड़े साहब के बारे में बार-बार यह कहते रहे कि बड़े साहब एकदम सख्त मिज़ाज के अत्यन्त ईमानदार अधिकारी हंै, जो कायदे-कानून से हटकर कोई कार्य करना पसंद नहीं करते। चेतन ऐसा बेवजह नहीं कर रहे थे। प्रशिक्षण के दौरान बातचीत में बड़े साहब ने लगातार अपना यही मूल सिद्धांत उन्हें बताया था। स्वागत में चेतन द्वारा बार-बार ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ आदि विशेषणों से विभूषित किये जाने को लेकर बड़े साहब थोड़ा असहज से नजर आ रहे थे, यह चेतन ने भी महसूस किया परन्तु आगे आने वाली विपदा का अहसास शायद उसे नहीं हो पाया था।
स्वागत समारोह के पश्चात बड़े साहब ने चेतन को अपने कक्ष में बुलाया और लगे बुरी तरह फटकारने। ‘‘तुम्हे किसने कहा था कि मुझे सबके सामने ईमानदार व कायदे-कानून से काम करने वाला बताओ। तुमने मेरी आधी आमदनी का कबाड़ा कर दिया है। अब कोई क्षेत्रीय अधिकारी महीनों मेरे पास क्यों आयेगा? क्या जरूरत थी आपको इस तरह की अर्नगल काल्पनिक तारीफ करने की? क्या तुम्हें पता है कि मंैने इस पदस्थापना के लिए 10 लाख रूपये भेंट किए हैं? उसकी भरपाई क्या तुम्हारा बाप करेगा?’’
चेतन स्वरूप बेचारे तो असमान से गिरे परन्तु खजूर में न अटकते हुए सीधे खाई में ही जा गिरे। उन्हें सपने में भी यह भान नहीं था कि प्रशिक्षण संस्थान में आदर्श की बड़ी-बड़ी बातें बधारने वाला अधिकारी पाॅच वर्ष के अंतराल में ही इतना अधिक बदल जायेगा। उन्होंने हिम्मत कर बड़े साहब को उनके पांच वर्ष पूर्व के वचन याद दिलाना चाहा तो साहब ने सीधे कहा, तब में प्रशिक्षु अधिकारी था जो वास्तविकता में नहीं ख्वाब में जीता था। अब मैं पांच वर्ष की वरिष्ठता वाला तर्जुेबेकार अधिकारी हूँ जो यह जान गया है कि व्यवस्था के साथ कैसे चला जाता है। बड़े साहब ने इसके साथ ही चेतन को अत्यन्त गैर पेशेवर करार देते हुए कमरे से बाहर कर दिया।
अब चेतन उन अवांछित कर्मचारियों में था जिनका मुंह भी देखना बड़े साहब गंवारा नहीं करते थे। बड़े साहब ने अपने स्टेनो को बुलाकर अपने पूर्वाधिकारियों के समय बंगले आदि की व्यवस्था करने वाले शर्मा जी का पूरा विवरण प्राप्त कर उन्हें तत्काल अपने कक्ष में बुलवाया। उसी शाम से शर्मा जी बड़े साहब के बंगले एवं अन्य निजी व्यवस्थाओं के इंचार्ज बन गये। माह के अंत तक चेतन का तबादला मुख्यालय से अन्यत्र हो गया।
लोगों में यह चर्चा का ज्वलंत विषय बन गया था कि आखिर बड़े साहब ने किस कारण चेतन का तबादला जिले के सबसे दूरस्थ कार्यालय में कर दिया? अंत में गहन विचार विमर्श के उपरांत वे इस निष्कर्ष पर पंहुचे कि साहब व्यक्तिगत जान पहचान को भी व्यवहारिकता के आड़े नही आने देते हैं और अपने उसूल के पक्के हैं। नौकरी की वास्तविकता का ज्ञान रखने वाले सभी अधिकारी शनैः शनैः बड़े साहब से सौजन्य भेंट कर सौजन्य स्थापित करने में जुट गये। दूसरी ओर ईमानदारी को मूल मंत्र मानने वाले चेतन गैर पेशेवर एवं अव्यवाहिरक घोषित किये जाकर दूध से मक्खी की तरह बाहर निकाल दिए गए।

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