गुरु का मुक्का

प्रथा आधुनिक है। जब किसी से मिलो तो उसे अपने बारे में अनुमान लगाने का कष्ट मत दो। अपना नाम-धाम बताओ और सीधे काम में लग जाओ। व्यावहारिक दृष्टि से यह अच्छी आदत है लेकिन जीवन क्या व्यावहारिकता का पर्याय है?

उस दिन रायपुर से डॉ. राजेंद्र मिश्र आये, कहने लगे 'मैं... राजेंद्र मिश्र हूँ।'
राजेंद्र मिश्र की यह आधुनिक आदत शुरु-शुरु में अच्छी लगती थी, बहुत अच्छी लगती थी, क्योंकि में कभी-कभी अपने अंतरंग मित्रों का नाम भी भूल जाता हूं, बड़ दुख होता है कि वे बातें...... हूँ ऐसा अनुभव आने लगता है और मुक्ति का कोई मार्ग नहीं। अब यह आदत अच्छी नहीं लगती। मुझे अपनी ही एक हरकत याद आता है, राजेंद्र की आदत से मिलती-जुलती है। मैं जब कभी अमृतराय से मिलता हूं तो अपना नाम-धाम जरुर बताता हूं उन्होंने एक दिन कुछ झुंझलाकर कहा था, 'भाई, तुम यह क्या करते हो?' तो मैं उन्हें बताता-बताता रह गया कि भाई अमृत राज जी। आपको मैंने जब पहली बार देखा तो बहुत प्रभावित हुआ था, एक सुखद आश्चर्य से भर गया था कि एक मूंछों वाले बाप के घर में इतना खूबसूरत, बुद्धिमान और मासूम पुत्र कैसे पैदा हो सकता है। मैं अपने इस आश्चर्य को कभी लांघ नहीं सका।
अमृत से मिलने की इच्छा!
लेकिन अमृत को कोई, जाने या अनजाने, झंझट में नहीं फंसा सकता, कोई कितनी भी ईष्र्या, नफरत या कमीनेपन की नजर से उन्हें देखें, उन पर कुछ असर नहीं पड़ता, उनका एक अट्ठहास आता है और बेरावान फ्लैश की तरह समूची दुर्गंध को धड़धड़ करके बहा ले जाता है।
पिछली बार एक मुकदमे के सिलसिले में इलाहाबाद जाना हुआ। मेरे दिल में इस बार यह इच्छा थी कि अमृतराय से मिलते समय नाम-धाम न बताने का प्रयास करूंगा। हीनभाव को खत्म करने के लिए आधुनिक हिंदी कथा साहित्य के महान हस्ताक्षर बामपक्षी दर्शन के दुर्धेश सेनानी और अब श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा नियुक्त अतिरिक्त दूरदर्शन-महानिदेशक कमलेश्वर का संबल साथ था। कमलेश्वर बड़े सभ्य, संवेदनशील, मिष्ठभाषी मित्र हैं। मैंने उनसे कहा 'यार! अमृतराय के शहर में आये हैं। उनसे मिलना चाहिएÓ तो मेरी तरफ देखने लगे जिसका अर्थ था- तोवे क्या करें।
वे तपाक से बोले, 'क्यों नहीं।Ó जरूर मिलना चाहिए, यहीं तो रहते हैं। इस सरकारी बंगले के पीछे उधर हेमवतीनंदन बहुराणा रहते हैं, लेकिन वे आजकल दिल्ली में ही हैं। अमृतराय का बंगला इस सरकारी बंगले से भी बड़ा है।?
दृष्टि दूषित को दृश्य असुंदर
कमलेश्वर के आसपास कोई चीज है जो उनके या किसी के भी हीनभाव को निरंतर लतियाती रहती है। मेरे दिल में यह ख्याल पैदा हुआ कि बड़े बंगले का बड़ा दरवाजा होगा। दरवाजे पर दरबान बैठा होगा, दरबान बैठा होगा तो पूछेगा भी- कौन हो, क्या काम है, कहा से आये हो?
अब तक इलाहाबाद की सांस्कृतिक छवि मेरे मन में इस तरह उभर रही थी कि वहां कोई गथा (मुझसा) भी आकर बसेगा, तो लेखर बन जायेगा और कहां यह तकलीफ होने लगी कि देखो कितनी बदल गयी दुनिया धनपत ाय जी की। उनके पुत्र से मिलने की इच्छा है और वह अपने दरवाजे से इतने दूर पीछे रहने लगा है कि अपना नामधाम चीखकर भी उसके कान तक नहीं पहुंचाया जा सकता।
उठो, बढ़ो काम करके जाओ
आदमी और आदमी में यही तो फर्क होता है। मेरी जगह कमलेश्वर होता तो धमाके के साथ अंदर घुसता और दरबान इतने संभलता अपना काम करके वह मुसकरा हुआ लौट भी आता है मैं हूं कि चार दिनों से सोच विचार में ही पड़ा हुआ हूं।
सच पूछो तो मुझसे राजेंद्र मिश्र ही अधिक उन्मेषकारी आती है। दुआ-सलाम, यथार्भाग्य काम और राम-राम करके अपने गांव चला जाता है कोई ऊहापोह नहीं।
अबकी बार राजेंद्र मिश्र आये तो उनके साथ उनकी नन्ही-मुन्नी पुत्री भी थी। बातचीत की गहमागहमी से हमलोग थोड़ उबरे तो उसका परिचय कराया गया (नाम फिर स्मृति से निक गया है) और मेरा परिचय उसे दिया गया।
इस बालिका को न जाने क्या हो गया कि वह अपनी पतलियों को पलकों की जकड़ में लेकर अपनी गुलाब सी मुट्ठी को प्रहार मुद्रा में हमारी तरफ तान रही थी, मैं तो चकित रह गया राजेंद्र ने उससे कहा 'चाचा से नाराज होÓ
लोग मुक्के की भाषा समझते हैं
'हाँ, नाराज हैं, मारेंगेÓ
उन्होंने मिलकर उसे समझाया, 'नन्ही। मारने अच्छा नहीं, यह चाचार मार खाने वाला नहीं। तुम खामखां मुक्का तान रही हो।Ó
छोटी प्यारी-प्यारी, गुडिय़ा जैसी थी चली गयी तो उसको याद आती रही, उसका मासूम शैतान गुस्सा कितना लुभावना था। मैं कहता-कहता रह गया कि उसका एक मुक्का तो अपनी खोपड़ी पर पड़ जाने दो भाई।
मैं वाकई हतप्रभ रह गया था। पहले तो मुझे लगा कि उस दिव्यात्मा ने मेरे अंदर वाले दृष्ट को पहचान लिया है। बच्चे तो भगवान का रुप होते हैं। उनकी दृष्टि त्रिकालदर्शी होती है। कितना संवारकर हमने अपने बहिरंग को दुनिया के सामने पेश किया है, लेकिन उसने तो हकीकत को जान ही लिया। उसकी मुट्ठी में सचमुच देवराज इंद्र का बल होगा।
होश आया तो बात कुछ उजागर होने लगी थीं। उस मुन्नी हमसे क्या शिकायत हो सकती थी, हमारी तीन पीढिय़ों के बद्धि पुण्य से परिपत थी, उसकी तरफ सर्वप्रथम हमारी नजर जानी चाहि थी। उसकी आवभगत सबसे पहले की जाना चाहिए थी और हम- मैं राजेंद्र, चतुवेदी और एक और साथी, सारी दुनिया के मूल्यांकन में उलझे हुये, उसकी तरफ से उदासीन हो गये थे।
पर उसे हमारी मशगलियत में क्या दिलचस्पी हो सकती थी। उसने मुक्का तानकर अपने अस्तित्व की पहचान करवा ली थी, उसने हम सबको यह बता दिया था कि पिछली पीढ़ी वालों, तुम्हें बातें करने की आदत पड़ गयी है, तुम्हें मुक्के के अलावा कोई चीज सही रास्ते पर नहीं ला सकती।
बुनियादी सवाल अनुत्तरित
सारी बात तो इस प्रश्न पर आकर अटक जाती है- तुम कौने हो, कहां से आये हो, क्या काम है? उम्र का लंबा हिस्सा गुजर गया इसी सवालों में से एक का भी उत्तर कभी खोजने की हमने कोशिश नहीं की, उस मुन्नी को कैसे मालूम हो गया कि हम कौन है और मुक्का खाये बिना इस बेनियादी सवालों के जवाब हमें कभी न दे सकेंगे। हमें वे सब बातें अजीब लगती है, जो छोटी उम्र वाले करते हैं, उस तीन वर्ष की बच्ची को अपन अस्मिता का भान है। बारह, चौदह और बीत वर्ष के लोग जब मुक्का तानकर नये भारत के निर्माण की बातें करते हैं तो उनके लिए हमारे मन में सम्मान का भाव जाग्रत नहीं होता होगा भी कैसे जबकि हम बने-बनाये समाज को ही संभालकर नहीं रख पा रहे हैं।
दर्शन अलग कर्म अलग
हमारा दर्शन अलग है, कर्म अलग है, कर्मों के फल की उम्मीदें अलग हैं, फलों की प्रतिक्रिया अलग हैं, केवल एक बात में यह सब एक हैं कि कुछ तो नहीं हो रहा है इस वक्तव्य में से एक धारणा बड़ी स्पष्टता के साथ ध्वनित होती है कि जो कुछ भी होना है वह किसी दूसरे को ही करना है। हमें सिर्फ कहते रहना है कि लोग ठीक काम नहीं कर रहे हैं।
नाम में क्या धरा है!
मेरा क्या नाम है, तुम्हारा क्या नाम है, उनका क्या नाम है? मानों कि हमें विधाता के लिये, या पुलिस की किसी गुप्त कार्यवाही के लिये नामों की सूची तैयार करनी है और तायार करके यह भी नहीं जानना है कि सूची का हुआ क्या?
अबकी बार राजेंद्र मिश्र मिलेगे और वे अपना नाम बताएंगे तो हम उनकी तरफ मुक्का तानेंगे, अबकी बार हम इलाहाबाद जायेंगे तो मुट्ठी तानते हुए अमृतराय के बंगले में घुसेंगे, चाहे वह मुट्ठी उनके दरबान के लिए चुनौती ही क्यों न बन जाये, प्यार भी करना है तो मुट्टी तानकर करना होगा, वरना सब प्रेमास्पद बैठे अपने घर।
वह नन्ही-मुन्नी हमारी गुरु है, वरना.............. ताना है मुक्का हमारी तरफ आजतक। लेकिन हमने ऐसा क्या किया है जो हमारी तरफ मुक्का न ताना जाये। कोई बालिग हमसें ऐसा ही कहा- जिसे अपनी हैसियत का सत्ता हो। हमें तो आगे-आगे अपनी वल्दियत बताने के बाद भी यह भसोरा नहीं हो पायेगा कि हमने अपना पूरा परिचय दिया कि नहीं दिया।

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