छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य परंपरा डॉ. श्रीमती श्रद्धा चंद्राकर

लोकनाट्य के लिए कई शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जैसे-लोकनाट्य, जनपद नाटक, पारंपारिक नाटक, ट्रेडीशनल नाटक, आनुष्ठानिक आर्ट किंतु ये सब गढ़े हुए आधुनिक शब्द हैं। लोकनाटक का सीधा-सादा अर्थ है, वह लोगों के साथ रहा है। किसी विद्वान ने बहुत अच्छी बात कही है कि लोटनाटक का प्रारंभ नहीं होता और अंत नहीं होता। वह हमेशा लोगों के साथ रहा है और रहता रहेगा। जिस दिन वह लोगों के साथ नहीं रहेगा वह मर जायेगा, खत्म हो जाएगा। कुछ ऐसे लोकनाट्य हैं जो खत्म हो चुके हैं।

लोकनाट्य के पीछे कोई शास्त्रीय योजना नहीं होती, वह लोकमानस का प्रतिबिंब है।

छत्तीसगढ़ का प्राण है-लोककला। लोककला और लोक संस्कृति ऐसी गुंफित है कि इसे अलग माना ही नहीं जा सकता। यहाँ वर्ष भर पर्व, उत्सव, तीज-त्यौहार मनाया जाता है। उसमें गीत, संगीत, नृत्य, अभिनय का आनंद रुपी रस भरा होता है। छत्तीसगढ़ का समूचा अंचल एक ऐसा कलागत लयात्मक संसार है जहां से जन्म से लेकर मरण तक सारी हलचलें लय, ताल, और संगीत के धागे से गुथीं है। कला गर्भा इस धरती की कोख से ही नृत्य, संगीत, वाद्य, अभिनय इन सभी विधाओं, विशिष्ट गुणों से युक्त अनश्वर लोकमंचीय कला सृष्टि का जन्म हुआ जिसे हम लोकनाट्य 'नाचा' कहते हैं।

अभिनव गुप्त अपनी वाख्या में स्पष्ट करते हैं- 'नाटक अर्थात वाचिक अभिनय अथवा रूपको का गद्य भाग गीत अभिनव तथा रस ये चारों नाट्य के प्रमुख अंग है।Ó

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