छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी

भूमिका - छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण एक ऐतिहासिक घटना है। यह दो करोड़ से अधिक छत्तीसगढिय़ों के स्वप्न का यथार्थ स्वरूप है। इस राज्य निर्माण से बरसों का वह स्वप्न सच हुआ जिसमें हमने विकास और अपनी अस्मिता के लिए सुखद फल का अनुभव किया था। आज राज्य निर्माण को पंद्रह बरस हो चुके हैं, हमारा स्वप्न किस हद तक साकार हुआ है यह अलग बात है, और उसके लिए हमारा निरंतर संघर्ष भी जारी है। दूसरी ओर राज्य निर्माण का श्रेय लेने की होड़ भी आज तक मची हुई है। राज्य निर्माण के वास्तविक स्वप्नदृष्टा और उसे फलीभूत कराने वाले सेनापति से लेकर सिपाही कौन हैं, यह उन लोगों के लिए जिज्ञासा और अनुसंधान का विषय था जो सच को नहीं जानते। इस सत्य से साक्षात्कार कराने प्रस्तुत है यह ग्रंथ।

इस ग्रंथ को उन लोगों ने तैयार किया है जो राज्य निर्माण के संघर्ष की यात्रा के सच्चे सिपाही हैं। राज्य निर्माण का स्वप्न भले ही बरसों पहले हमारे पुरखों ने देखा होगा लेकिन उसे यथार्थ में बदलने का स्वप्न और उसके लिए नींव का पत्थर रखने का कार्य किया है। छत्तीसगढ़ के महान स्वतंत्रता सेनानी और योगनिष्ठ आचार्य नरेन्द्र दुबे जी ने। छत्तीसगढ़ी समाज के बैनर तले उनके सहयोगी संगठनों ने संघर्ष की ऐसी भूमि तैयार की जिससे देश के केंद्र में हलचल होने लगी। अत्यंत अल्प संसाधनों लेकिन दृढ़ प्रतिज्ञा समर्पण और कर्मनिष्ठा के साथ छत्तीसगढ़ी समाज के कार्यकर्ताओं ने बरसों तक संघर्ष किया। इस संघर्ष के लिए प्रेरक अस्त्र के रूप में प्रयोग हुई छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक संस्कृति और खेत-खलिहानों में बहते पसीने की खुशबू। हमारे युवा छात्र और नौजवानों से लेकर मेहतनकश हाथों में छत्तीसगढ़ की तकदीर देखने वाले मजदूरों और उन्हें चेतना का स्वर देने वाले बुद्धिजीवियों ने इस मसाल की ज्योति को बरसों तक जलाये रखा। सैकड़ो आंदोलनों, धरना, प्रदर्शन, गिरफ्तारी, यातना और तनाव को आत्मसात करते हुए छत्तीसगढ़ी समाज के कार्यकर्ताओं ने देश में अलग ही मिसाल प्रस्तुत की।

ऐसा माना जाता है कि छत्तीसगढ़ राज्य का आंदोलन बिना किसी खून खराबे के हो गया। तथ्यों को खंगालने से यह ज्ञात होता है कि तत्कालीन प्रशासकों ने शंातिपूर्ण आंदोलन को कुचलने के लिए अनेकों दमन किए परंतु समाज के होनहार कार्यकर्ताओं ने संयम रखा। साथ ही यह आंदोलन देश का एक ऐसा आंदोलन भी था जिसकी बुनियाद साहित्य, समाज और संस्कृति के सृजनकारों के आसपास केंद्रित रही । राजनेता बारबार करवट बदलते रहे और राज्य निर्माण को हाशिये में डालने का प्रयास करते रहे। बहरहाल इस पुस्तक में अनेक प्रमाणों, तथ्यों, घटनाओं के प्रसंगों और सबूतों के आधार पर प्रामाणिक संघर्ष गाथा को शब्दों के सहारे लिखित स्वरूप दिया गया है। इस पुस्तक के बाद अल्पज्ञात जिज्ञासुओं को ज्ञान का वास्तविक संसार मिलेगा और वे स्वयं अनुभव कर सकेंगे कि राज्य निर्माण आंदोलन के वास्तविक सेपापति और सिपाही कौन हैं ?
पुस्तक को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से पांच अध्यायों और आठ परिशिष्टों में बांटा गया है। प्रथम अध्याय में ही आंदोलन के प्रथम चरण से लेकर उसकी युवा अवस्था में आने के सिलसिले को प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। सन 1965 से लेकर सन 1979 का यह सफर वास्तव में कठिन किंतु वास्तविक संघर्ष का सफर था। इसके पहले छत्तीसगढ़ के परिवेश और इतिहास से लेकर अन्य स्वप्नदृष्टाओं और चेतना के अंकुर रूपी घटनाओं को भी पूरी ईमानदारी के साथ संकलित किया गया है। राज्य के निर्माण की आवश्यकता क्यों हुई, इस पर भी चर्चा की गई है। भयावह शोषण, उपेक्षा, राजनैतिक और आर्थिक लूट के तथ्यों की भी झलक दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ी समाज ने इस चौतरफा शोषण, उपेक्षा, आतंक की पीड़ा का अनुभव किया, भोगा तथा उठ खड़े होने का प्रण किया। आचार्य दुबे ने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक शोषण की बेडिय़ों से मुक्त होने के लिए खुला आह्वान किया और जुट गए सैकड़ों साथियों के साथ लंबी यात्रा के लिए।
द्वितीय अध्याय में आपातकाल की वह विभीषिका चित्रित हुई जो राज्य आंदोलन के सिपाहियों को कुचलने का अस्त्र बनी। इस आतंक और दमन के समय को भी साथी झेल गए पर आंदोलन जारी रहा। 1978 के बाद आंदोलन में तेजी आई और छत्तीसगढ़ी समाज एक बड़ी ताकत बन कर उभर गया। इस दौरान समाज ने अपने आप को साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से पुष्ट किया। छात्र युवा किसान और मजदूर बड़ी संख्या में जुटते गए। अनिल दुबे जैसा एक युवा छात्र नेता इस राज्य को इसी काल में मिला जिसने प्रदेश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में विजय प्राप्त किया। हजारों छात्र उनके साथ जुड़ते गए। इस शक्ति को राज्य निर्माण के आंदोलन में प्रयोग किया गया। तृतीय अध्याय में छत्तीसगढ़ी सेवक जैसे प्रथम छत्तीसगढ़ी अखबार के योगदान का जिक्र है। बिना भाषा की ताकत के कोई वैचारिक आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सकता। तीन नए बने राज्यों में एकमात्र छत्तीसगढ़ ही है जिसकी अपनी एक बड़ी संपर्क भाषा थी जिसने भावनात्मक रूप से सबको एकजुट कर दिया। छत्तीसगढ़ी सेवक ने छत्तीसगढ़ी के माध्यम से जन भावनाओं को स्वर दिया और अस्मिता बोध का अनुभव छत्तीसगढिय़ों को होने लगा।
चतुर्थ अध्याय में राज्य आंदोलन में छात्र और युवाओं का योगदान को क्रमवार रेखांकित किया गया है। स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार दिलाने हेतु छात्र संगठन के बैनर तले भिलाई इस्पात संयंत्र से लेकर क्षेत्र के सभी संयंत्रों, उद्योगों आदि में स्थानीय युवाओं की नियुक्ति के लिए सड़क में उतर कर संघर्ष किया। हजारों युवा और छात्र की रैलियां, प्रदर्शन तथा गिरफ्तारी ने ऐसा माहौल तैयार किया कि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलने लगा। दूसरी ओर इन युवाओं को यह बोध हुआ कि हमारी जमीन, हमारा जंगल, हमारा पानी लेकर शोषक आर्थिक लूट मचाये हुए हैं इस पर विराम लगाना है। यह बोध राज्य आंदोलन की ओर मुड़ते चला गया क्योंकि यह अपने राज्य में ही संभव था।
पांचवे अध्याय में मजदूर और किसान आंदोलन का जिक्र है। छत्तीसगढ़ी समाज के मजदूर संगठनों ने स्थानीय श्रमिकों के शोषण के खिलाफ व्यापक संघर्ष किया और साथ ही राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करने उन्हें प्रेरित किया। इन अध्यायों के अलावा आठ परिशिष्ट इस ग्रंथ के प्राण हैं। इसके सहारे ही अध्यायों में जिक्र घटनाओं और प्रसंगों की तथ्यपरक पुष्टि होती है। इनमें मांगपत्रों, अखबारों में प्रकाशित समाचारों, छायाचित्रों आदि का समावेश हुआ है।
इस तरह तथ्यों और प्रमाण के सहारे इतिहास के सच को फिर से लिखित रूप में प्रस्तुत कर संपादक मंडल ने बड़ा ही पुण्य का कार्य किया है। राज्य निर्माण के इस इतिहास से नुसंधानकर्ताओं को तो लाभ होगा ही, साथ ही पूरे देश में इसके व्यापक प्रसार होने से छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के लक्ष्यों और वास्तविक रूप का भी ज्ञान होगा। आज यह संघर्ष और भी त्याग की मांग कर रहा है क्योंकि जो स्वप्न देखकर हमने संघर्ष किया था, वह लगभग अधूरा है। शोषणकर्ताओं के चेहरे और संगठन बदल चुके हैं लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारा शोषण जारी है। इस इतिहास की गाथा से नई पीढ़ी अपनी अस्मिता, अपनी भाषा और अपने अधिकारों के लिए नई ताकत से उठ खड़ी होगी, इसी प्रत्याशा में इस पुस्तक को एक ज्योति पुंज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक में उल्लिखित विचारों से सहमति और असहमति भी हो सकती है। इसलिये हम सुझावों का स्वागत करते हंै।

संपादक मंडल

Tags: