छत्तीसगढ़ी-प्रतिनिधि उपन्यासों में अस्मिता-बोध

छत्तीसगढ़ी-प्रतिनिधि उपन्यासों में अस्मिता-बोध
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़
के
कला-संकाय के अंतर्गत हिंदी विषय
में पी-एच.डी.
उपाधि हेतु प्रस्तुत
शोध प्रबंध
2015
शोधछात्रा
श्रीमती दुलारी चन्द्राकर
कल्याण स्नातकोत्तर
महाविद्यालय,
भिलाईनगर, (छत्तीसगढ़)
सह-निर्देशक
डॉ. फिरोजा जाफर अली
सहायक प्राध्यापक
कल्याण स्नातकोत्तर
महाविद्यालय,
भिलाईनगर, (छत्तीसगढ़)
अध्ययन-केंद्र
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय
भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)
निर्देशक
डॉ. तीर्थेश्वर सिंह
आचार्य - इंदिरा गांधी
राष्ट्रीय जनजाति वि.वि.
अमरकंटक (म.प्र.)
पप
आभार
श¨धकार्य अत्यधिक कठिन एवं जटिल प्रक्रिया है यदि उसमें सम्यक रूप से
कुशल निर्देशन प्राप्त न ह¨ त¨ प्रायः श¨ध प्रबंध अधूरा रह जाते हैं ।
ईश्वर की महती अनुकम्पा से आज यह पावन बेला उपस्थित हुई है कि मैं अपने
अदम्य लालसा क¨ गुरुवृंद क¢ समक्ष प्रस्तुत कर पा रही हूं ।
प्रस्तुत श¨ध प्रबंध का समस्त श्रेय परम श्रद्धेय डाॅ. तीर्थेश्वर सिंह आचार्य इंदिरा
गांधी राष्ट्रीय जनजातीय वि.वि. महाविद्यालय, अमरकंटक, (म.प्र.) क¨ जाता है
जिनका विषय चयन से लेकर श¨ध प्रबंध की पूर्णता तक अनवरत सानिध्य एवं कुशल
निर्देशन मेरे लिए अमूल्य निधि है। पूज्य गुरुवर ने मेरी रूचि का ध्यान रखते हुए मुझे
छत्तीसगढ़ी प्रतिनिधि उपन्यास¨ं में अस्मिता ब¨ध शीर्षक चयन करने का परामर्श दिया
जिससे मेरा यह श¨ध प्रबंध भली-भांति पूर्ण ह¨ सका एतदर्थ मैं उनक¢ प्रति श्रद्धानवत् हूं
अ©र अपना हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ ।
वीणावादिनी की अनन्य उपासिका डाॅ. फिर¨जा जाॅफर अली, प्र¨. कल्याण
स्नातक¨त्तर महाविद्यालय, भिलाई नगर का मैं हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ जिनका
स्नेह अ©र अपनत्व भरा मार्गदर्शन मुझे मिलता रहा है, जिसे मैं जीवन का अमूल्य निधि
मानती हूँ ।
परम वंदनीय गुरुदेव डाॅ. सुधीर शर्मा विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, कल्याण
स्नातक¨त्तर महाविद्यालय, भिलाई नगर, इनक¢ पाण्डित्य क¢ प्रकाश का आश्रय लेकर ही
मेरी गति एवं रूचि छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी रही। अत्यंत व्यस्तता क¢ बावजूद भी इनका
स्नेहशीलता भरा हाथ सदा मेरे शीश पर रहा। प्रतिक्रिया स्वरूप मैं प्रतिपल ऊर्जान्वित
रही। अवसाद अ©र हताशा की चादर¨ं ने कभी मेरा वरण नहीं कर सकी। इनसे प्राप्त
ज्ञान से मेरा आत्म विश्वास में निरंतर वृद्धि ह¨ती गई। उनक¢ प्रति नतमस्तक हूँ अ©र
आजीवन ऋणी रहूँगी।
इस संदर्भ में मैं अपने परिजन¨ं क¨ विस्मृत नहीं कर सकती ।
मेरे जीवन साथी श्री क©शल किश¨र चन्द्राकर जिन्ह¨ंने परिवार क¢ समस्त दायित्व¨ं
से मुक्त रखते हुए जीवन क¢ हर कठिन डगर पर मेरा साथ निभाया जिससे मेरा मन¨बल
ऊंचा उठता रहा उनक¢ लिए कृतज्ञता जैसे शब्द ब©ने लगते हैं। उनक¢ प्रेरणा अ©र
सहय¨ग क¢ सामने। मेरी बिटिया पीहू (प्रीति) आशू, डाली क¢ त्याग क¨ भी अनदेखा नहीं
किया जा सकता । मेरे कार्य क्षेत्र की व्यस्तता में अपनी जिम्मेदारिय¨ं एवं कत्र्तव्य¨ं क¨
बखूूबी निभाते हुए मुझे सहय¨ग प्रदान करती रहीं ।
पपप
इस संदर्भ में मैं अपने पूज्य पिताजी श्री ध्रुव राम चन्द्राकर एवं माँ श्रीमति अलेना
चन्द्राकर क¢ चरण¨ं में प्रणाम निवेदन करती हूं, जिन्ह¨ंने जन्म देकर पालन-प¨षण ही नहीं
किया अपितु मेरी सम्यक शिक्षा, एवं संस्कार से मेरे जीवन क¨ आल¨कित किया जिनक¢
मंगलमय आशीष द्वारा मैं का श¨ध कार्य करने का साहस जुटा पाई।
जीवन क¢ पथ में यदि मैंने क¨ई पहचान बनायी है त¨ इस कार्य का श्रेय उन्हे भी
उतना ही है जिन्ह¨ंने मेरी किसी भी सफलता पर मुझे यह अनुभव कराया कि ये उन्हीं
का सपना है जिसे मैंने साकार करने का पूरा प्रयास किया है व¨ है मेरे अग्रज आई.ए.
एस. मनु जिनक¢ सहय¨ग प्रेरणा एवं मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा है । वात्सल्यमयी भाभी
श्रीमती किरण मनु क¢ स्नेह एवं आशीर्वाद क¨ भी मैं नहीं भूल सकती । मेरे अनुज पंकज,
प्रशांत, प्रवीण, कामता एवं मेरी बहनें संगीता, अनिता एवं मेरी सखी संगीता चन्द्राकर क¢
लिए आभार या धन्यवाद जैसे शब्द बहुत छ¨टा ह¨गा इनक¢ द्वारा पूर्ण मन¨य¨ग से दिये
गये सहय¨ग मेरे जीवन में अतुलनीय है ।
इसी क्रम में मेरे कुछ प्रेरकपूंज क¢ रूप में श्री आर.बी. वर्मा जी, श्री कृष्णकांत
चन्द्रा जी, डाॅ. राजेंद्र हरमुख जी, श्री संत¨ष चन्द्राकर, सुजीत नायर क¢ प्रति मैं अपना
आभार व्यक्त करती हूँ । इनकी अहर्निश प्रेरणा एवं सहय¨ग ने मुझे सदाशक्ति एवं ऊर्जा
प्रदान की है।
मेरे पूज्य गुरूदेव, डा. डी. कुमार सर, डाॅ. अश¨क कुमार सेमसून, श्री पांडे सर,
श्री नारायण चन्द्राकर सर, श्री एम. एल. पटेल सर, श्री एस क¢ . दास सर, एवं मेरे स्कूल
क¢ समस्त स्टाफ क¢ प्रति श्रद्धावनत हूं जिन्ह¨ंने समय समय पर हर प्रकार की सहायता
कर मुझे प्र¨त्साहन दिया ।
अपने श¨ध प्रबंध में जिन मूल स्रोत¨ं अनुवाद, ग्रन्थ¨ं, श¨ध प्रबंध¨ं एवं पत्र
पत्रिकाअ¨ं से सहायता मिली है उनक¢ लेखक¨ं, समपक¨,ं अनुवादक¨ं एवं प्रकाशक¨ं क¢ प्रति
मैं हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ ।
श¨धकार्य करते हुए कुछ हदें, मर्यादायें, विवशताएं ह¨ती हैं, इन सीमाअ¨ं में रहकर
अपना श¨ध कार्य पूर्ण कर पाने में शायद सक्षम ह¨ पायी हूं। इनका मूल्यांकन आप
विद्ववतजन, गुरूजन, प्रबुद्धजन भलीभांति करेंगें ।

छत्तीसगढ़ी-प्रतिनिधि उपन्यासों में अस्मिता-बोध
प्रस्तावना
अस्मिता का शब्दार्थ है - पहचान अथवा अपने होने का अस्तित्व। मनुष्य
स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक
परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धति,
रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार, नवीन अनुसन्धान और आविष्कार, जिससे
मनुष्य पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठता है तथा सभ्य बनता है, सभ्यता और
संस्कृति परिवर्तनशील है, लेकिन वह अपनी पहचान के लिए, अपनी अस्मिता के लिए
निरंतर संघर्षरत रहता है।

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