जनजातियों की स्थिति और अस्मिता की तलाश: छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में

डॉ. तारणीश गौतम
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी)
शासकीय महाविद्याल, ओडग़ी
जिला-सूरजपुर (छ.ग.)
छत्तीसगढ़ प्रदेश एक परिचय :-
छत्तीसगढ़ प्रदेश जल, जंगल, जमीन और जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है। यहाँ वनोपज, फसल और खनिज की अकूत संपदा विद्यमान है। छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा यहाँ प्रवाहित होने वाली नदियाँ है जिनके तट पर यहाँ की अधिकांश जनसंख्या निवासरत हैं। यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं- महानदी, शिवनाथ, मनियारी, हसदेव, लीलागर, अरपा, तान्दुला, खारुन, पैरी, जोंक, सुरंगी, मॉड, बोराई, ईब, रिहन्द, इन्द्रावती, कोटरी, डंकिंनी, शंखिनी, नारंगी, कोभरा, मारी, सबरी, बाघ, कन्हार और गुडऱा आदि हैं। सिंचाई के लिए प्रमुख रुप से हसदेव बाँगो परियोजना, महानदी परियोजना, पैरी परियोजना, कोडार परियोजना, कोडार परियोजना, अपरा परियोजना, मनियारी परियोजना, खारंग परियोजना, बोधघाट परियोजना, तान्दुला एवं जोंक आदि परियोजनायें हैं।
छत्तीसगढ़ अंचल वनों के दृष्टि से समृद्ध प्रदेश माना जाता है। यहाँ कुल भू-भाग का लगभग 45 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। बस्तर, सरगुजा, रायपुर और बिलासपुर संभाग में भरपूर वन संपदा विद्यमान है।
यहाँ तीन राष्ट्रीय उद्यान- (1) इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान (2) कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (3) गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान एवं ग्यारह राष्ट्रीय उद्यान।
अभ्यारण्य- (1) उदन्ती (2) अचानकमार (3) बारनवापारा (4) पामेड़ (5)भैरमगढ़ (6) सीतानदी (7) बादलखोल (8) सेमरसोत (9) गोमरदा (भोरमदेव) (11) तमोर-पिंगला हैं।
यहाँ के वनों को तीन भागों में बाँटा गया है। यथा (1) आरक्षित वन (2) संरक्षित वन (3) आवर्गीकृत वन। इन वनों में प्राय: साल, सागौन, बाँस, तेन्दू, साजा, हर्रा, खर्रा, अर्जुन, बहुआ, बबूल, आँवला, शीशम, खैर, इमली, आम, कटहल, आदि के वृक्ष मिलते हैं जिनसे वनोपज के रुप में साल बीज, हर्रा, बहेरा, ऑवला, कोसम, आम, जामुन, कटहल, इमली, महु्आ, बेर, सीताफल, कत्था, गोंद, शहद, मोम, रेशम आदि प्राप्त होते हैं।
छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है। यहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधा और जमीन उपजाऊ होने के कारण शताधिक किस्म की धान की फसल होती है। धान की शताधिक किस्म और विपुल पैदावर होने के कारण ही इसे 'धान का कटोराÓ कहा जाता है।
यहाँ की मुख्य फसल धान के साथ-साथ गेहूँ, बाजरा, ज्वार, मक्का, चना, मँूग, उड़द, अरहर, मूँगफली, अलसी, गन्ना, मेस्टा, सनई, कोदो-कुटकी, सोयाबीन, सरसों और कपास आदि की पर्याप्त मात्रा में उपज होती है। यहाँ की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि एवं संबंधित क्रियाओं में संलग्न है। कुल फसली क्षेत्र के लगभग 60 प्रतिशत से अधिक भाग में धान की फसल ली जाती है।
जल, जंगल और जमीन के पश्चात हम चर्चा करते हैं छत्तीसगढ़ की अस्मिता तथा कला एवं संस्कृति के संवाहक यहाँ के मूल निवासी जनजातियों की। प्रदेश की कुल जनसंख्या की लगभग एक तिहाई जनसंख्या (31.8 प्रतिशत) अनुसूचित जनजातियों की है। राज्य के सभी जिलों में अनुसूचित जनजातियों की आबादी पाई जाती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में कुल 42 अनुसूचित जनजातियाँ पाई जाती हैं। ये 42 अनुसूचित जनजातियाँ पुन: 161 उप समूहों में विभाजित हैं। छत्तीसगढ़ की 42 अनुसूचित जनजातियाँ निम्नलिखित हैं- (1) गोंड़ (2) कोरवा (3) मारिया (4) हलवा (5) कोरकू (6) बैगा (7) बिंझवार (8) कमार (9) कंवर (10) उराँव (11) खैरवार (12) खडिय़ा (13) भैना (14) भतरा (15) बिरहोर (16) भुंजिया (17) अगारिया (18) आसुर (19) बिराजिया (20) धनवार (21) धुरवा (22)गदबा (23) कोल (24) कंध (25) कोया (26) मझवार (27) मुण्डा (28) नरेसिया (29) पण्डो (30) परजा (31) सौरा (32) सौंता (33) पारधी (34) प्रधान (35) भूमिया (36) सबरा (37) माझी (38) सहरिया (39) कोलाम (40) मवासी (41) भील तथा (42) अंध। इनमें भूमिया, सहरिया, कोलाम, भील तथा अंध की उपस्थिति नगण्य है।
जनजातीय अस्मिता:-
'जनजातीय अस्मिताÓ एक ऐसी अनुशासित दृष्टि है जो जनजातियों की अपनी पारदृश्यता तथा छवि को विकसित करने में सहायक हो सकती है। जिससे वे प्रजातांत्रिक तरीके से अपने लक्ष्य को हासिल कर सकें। हमें यह स्वीकार करना होगा कि आज जनजाति अपनी पारदर्शिता तथा लुप्तप्राय: प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त करना चाहते हैं चाहे वह राजनेता हो, कलाकार हो, संगीतज्ञ हो, शिल्पकार हो, सिरहा या गुनिया हो या छात्र हो। यह एक ऐसा व्रत है जो केवल शसक्त प्रतीकों की रचना और उनके सम्प्रेषण तक सीमित नहीं है। अपितु इस कार्य में लक्ष्यों तथा लक्ष्यों की जनतांत्रिक दृष्टि में संशोधन की आवश्यकता है। 'जनजातीय अस्मिताÓ को बनाये रखने के लिये हमें कुछ व्यूह रचना करनी होगी-
(1) जनजातियों की निराशा को दूर करने की व्यूह रचना।
(2) जनजातियों में परिवर्तन लाने की व्यूह रचना और
(3) वृहत्तर भारत से जुडऩे की व्यूह रचना।
'जनजातीय अस्मिताÓ के दो प्रकार हैं प्रथम हैं उनकी 'आत्म छविÓ और द्वितीय है उनकी 'प्रदत्त छविÓ। जनजातियों की प्रदत्त छवि से आशय है कि गैर जनजाति वर्ग उनके विषय में क्या धारणायें रखते हैं। जनजातियों के संदर्भ में सामान्य धारणायें या मिथक शेष समाज में कुछ इस प्रकार प्रचलित है:-
जातिवर्गों में अधिकत जातियाँ-जनजातियों से परिचित नहीं हैं और यही कारण है कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में जनजातियों के इतिहास, संघर्ष, समाज, पंचायती राज व्यवस्था, धर्म, लोक संगीत, लोक साहित्य आदि के विषय में कोई जानकारी नहीं दी जाती। एक मिथक यह विकसित हुआ कि जनजातियों का अपना कोई इतिहास नहीं है और आजादी की लड़ाई में वे मात्र मूकदर्शक बने रहे। आज जनजातियों के अध्ययन को 'मानव विज्ञानÓ के सिद्धांतों से जोड़कर उन्हें सीमित कर दिया गया है। 'मानव संग्रहालयÓ जनजातियों का उपहास उड़ाते हैं जहाँ मानव का अर्थ मात्र जनजातीय-संस्कृति के प्रदर्शन तक सीमित हो गया है।
(ख) कुछ जनजाति सुपरिचित हैं किन्तु छवि नकारात्मक है:-
बस्तर की जनजातियों पर जो भी शोध कार्य हुये हैं उससे उनके परिचय क्षेत्र में विस्तार तो हुआ है किन्तु आज भी उन्हें असभ्य, पिछड़ा हुआ, जादू-टोना व तंत्र-मंत्रों वाला रहस्यात्मक प्राणी माना जाता है।
(ग) कुछ जनजातियों की मिश्र छवि है, जिसमें सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों तत्व समाहित हैं:-
जनजातियों की छवि को प्रतिरोपित करना तात्कालिक आवश्यकता है। किन्तु यह एक दीर्घ अवधि एवं कठिन कार्य है क्योंकि इनके पक्ष तथा विपक्ष दोनों साक्ष्य होने के बावजूद लोग इनके प्रति अपनी पूर्व धारणाओं को कठिनाई से छोड़ते हैं। बाहरी लोगों ने इन जातियों के विषय में एक खास छवि बना रखी है और यदि कोई जनजाति उससे विचलन के बावजूद छवि नकारात्मक ही रह जाती है। अब जनजातियों के सामने दो ही विकल्प रह जाते हैं:-
(1) अपने आपको दुनिया के दौड़ के लायक बनायें।
(2) बिना दौड़े ही हार माल लें और बैठ जायें। उनका चुनाव ही उनके भविष्य की दिशा निर्धारित करेगा।
लगातार चलने वाले युद्ध, संघर्ष, विद्रोह, राजनैतिक उठापठक, आर्थिक शोषण और सरकारी अमले के भ्रष्टाचार के कारण जनजातियों की अस्मिता एक विचारणीय प्रश्न बनकर रह गई है।
जनजातीय अस्मिता की तलाश और संघर्ष:-
जहाँ से विकास की बातें आरंभ होती है वहीं से विघटन और विखण्डन की करूण गाथा भी प्रारंभ हो जाती है और यही बात जनजातीय विकास के साथ जनजातीय अस्मिता के विघटन और विखण्डन के संदर्भ में भी देखी गई है। छत्तीसगढ़ के वनाँचल में नक्सलवाद की आग अस्मिता की तलाश का तर्कओ देकर भभक रही है। छत्तीसगढ़ का जनजातीय समाज दोहरे मार को झेल रहा है एक और अस्मिता के नाम पर नक्सलवाद की मार तो दूसरी और सभ्यता के नाम पर पाश्चात्यवाद का अंधानुकरण। ये दोनों प्रश्न सहृदय छत्तीसगढ़ी-जनजातियों के लिये पीड़ा एवं चुनौती का है।
अस्मिता की तलाश कौन नहीं करना चाहता है? यह अस्मिता अपने विशिष्ट पहचान में एक गौरव बोध है जिसमें संभवत: आत्म तुष्टि भी बहुत हद तक छिपी रहती है। यह जब व्यक्तिगत से समष्टिगत की ओर विस्तार प्राप्त करने लगती है तो समाज का संकीर्ण दायरा भी विस्तृत होकर देश-राष्ट्र की विशालता तक पहुँच जाता है इससे उस व्यक्ति- समाज का स्वाभिमान बढ़ता है। जागरूक एवं सजक नागरिकों में इस प्रकार की विशेषता सहज ही लक्षित होती है। परंतु अस्मिता की तलाश के नाम पर यह भटकन किसी को भी गुमराह कर सकती है और उसे संकटपूर्ण स्थिति में भी डाल सकती है। छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में आज यह एक यक्ष प्रश्न की भाँति खड़ा है।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में हमें यह स्वीकार करना होगा कि कुछ रसूखदारों ने सरल विश्वासों, सहज मूल्य-बोधों एवं खून-पसीने से भरे हुये श्रम-बिन्दुओं को निगल रखा है। जिससे आम जन का मोह भंग हुआ है। सत्य यह भी है कि वर्तमान निरंकुश महंगाई रूपी दैत्य ने भी जीना दूभर कर रखा है। इस समस्या से समाधान के लिये हमारा यह कर्तव्य बन जाता है कि हम इस पर सकारात्मक पहल करें।
वर्तमान में कह कहीं भी और किसी भी परिवेश में रहें मुट्ठी में समाते हुये विश्व की आर्थिक नीति, उदारीकरण, औद्योगिकीकरण, वैश्वीकरण, समाचार विस्फोटन तथा साम्राज्यवादी शिकंजे से मुक्त नहीं हो सकते। ऐसे में हमें छत्तीसगढ़ की जनजातियों की अस्मिता की तलाश करनी होगी। साहित्यिक हो या सांस्कृतिक हमें उसकी इस शाश्वत् सत्य की तलाश करनी होगी। जिसके मूल में सहज प्रीति एवं सहज अवस्थिति की भावना है। हमें उन संपर्क सूत्रों को सहज भाव से अपनाना होगा अन्यथा वे इस वैश्वीकरण के दौर में संघर्षरत होकर श्नै:श्नै: अन्य विलुप्त जनजातियों की भाँति मृतप्राय हो जायेंगे।
सहूलियत अस्मिता को संरक्षित करने में है न कि बँटकर भटकने और लडऩे में है। अन्यथा की स्थिति में प्रादेशिक और केंद्रीय सरकारें, स्वयंसेवी संस्थायें और विदेशी मिशनरियाँ चाहे जितनी योजनायें बना लें, चाहे जितनी राशि खर्च कर डालें कोई अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। जब तक कि हम पूरी निष्ठा के साथ उनकी समस्याओं को नहीं समझेंगे। उनकी सीमाओं व समस्याओं को पूरी तरह से जानने के बाद ही कुछ अपेक्षित परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं और उन्हें अपने ही देश में अजबनी होने की पीड़ा से मुक्ति दिला सकते हैं।
सहायक ग्रंथ:-
1. गिड्स एंथोनी- कंसीक्वेंसेस ऑफ मॉडर्निटी, 1991
2. वेलरस्टेन- हिस्टोरिकल कैपिटलिम्ज, 1994
3. रेजनाउ-टब्र्यूलेंस इन वल्र्ड पालिटिक्स, 1991
4. पाण्डेय गया- भारतीय मानव शास्त्र, 2006
5. गुप्ता रमणिका-आदिवासी कौन, 2008
6. उपाध्याय विजय शंकर और शर्मा विजय प्रकाश- भारत की जनजातीय संस्कृति, 1999

डॉ. तारणीस गौतम
सहायक प्राध्यापक (हिन्दी)
शासकीय महाविद्यालय, ओडग़ी
जिला-सूरजपुर (छ.ग.)

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