जनजातियों में शिक्षा की स्थिति एवं समस्याएँ

लेखक
डॉ. छैल कुमार चंद्रवंशी
सहायक प्राध्यापक (समाजशास्त्र)

सह लेखक
डॉ. जवाहर लाल तिवारी
वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक, समाजशास्त्र अध्ययनशाला
वैभव प्रकाशन
रायपुर (छ.ग.)

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा : कन्हैया
प्रथम संस्करण : 2015
मूल्य : 200.00 रुपये
कॉपी राइट : लेखकाधीन

Status and Problems of Education in tribes

dr. jawahar lal tiwari

Published by
Vaibhav Prakashan
Amin Para, Purani Basti
Raipur, Chhattisgarh  (India)
First Edition : 2015
Price: Rs. 200.00

अनुक्रमणिका

क्र. विवरण पृ. सं.
1. अध्याय-1 5-35
प्रस्तावना
2. अध्याय-2 36-51
शोध प्रारुप
3. अध्याय-3 52-79
उत्तरदाताओं की सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि
4. अध्याय-4 80-113
जनजातियों में शिक्षा की स्थिति एवं क्षेत्र में शिक्षा
से जुड़ी समस्याएं
5. अध्याय-5 114-128
निष्कर्ष एवं सामान्यीकरण

अध्याय प्रथम
प्रस्तावना

किसी भी समाज की उन्नति एवं विकास के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा के अभाव में विकसित एवं सभ्य समाज का निर्माण, कल्पना मात्र है। भारत एक विशाल देश है जिसमें अनेक विविधताऐं है। आदिकाल से ही यह विभिन्न धर्मों, मतों, सम्प्रदायों, संस्कृतियों, प्रजातियों, जनजातियों की कर्मभूमि रहा है। प्रायः अधिकांश जनजातियँा ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों में निवास करती है जहां सभ्यता का प्रकाश बहुत कम पहुँच पाया है। भारतीय संविधान में उन वर्गो के उत्थान और कल्याण के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं जो कि समाजिक, आर्थिक, राजनैतिक दृष्टि से पिछड़े हुए है। इसी आशय से जिन जनजातियों के नाम संविधान की अनुसूची में सम्मिलित किए गए हंै, उन सभी को अनुसूचित जनजाति के नाम से जाना जाता है।
जनजाति या आदिम जाति जैसे नामों से जाने वाली जनसमुदाय स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिये गये तमाम संविधानिक प्रावधानों के बाद भी आज समाज में अपनी मजबूत स्थिति बनाये रख पाने में सफल नहीं रहीं है। यह बात अलग है कि भारत के दुर्गम क्षेत्रों में आज भी ऐसे मानव समूह है जेा हजारो वर्षों से शेष विश्व की सभ्यता से दूर अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की पहचान बनाये हुए है। ये मानव समूह बीहड़ जंगलों, मरूस्थलियों, ऊचे पर्वत शिखरों और अनुर्वर पठारो के उन अंचलों में निवास करते है। जिन्हें आधुनिक समाज की अर्थदृष्टि अनुउत्पादक मानती है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जनजातियों का महत्वपूर्ण स्थान है।

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