जिंदगी के बीचों-बीच रची-गढ़ी कविताएँ

- राजेन्द्र मिश्र
मुख्यतः सार्वजनिक थीमों में चरितार्थ इन कविताओं में जगत-गति और आत्म-गति के बीच एक गहरा उद्वेेलन है। ऐसे उद्वेलन को लेकर या तो विलाप किया जा सकता है या फिर व्यंग्य। दीपक ने व्यंग्य किया है, लेकिन उनकी कविता हिन्दी में लिखी गई उन सैकड़ों व्यंग्य कविताओं से बिल्कुल अलग है, जो मनुष्य को इकहरा और उसकी भाषा को पूरी तरह सपाट बना देती है। ध्यान और धैर्य से देखें तो कवि जैसे अमिधा में व्यंजना को मुक्त करने के लिए बार-बार एक अवकाष गढ़ रहा होता है। उसका ‘’बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है !‘’ अपनी परिणति में मनुष्य के इतिहास का सबसे ट्रैजिक समय बना दिया गया होता है।
हमारी जिंदगी के बीचों-बीच रची-गढ़ी दीपक की ये कविताएँ उसके परिवर्तन और पतन का केवल साक्ष्य भर नहीं, एक गहरे हिस्सेदारी का भाव भी जगाती हैं। वे नाटक को न केवल देख रहे हैं बल्कि उसमें षामिल भी हैं। कवि जानता है कि अंधेरा है लेकिन वह यह मानने को तैयार नहीं है कि अंधेरा मनुष्य की अंतिम नियति है। उसके इस अमुखर विष्वास को रचना की भीतरी बुनावट में देखा-पढ़ा जा सकता है। उम्मीद की जा सकती है कि ये कविताएँ अपने पाठकों को वहॉँ ले जाएंगी, जहाँॅ वे पहले नहीं थे।
राजेन्द्र मिश्र
17 मई, 2011

एच.आई.जी.,सी-16
शैलेन्द्र नगर, रायपुर (छ.ग.)

मेरी बात - बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है ! (काव्य-संग्रह)

मैं कविता क्यों लिखता हूं ? यह सवाल हर कवि अपने से करता होगा। मैंने भी किया है, कई बार। षायद हर कविता लिखने के पहले, बाद में, लिखने के दौरान भी। संतोष की बात है कि मेरे लिए कविता लिखने के कारण नहीं बदले हैं। मेरा मानना रहा है कि कविता जीवन को देखने की दृष्टि है और जीवन के माध्यम से खुद की तलाष है। मनुष्य को कविता कर्म और संसार में अपनी भूमिका तय करने में खुद कविता मदद करती है। निष्चित या अनिष्चित अवधि में लिखी गई हर कविता या हर पंक्ति मुझे अपनी भूमिका की याद दिलाती है और यह भी जांच करती है कि क्या मैं अपनी भूमिका सही तरीके से निभा रहा हूं। षायद भूमिका के निभाव की प्रक्रिया से ही कविता का जन्म होता है, मूर्त रूप में, कागज-कलम के जरिए। वैचारिक स्तर पर, अमूर्त रूप में तो कविता हर कवि की अतःचेतना में मौजूद रहती है। इन्सान हर घड़ी कविताएं गूंथता रहता है। जीवन का हर पाठ, ज्ञान से हो या अनुभव से, कविता को संपन्न करता जाता है। हम मानव को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी भी आखिरकार हमारी ही कविता की है। इसलिए मैं संसार को कविता कहकर उसे सीमित नहीं करता बल्कि कविता को संसार मानते हुए कविता को विस्तृत करता हूं।
यह मेरा पहला कविता संग्रह है। इसकी भूमिका लिखने के मेरे आग्रह को सहर्ष स्वीकारने के लिए सुप्रसिद्ध समालोचक आदरणीय डॉ. राजेन्द्र मिश्र का मैं अत्यन्त आभारी हूं। उन्होंने हमारा (युवावस्था में ही पूरी मित्र मंडली का) रूझान साहित्य, विषेषकर नई कविता की ओर मोड़ा व उसके सूक्ष्म सौंदर्य का बोध कराया। मेरे घनिष्ठ मित्र व प्रसिद्ध चित्रकार श्री प्रभु जोषी के प्रति भी मैं कृतज्ञ हूं जिन्होंने इस संग्रह के आवरण के लिए अपनी पेंटिंग के उपयोग की अनुमति प्रदान की। वैसे भी प्रभु के चित्रों ने मेरी चेतना और सौंदर्यबोध विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है।
मुंगेली (जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़, मेरा गृहनगर) के मेरे बचपन के साथी श्री मनोज अग्रवाल मेरी ज्यादातर रचनाओं के पहले श्रोता और समीक्षक रहे हैं। चंूकि वे स्वयं साहित्य और भाषा के अच्छे जानकार हैं, उनकी सलाह मेरे लिए काफी उपयोगी साबित होती रही है। इसी प्रकार भारत एल्यूमिनियम कम्पनी लिमिटेड के मेरे पूर्व सहयोगी व मित्रद्वय श्री दीपक कुमार विष्वकर्मा व श्री प्राणनाथ मिश्रा और लोक संस्कृति विकास मंच के जरिए मेरे घनिष्ठ मित्र बने छत्तीसगढ़ी भाषा के मर्मज्ञ व साहित्यकार श्री महाबीर प्रसाद चन्द्रा ‘दीन’ व अप्रतिम ग़ज़लकार श्री षुकदेव पटनायक ‘सदा’ को भी मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं जिन्होंने इस कविता संग्रह को तैयार करने में मेरी खूब मदद की।
इस संग्रह के प्रकाषन हेतु वैभव प्रकाषन के डॉ. सुधीर षर्मा एवं कविताओं को कम्पोज करने के लिए कम्प्यूटर ऑपरेटर नरेन्द्र कुमार सिंह का भी मैं कृतज्ञ हूं जिनके सहयोग के बिना इस संग्रह का प्रकाषन संभव नहीं था।

दिनांक: 15 जुलाई, 2011 दीपक कुमार पाचपोर ग्राम बेलाकछार, बालको नगर
कोरबा (छ.ग.), पिन कोड: 495 684
मोबा.क्र. $91 9893028383
$91 7828230808

बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है ! (काव्य-संग्रह)
1. “बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है !” 9
2. चिड़िया और तितलियां 21
3. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 23
4. नई कविता बनती स्त्री 27
5. कुदमुरा-1 29
6. कुदमुरा-2 31
7. गिरो मेरी बाहों में/तलाष 33
8. इस मुलाकात में 34
9. सलीब का आकार 40
10. माहौल 41
11. मैं 42
12. हाथ की जात 44
13. गरीबों की बस्ती में बढ़ती लड़की का बाप 51
14. कंक्रीट की अमरैया में कोयल की कूक 54
15. होली-एक और दो 57
16. मेरी तरह 59
17. बच्चा उसे देखना चाहता है 62
18. सूरज को छुड़ाने वाले 65
19. मेरे मुहल्ले का अफ्रीका 69
20. मोतीराम 73
21. डस्टबीन: एक संस्कृति 79
22. नाक-नकेल 95
23. समय के हस्ताक्षर चेहरे पर 89
24. निर्मल जनों का आत्मनिर्वासन और लौटना 90
उनका मुख्यधारा में

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