डॉ. विमल कुमार पाठक की गीत सृष्टि

डॉ. विमल कुमार पाठक गीतकाव्य के महान गायक है। गीतकाव्य के समस्त गुण उनके काव्य में विद्यमान है। डॉ. पाठक के गीतों में भावों की विशुद्धता और तीव्रता है। आत्मभिव्यक्ति, प्रकृति के प्रति रागात्मकता, संगीतात्मकता, भावप्रवणता, सहज अन्त प्रेरणा, राष्ट्रीय, सामाजिक चेतना आदि सभी विशेषताएं डॉ. पाठक के गीतों में उपलब्ध है। यही कारण है कि वे इतने समर्थ गीतकार बन सके हैं। डॉ. पाठक मूलत: गीतकार है। अत: उन्होंने हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी दोनों मे ंही समान गति से गीतों की रचना की है। लोक-जीवन और समाज के विविध प्रसंगों को बड़ी मधुरता से गीतों में ढालते रहे हैं।
गीतसृष्टि में आत्मभिव्यक्ति एक प्रमुख तत्व है। आत्माभिव्यक्ति को व्यक्त करते हुए डॉ. पाठक ने अपनी कविताओं में श्रृंगार भाव भी व्यक्त कि हैं। वे प्रेयसी के मिलन को गंगा-जमुना के पवित्र संगम की भावना से देखते हैं-
मुझसे तुम यूं मिलीं कि जैसे
गंगा में जामुना का जल
आंखों में यू रमीं कि जैसे
आंज लिया हो काजल....(1)

प्रेम और श्रृंगाल से भरे ये गीत उनके युवा मन का परिचय देते हैं। डॉ. पाठक के गीतों में प्रकृति की सुरम्यता, अनुपम छटा का भी चित्रण हुआ है। प्रकृति की सुंदरता उन्हें आकर्षित करती है, जिससे नये गीत का, नवीन चिंतन का सृजन होता है। पक्षियों का चहकना, हवा का बहना, सब कुछ है उनके गीतों में-
बाबा रंगमंच है दुनिया
उड़ते-गिरते फुदुक-फुदुककर
बोल रही चिनमुनिया.... (2)

चहक-चहक चली हवा
महक-महक चली हवा
अरे अल्हड़ जवान-सी
बहक-बहक चली हवा.....(3)
पाठक जी स्वयं इन गीतों को, उनके मूल स्वर में, मधुर कंठ से गाने वाले एक दक्ष गायक है। उनकी इसी दक्षता के कारण ही वे इन गीतों के साथ न्याय कर सके हैं। संगीतात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मक, शब्दावली, शब्दों और बिम्बों से परिपूर्ण लयात्मकता उनके गीतों को और भी अधिक मधुर बनाती है-
कांपती सी, भागती से
मुंह उधारे, हांफती सी
लो चली हवा कि सांझ आ गई।
बह रही हवा कि सांझ आ गई।
भाव प्रधान गीत डॉ. पाठक की प्रमुख विशेषता रही है। भावपूर्ण गीत ऐसे जो मन के तारों को छू जाए।
बाबा! जीवन संध्या आई।
सोने को है तन का पंछी, शांति चतुर्दिक छाई।
अब बटोर कर देखो, जीवन भर क्या हुई कमाई।
है हिसाब में पूरी सख्ती, बिल्कुल नहीं ढिलाई
नफा हुआ नुकसान हुआ, करनी होगी भरपाई।.. (5)

सहज अंत: प्रेरणा के परिणामस्वरुप ही डॉ. पाठक हिंदी एवं छत्तीसगढ़ में गीत सृष्टि कर, छत्तीसगढ़ के सुपरिचित गीतकार हुए। अंत: प्रेरणा का ही परिणाम है कि अपने शब्दों, बिम्बों, रसों, एवं छंदों से सुसज्जित कर गीतों का सृजन किया। इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर आपने अपने गीतों में विभिन्न विषयों का समावेश किया। उन्हें सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण बनाया-
राम जपे तर जाए।
मनवा राम जपे तर जाए।।
पत्थर बनी अहिल्या तर गई।
तर गई शबरी माई, मनवा तर गई...
गीध, जटायू, मारीच तर गये
तरा विभीषण भाई। मनवा तर... (6)

कवि का हृदय अपने समाज के लिए, अपने राष्ट के लिए भी धड़कता है। उन्हें अपनी धरती से अथाह प्रेम है। उनकी केवल यही इच्छा रही है कि हमारे देश का कल्याण हो, हमारे देश के लोग जागरुक हो, सबके जीवन में समृद्धि आये, सबके जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैले। डॉ. पाठक ने हमेशा अन्याय का विरोध किया। मानवता के पक्षधर पीड़ा के गायक, सक्रिय समाजसेवी, राष्ट्र के प्रति समर्पित डॉ. पाठक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युगदृष्टा साहित्यकार है-
दीप अब हिन्द में ऐसा हमें जलाना है
हर एक घर को विमल रोशनी दिखाना है
दीप के पर्व पेर हंसते, हुए दीयों की कसम
हर एक शख्स के होठों पे हंसी लाना है...(7)

डॉ. पाठक ने अपनी काव्य यात्रा छठवे दशक में प्रारंभ की और सातवें दशक तक आते-आते उन्होंने पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली थी। उन्होंने हिंदी एवं छत्तीसगड़ दोनों में ही, समान गति से गीतों की रचना करते हुए अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। छत्तीसगढ़ी में भी उनकी दिल को छू जाने वाली गीत एवं कविताएं है। उन्होंने 'भरथरी गीतÓ 'सुआ गीतÓ चर्चित रहा है। बसंत, होली आदि ऋतु में पर्वपरक गीत, पंथीगीत आदि उनकी कल्पना के परिचायक है। प्रथम काव्य संग्रह 'गंवई के गीतÓ, 'छत्तीसगढि़ए जाग गए हैंÓ, गीत छत्तीसगढ़ महतारी के आदि उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह है। 'गंवई के गीतÓ में संयोग एवं वियोग श्रृंगार, छंद एवं अलंकारों की सुंदर छटा के दर्शन होते है। गांव के मिट्टी की सौंधी खुशबू, प्रिय के वियोग में तप्त प्रियतमा का तड़पना, रुप-सौंदर्य और प्रकृति का मनोरम चित्रण सब कुछ इस गीत संग्रह में दृष्टव्य है।
'धान कमियाँ-अउ कमैलिनÓ शीर्षक गीत में नायिका का धान की फसल के प्रति सौतिया भाव रखना, क्योंकि धान की फसल के कारण ही नायक, बहुत व्यस्त है और वह दिन-रात खेतों की सेवा में लगा रहता है, नायिका की तरफ निहारता भी नहीं है-
धान बनिस अब सउत मोर।
गोसईया ओखर बर मरथे।।
रात-दिन चिखला-पानी मं।
चिक-चिक रहि सेवा करथे...(8)
डॉ. पाठक के गीतों में प्रकृति के विभिन्न प्रताक के क्रियाकलापों का चित्रण है। ऋतुएं भी नायक-नायिका के संयोग, और वियोग पक्ष में महत्वपूर्ण, भूमिका निभाती है। 'सरदी के रात मांÓ शीर्षक गीत में शीत ऋतु नायिका विरह-व्यथा को मानों और भी बढ़ा देती है-
आगी लगय सरदी के रात मां
कुरिया हर काँपत डर्राय हो।
आहा तूँ ले हे बर, चइते बैसाखे में
तब तो मैं सही नइच जॉ हो।
आयेब नहि पूसे अउ मांघ मां।
कुरिया हर काँपत डर्राय हो... (9)

लोरी छोटे बच्चों को सुलाने के लिए गायी जाती है। डॉ. पाठक जी ने भी 'सोजा बेटा सोन चिरइया...Ó शीर्षक से एक लोरी लिखी है। छत्तीसगढ़ी में उनकी यह लोरी और भी मधुर बन पड़ी है-
चन्दा मामा मुसकावत हे
सोजा कहि गावत जावत हे
बड़े बिहनियाँ तोरे खातिर
दूध-भात लाये जावत हे
सोजा रे.. सोजा ... सोजा सोजा रे... (10)

वरिष्ठ साहित्यकार, कवि डा. विमल कुमार पाठक के आलेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के प्रति समर्पित डॉ. पाठक के गीतों में छत्तीसगढ़ के प्रति अपार प्रेम स्पष्ट रुप से झलकता है। इसी क्रम में उनका गीत संग्रह 'गीत: छत्तीसगढ़ महतारी केÓ भी है। इस संग्रह में हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी में दस गीतों का संग्रह किया गया है। इन गीतों में विषय एवं प्रति प्रेमभाव, आम जनता की समस्याओं से संबंधित गीत एवं अन्य विषयों पर आधारित गीत है।
'छत्तीसगढ़ी महतारीÓ में उन्होंने लिखा है-
भारत माता के जेहर
जबर गरीबिन बिटिया अय
तेमन ल ये विमल कवि
झकझोरत अउर जगावत हय।।
छत्तीसगढ़ महतारी जय जय।। ...(11)

सच्चा साहित्यकार वही है जो केवल विकास के ही सपने नहीं देखता, बल्कि जनता की समस्याओं के प्रति सजग भी रहता है। डॉ. पाठक ऐसे ही गीतकार है। उन्होंने अपने गीत 'दलित गोहार-हमला भी जिनगानी दवÓ म लिखा है-
भइया! पसिया-पानी दव।
हमला भी जिनगानी दव।।
मजा करव तुम राज-महल मां
हमला खपरा, छानी दव।।... (12)

इसी तरह से नक्सल समस्या पर भी उन्होंने अपनी लेखनी जताई है। 'छत्तीसगढ़ बन जाएगा क्या नक्सलगढ़?Ó और 'हिम्मत कर नक्सली इलाकें आयेंगे-आरती उतारेंगेÓ आदि इसी तरह के भाव लिए हुए हैं-
आतंकी नक्सली, समर में है बढ़-चढ़।
जूझ रहा है हाय, हमारा छत्तीसगढ़।।
है सरकारी सब प्रयास, क्यों कर निष्फल?
छत्तीसगढ़ बन जायेगा क्या नक्सलगढ़?.... (13)

सरस्वती माता ज्ञान की देवी है। अत: कवि प्रार्थना करते हैं कि इस जगत पर माता का आशीर्वाद सदैव बना रहे-
सरस्वती माता की जय गो।
ललित-कला, संगीत-नृत्य की
सत्-साहित्य, सुविमल कृत्य की
वरदानी माता की जय हो।
माता अशिक्षा को हर ले
जन-जीवन को साक्षर कर दे
ज्ञान-ज्योति की किरण-किरण से
सब के मन की झोली भर दे
ज्ञानोदर करवाने वाली
कृपा कोर बरसाने वाली
कल्याणी माता की जय हो... (14)

डॉ. पाठक के सभी गीत भाव, भाषा-शैली की दृष्टि से उत्कृष्ट है और पाठकों का मन मोह लेने में समर्थ हैं। मधुर गीतों के प्रणेता डॉ. पाठक केवल गीत सृष्टि ही नहीं करते हैं अपितु उन गीतों को अपनी मधुर आवाज में गाते भी है और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

संदर्भ-ग्रंथ
1. संकल्प रथ: संपादक-रामअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक, पृ.14
2. संकल्प रथ: संपादक- रामअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक, पृ.7
3. संकल्प रथ : संपादक -मअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक का एक संध्या गीतच पृ. 8
4. संकल्प रथ : संपादक -मअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक का एक संध्या गीतच पृ. 8
5. संकल्प रथ: संपादक- रामअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक, बाबा जीवन संध्या आई पृ.13
6. संकल्प रथ: संपादक- रामअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक पृ. 13
7. संकल्प रथ: संपादक- रामअधीर, डॉ. विमलकुमार पाठक पृ. 13
8. गंवई के गीत- धान कमियां-अउ कमैलिन- डॉ. विमल कुमार पाठक, पृ. 13
9. गंवई के गीत- सरदी के रात मां- डॉ. विमल कुमार पाठक, पृ. 24
10. गंवई के गीत-सोजा बेटा सोन चिरईया- डॉ. विमल कुमार पाठक पृ. 63
11. गीत: छत्तीसगढ़ महतारी के- छत्तीसगढ़ महतारी- डॉ. विमल कुमार पाठक, पृ.2
12. गीत: छत्तीसगढ़ महतारी के- दलित गोहार- हमला भी जिनगानी दव- डॉ. विमल कुमार पाठक
13. गीत: छत्तीसगढ़ महतारी के- छत्तीसगढ़ बन जाएगा क्या नक्सलवाद? - डॉ. विमल कुमार पाठक, पृ. 13
14. संकल्प रथ: संपादक- रामअधीर, डॉ. विमल कुमार पाठक- सरस्वती माता की जय हो, पृ.13
निवास पता
श्रीमती रंजना मिश्रा
श्री देवेंद्र मिश्रा, बजरंग चौक राउत गली मोहल्ला, बैकुंठपुर, रायगढ़ (छ.ग.)

शोक्ष छात्रा
श्रीमती रंजना मिश्रा
व्याख्याता पंचायत- शा. हाईस्कूल, ननसिंया, जिला-रायगढ़ (छ.ग.)

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