दीपक कुमार पाचपोर

हाजिर है पुरातन शैली का नक्काशीदार फर्नीचर

घरों में फर्नीचर की सजावट के लिहाज से जब से कथित 'नया जमानाÓ आया है, नक्काशीदार फर्नीचर बनने और मिलने बंद हो गए हैं। पुराने अमीर-उमराव या पारसियों के घरों में तो आपको ऐसे फर्नीचर मिल जाएंगे, परंतु नवधनाढ्य या उच्च मध्यमवर्गीय लोग जो रेडीमेड फर्नीचर लेते हैं, वे आधुनिक डिजाइन के होते हैं- सीधे-सीधे हत्थे और चपटी पीठ वाले। आंशिक परिवर्तन को छोड़ दें तो ज्यादातर एक जैसे ही दिखते हैं। पुरातन पद्धति के नक्काशी किए हुए फर्नीचर ढूंढे नहीं मिलते। अब अगर कोई बनवाना चाहे तो मुंबई में उनका कारीगर मिलना मुश्किल है। ज्यादातर लोग मशीनों से सीधी कटाई-छंटाई करते हैं ताकि कम समय में ज्यादा से ज्यादा फर्नीचर

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जिंदगी के बीचों-बीच रची-गढ़ी कविताएँ

- राजेन्द्र मिश्र
मुख्यतः सार्वजनिक थीमों में चरितार्थ इन कविताओं में जगत-गति और आत्म-गति के बीच एक गहरा उद्वेेलन है। ऐसे उद्वेलन को लेकर या तो विलाप किया जा सकता है या फिर व्यंग्य। दीपक ने व्यंग्य किया है, लेकिन उनकी कविता हिन्दी में लिखी गई उन सैकड़ों व्यंग्य कविताओं से बिल्कुल अलग है, जो मनुष्य को इकहरा और उसकी भाषा को पूरी तरह सपाट बना देती है। ध्यान और धैर्य से देखें तो कवि जैसे अमिधा में व्यंजना को मुक्त करने के लिए बार-बार एक अवकाष गढ़ रहा होता है। उसका ‘’बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है !‘’ अपनी परिणति में मनुष्य के इतिहास का सबसे ट्रैजिक समय बना दिया गया होता है।

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