देश को आजाद कराने की जद्दोजहद

पं. स्वराज्य प्रसाद द्विवेदी
मेरा बचपन उस जमाने से गुजरा जब देश के निवासी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मार्ददर्शन में तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र बाबू तथा सरदार पटेल जैसी अजीम हस्तियों की रहनुमाई में देश को आजाद कराने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। मेरा स्वयं का परिवार आजादी के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रुप से जुड़ा हुआ था अतएव मेरा यह सौभाग्य था कि मैं राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक स्तर की अनेक विभूतियों का सामीप्य प्राप्त कर सका। लेकिन इससे पहले उन दिनों की थोड़ी सी चर्चा जरुरी है।

एक दृष्टि जब अपने बचपन की ओर जाती है और फिर एकाएक वर्तमान का जब आर्थिक परिवेश उभर पड़ता है तो एकाएक आर्थिक स्थितियों के उतार-चढ़ाव उजागर हो उठते हैं। तब एक रुपये में सोलह आने और चौंसठ पैसे हुआ करते थे। एक पैसे के भी दो हिस्से होते थे जो अधेला कहलाते थे। केवल एक पैसे में जितने चने मुरमुरे मिल जाते थे उतने में आज एक रुपये में भी नसीब नहीं होते थे। इसके बावजूद भी मेरे वरिष्ठ जन कहा करते थे कि पहले विश्व युद्ध के बाद देश में महंगाई आ गई है। मेरे ही पड़ोस में रहने वाले एक वयोवृद्ध व्यक्ति कहा करते थे कि मात्र आठ रुपये महावारी वेतन पर वे सारे परिवार का खर्च मजे से चला लेते थे। और मैं यह सब सुनकर कभी जब उनकी बातों पर संदेह करने लगता था तब वे हँस उठते और बताते थे कि पैसे की बात की बात तो अलग उनके जमाने में कौडिय़ों से भी खरीद-फरोख्त होती थी। अब भले ही उसे सस्ता जमाना माना जाये किंतु उस समय केवल कुछ उच्च तथा मध्यम श्रेणी के लोगों को छोड़कर अधिकांश जनसंख्या घोर गरीबी, अशिक्षा और शोषण से पीडि़त थी। ऐसे पिछड़े हुए समाज के लोग अपनी तत्कालीन स्थिति को या तो नियति की परम इच्छा या पूर्व जन्म के संस्कार के रुप में स्वीकार करते थे। लेकिन आज जब बाजार जाने का मौका मिलता तो पचास से उपर वाली पीढ़ी के लोगों के मुंह से ये बात जरुर सुनने को मिल जाती है कि इससे तो वे दिन अच्छे थे।

इन दिनों सारे देश में गांधी की आंधी बह रही थी। देश के बाल-युवा-वृद्ध देश की आजादी के लिए मर मिटने की भावना से अभिभूत थे। तरुण और युवा टोलियाँ तो जैसे सर पर कफन बांधकर निकल पड़ी थीं। एक महान उद्देश्य था सबके सामने। देश को विदेशी शासन से मुक्त करना। नौजवानों को शारीरिक दृष्टि से सक्षम बनाने के लिए ग्रामों में ही नहीं शहरों में भी अखाड़े हुआ करते थे। स्कूलों में बाकायदा प्रतिदिन या तो ड्रिल होती थी या खेलों का आयोजन होता था। आज तो अखाड़े हैं भी तो इन गिने स्कूलों में भी खेलों के मैदान दुर्लभ हो गये हैं।

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