पहली चिंता पेट की भूख

डाॅ. राकेश शुक्ल
नाचा-गम्मत: एक परिदृश्य
निस्संदेह आदिम मनुष्य की सबसे बड़ी और पहली चिंता पेट की भूख और असुरक्षा दूर करने की रही होगी । इसके तुरंत बाद उसे दिल बहलाने की जरूरत महसूस हुई होगी । तैरना, दौड़ना जैसे साधारण लगने वाले खेल भी सैंकड़ों सालों के अनुभव से संभव हुए होंगे । उल्लेख मिलता है कि आदिम लोग आग जलाकर उसके चारों ओर घेरा बनाकर नाचते थे और आवाजें निकालते थे । वस्तुतः मनोरंजन मनुष्य की बुनियादी जरूरत है, रोटी की तरह । कालक्रम के विकास में सामूहिकता बढ़ी, बस्तियों में जीने की प्रणाली विकसित हुई, कई खोजें हुईं, कुछ साधन बढ़े और इन सबके साथ-साथ मनोरंजन की माँग बढ़ी और इसके स्वरूपों में सुधार भी होता रहा ।
कुछ घुमंतु जातियों ने छोटे घरेलू वाद्य लेकर गायन को जीविका के रूप में अपना लिया । कालान्तर में गायन और नृत्य के सामूहिक प्रयासों से कई लोकनृत्य शैलियाँ आविष्कृत हुईं । छत्तीसगढ़ में पण्डवानी, भर्तृहरिगायन वाचिक परम्परा के महत्वपूर्ण नमूने हैं तथा इसका सुदीर्घ अनुक्रम अनुसंधान का विषय रहा भी है । इसके साथ ही स्वाभाविक रूप से मनोरंजन की मंचीय पद्धति सामने आयी लीला, नाचा-गम्मत के रूप में । लीला का सम्बन्ध मुख्यतः धार्मिक पुराख्यानों से था, तो नाचा-गम्मत के कथानक सामाजिक थे । छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत सामयिक जीवन का कलात्मक रसास्वादन कराने में सक्षम होने के कारण निरन्तर जनप्रिय होते गये । दैनिक यथार्थ को परखने और पेश करने का ढंग गम्मतकारों का विशिष्ट होता है । छत्तीसगढ़ के भोले देहाती लोग कितनी सरलता से जीवन की गुत्थियों पर कोई नजरिया बनाते हैं, सार-असार का भेद करते हैं, सपनों को समेटते हैं, अपने दुखों को पराया नहीं करते इत्यादि तत्व गम्मत के कलाकार ऐसे पेश करते हैं कि दर्शक रतजगा करने को विवश हो जाता है । बस्ती में नाचा का मंचन देखने वालों के लिए किसी घटना की तरह महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उनकी सांस्कृतिक भूख को खुराक मिलती है ।
ग्रामीणों का मनोरंजन तो एक पहलू है, लालटेन और घनघोर अशिक्षा के दौर में परतंत्रतामूलक मानसिकता, अस्वच्छता और पिछड़ेपन से बाहर निकलने का संदेश फैलाने में छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत की बड़ी भूमिका रही है । कैसा भी साहित्य या कला हो, लोकमंगल की कामना छिपी होती है, लेकिन अंचल में प्रचलित नाचा शैली इसका कलात्मक रूपांकन करती है । शोषण, शराबखोरी, पारिवारिक झगड़ों, अंधविश्वास, दहेजप्रथा आदि सामाजिक बुराइयों की जकड़बंदी के विपक्ष में गम्मतकार सदा सक्रिय दिखते हैं । ग्रामीण अंचल में शिक्षा के प्रसार और दूरदर्शन चैनलों की पहुँच बढ़ने से अर्द्धशहरी वातावरण बनता जा रहा है । बदले हुए परिवेश में आम जनता का कला-आस्वाद बदलना स्वाभाविक है । इससे नाचा-गम्मत विधा को एक नयी चुनौती से दो-चार होना होगा, हालांकि इसमें मनोरंजन की प्रत्यक्षानुभूति अधिक है ।
कई चुनौतियों में दूसरी बड़ी यह भी है कि गम्मतकार बनने में गरीबी की गारंटी है । सफल खिलाड़ी या माॅडल अपनी संतान को उसी क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए पे्ररित कर सकता है, किंतु कोई गम्मतकार नयी पौध को गरीबी के गड्ढे में नहीं गिराना चाहता । नाचा-गम्मत का जुनून बहुत सारे सपनों को छीन लेता है । चमरू यादव का उदाहरण सामने है, जो छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत का सिद्ध कलाकार था । फुण्डहर नाच पार्टी का वह महत्वपूर्ण अंग था जिसने छत्तीसगढ़ में दूर-दूर तक अपनी कला से लोगों को मोहा और बांधा । वह कला का धनी था किंतु उसका जीवन गरीबी में गुजरा । दुर्योग से दोनों पैर घुटने तक कट जाने के बाद भी वह बैसाखियाँ थामकर नाचा-गम्मत करता रहा । उसे नाचा का नशा था, करूण प्रसंगों में उसका जवाब नहीं था । मगर चमरू भी दूसरे नचकारों से अलग नहीं था, जब बात गरीबी और आमदनी की आती है । कबीर की उक्ति ‘जो घर जारे आपना चले हमारे साथ‘ नाचा कलाकारों पर सही उतरती है ।
यद्यपि छत्तीसगढ़ी नाचा अनपढ़ एवं अल्पशिक्षित कलाकारों द्वारा पोषित विधा है, लेकिन बहुत चुनौतीपूर्ण है । मंच खुला होता है, जो तीन दिशाओं से दर्शकों से घिरा रहता है । नाचा में न कोई स्क्रिप्ट होता है, न लुकाने-छिपाने के लिए पर्दा, न रिटेक का मौका । यहाँ अपनी कला को सीधे-सीधे तराजू में रखना होता है और यही कारण है कि इसका स्वाद और सामाजिक प्रभाव भी दूसरी मंचीय प्रस्तुतियों से एकदम अलग है । इसमें आधुनिक नाट्य शैली के कई रंग छिपे हुए हैं जिनका विशेषकर हबीब तनवीर ने जमकर प्रयोग किया, लेकिन बदलती हुई जनरूचि और इलेक्ट्रानिक मीडिया के दबाव में एक ओर छत्तीसगढ़ी भाषा, तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ी नाचा विधा सिमट रही है । रवेली वाले दाऊ मंदराजी ने नाचा-गम्मत को पुष्पित करने में अपना जीवन ही खपा दिया था । इसी तरह बेचारगी के बावजूद चमरू ने जीवन पर्यन्त कलापथ नहीं छोड़ा । जब तक गम्मत गुरू दाऊ मंदराजी, मदन निषाद, भुलवा राम, फिदाबाई मरकाम, जयंती, सुकालू, रामलाल निर्मलकर और चमरू राम यादव जैसे कलाजीवि जन्मते रहेंगे, छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत की कला-यात्रा सतत रहेगी।

Tags: