प्रेमतृष्णा ही प्रेम की संजीवनी है

आंतरिक आनंद प्राप्त करें हम उसकी कालिमा की ओर क्यों देखें ।
शीला प्रेम चिरकाल से एक शाश्वत सत्य है प्रेम शाश्वत सत्यरूपी एक नदी है जिसके दो किनारे हैं एक शिवम जो कृष्ण है, एवं सुंदरम् है जो राधा है । तुमने पूछा है कि विरह की वेदना केवल राधा को ही क्यों प्राप्त होती है और राधा सदैव क्यों प्यासी की प्यासी ही रहती हो तो सुनो प्रेम की नदी के दोनों किनारे किसी भी कालखंड में एक नहीं हुये हैं । दोनों दूर-दूर ही रहे हैं और दूरी राधा को भी प्यासी रखती है और कृश्ण को भी प्यासा रखती है । अतृप्ति का दंड यदि राधा भोगती है तो बेचारे कृश्ण भी भोगते हैं । यही प्रेमतृश्णा अपने प्रिय से मिलन की तीव्र उत्कंठा पुनः पुनः-पुनः जागृत करती है।

प्रेमतृष्णा ही प्रेम की संजीवनी है।
लेखक :- दिलीप परमार
मकान नं.:- 10/667, शिवानंद नगर सेक्टर 1 , खमतराई रायपुर
दिनांक :- 10/08/2014, रक्षाबंधन -
मो.नं.- 9329543300

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