बतरस की कला ‘डींग’

डिंगई - लोकबाबू

सर्वाधिकार - लोकबाबू
प्रथम संस्करण - 2015

आवरण: कन्हैया

प्रकाशक एवं मुद्रण
वैभव प्रकाशन
अमीन पारा, पुरानी बस्ती,
रायपुर (छ.ग.)
फोन - 2262338

बतरस की कला ‘डींग’

लोककथाएँ मनुष्य के जीवन की सर्जनात्मक वार्तालाप हैं। वाचिक कला का विस्तार। आदमी श्रम को रसमय बनाने और क्रियाकलाप की कल्पनाशील अनन्तता को छूने के स्वभाव से जो रूपक गढ़ता है, उसमें लोककथाएँ भी हैं। लोककथाएँ छलाँग की तरह होती हैं, तीन डग में धरती नापने की तरह। ‘डींग मारना’ -मानवीय स्वभाव की एक छलाँग ही है। दुनिया की तमाम सभ्यताओं में ‘डींग मारने’ के मानवीय स्वभाव से मूल्यवान साहित्य की रचना हुई है। भारत में रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, हितोपदेश, कथा-सरित् सागर आदि की कथाओं में ‘डींग कला’ के विलक्षण प्रमाण मिलते हैं।
कथाकार लोक बाबू ने इस उपन्यास की कथा इसी तरह लोकश्रुति से ली है। वाचिक परम्परा से चली आती लोकश्रुति को लिखित भाषा के संस्कार में ढालने की अपनी जरूरत है। इससे लिखित साहित्य को ऊर्जा मिलती है, नयी जुबान भी। विजयदान देथा ने राजस्थानी वाचिक लोककथाओं को व्यापक रूप से लिखित संसार में अर्जित किया है। इस उपन्यास की कथा-कायर, डरपोक, आलसी और धन-दौलतहीन ‘बाबू प्यारेलाल की डींग’ है।
‘डींग और संयोग’ को बतरस में भिगोकर लोक का सृष्टा श्रोताओं को सुख देता है। ये कथाएँ समय के अवरोधों को दूर करती हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनामदास के पोथा में-इसी तरह डींगों से बनी कथाएँ सुनाकर अकाल के कारण भूखे-बिलबिलाते गरीब बच्चों का मन बहलाने का प्रसंग है। मामा नामक चरित्र इन कथाओं के जरिए वह काम करता है, जो बड़े-बड़े वैद्य नहीं कर पाते। इसी तरह की वाचिक कथाओं के वृतान्त से हमारी संस्कृति का भंडार भरा है। आधुनिकता के व्यामोह से इनसे पीछा छुड़ाकर हम खोखले हुए हैं। सामाजिक समरसता टूटी है, अलगाव आया है, हँसने-बतियाने और आत्म-विस्तार करने का सहज मार्ग हमसे छूट गया है। इससे निर्मित त्रिशंकु जीवन ने क्रूर और नीरस बनाया है।
लोकबाबू ने इसे कथारस में पिरोकर एक महत्वपूर्ण पहल की है। लोककथा आधारित यह उपन्यास बच्चों से बड़ों तक को अच्छा लगेगा।

प्रो. कमला प्रसाद

डिंगहा आए हे अमर खाके

लोककथा अउ लोकगाथा के औपन्यासीकरण घलो साहित्य के एक अंग आय। राजस्थान के विजयदान देथा जी हा उहाँ के गंज अकन लोककथा के हिन्दी म रचना के रूप दे हे। छत्तीसगढ़ मा नारायण लाल परमार जी हा घलो वइसनेच किसिम के बूता करे हे। लोकबाबू के काम हा थोरिक आने किसिम के हे। येहा लोककथा के औपन्यासीकरण छत्तीसगढ़ी मा करे हे।
सवाल ये हे के का जम्मो लोककथा अउ लोकगाथा के औपन्यासीकरन करे जाय? मोर बिचार हे के लोककथा अउ लोकगाथा मा अइसे ला चुने जाय, जउन हा मनोरंजक के संगे-संग सीख वाला होय। जइसे लोकबाबू के उपन्यास मा हे, के डिंगहा के पोल खुलबे करथे। डिंगहा हा अमर खाके आय, वोहा नइ मरय! आजो वोहा हमर बीच मा जीयत हे!
पहली दुरगा अउ गनेस पारब मा कहिनी कहवैया के घलो कार्यक्रम होवय। एक ठन कहिनी के पुछी ला धरे-धरे दूसर कहिनी निकल आवय अउ वोकर पुछी ल धरके तीसर कहिनी। चाॅंटी के रेम धरे सही कहिनी के रेम। एक ठन कहिनी मा रथिया पहा जाय। संसार के कई ठन देस-राज मा रेम-धरे कहिनी मिलथे। लोकबाबू के उपन्यास घलो रेम-धरे कहिनी आय। ‘डिंगई’ ला पढ़े धरबे त अइसे लागथे, जइसे कोनो कहिनी बतैया हा आगू मा बइठ के कहिनी बतावत हे। अउ अइसे बतावत हे के हँुंॅकारू देवैया हा हँुंॅकारू दे ला बिसर गे हे। येहा आय कहिनी-कला।
कहिनी हा अपन मूल-रूप मा वाचिक-परंपरा के जिनिस आय। ओकर लिखित रूप हा पाछू के बात आय। कई झन कहिनी लिखैया मन अपन कहिनी ला सभा मा पढ़ के बताथें, तब वाचिक-परंपरा के रस झरे लगथे।
कहिनी-लिखैया लोकबाबू हा ये पइंत लोककथा ला उपन्यास के सरूप दे हे। पर वोहा जुच्छा कहिनी लिखैया नोहे। वोहा लोक के आत्मा ला चिन्हैया कलाकार घलो हे। येकरे सेती ये उपन्यास मा लोककथा के न तो देहे ला चिमटे-कोकने गे हे, अउ न आत्मा ला। वोहा अपन कोती ले वोकर अइसे सिंगार करे हे, के लोककथा के रूप हा अउ उभर गे हे। हाथी, घोड़ा, बघवा अउ मंगर मन का सोंचथे, येला उपन्यास लिखैया हा बने सोंच के लिखे हे। अइसे लगथे जइसे आदमी हा सोचत हे। लोककथा मा जीव-जगत अउ आदमी के एकम-एका होथे। येला लोकबाबू हा नइ बिसरे हे। इही आय लोककथा अउ लोक-समाज के आत्मा मा झांॅकना।
डिंगहा मनखे के डींग ला पढ़के मन मा एक ठन सवाल हा मुड़ी उचाथे - आखिर ये डींग काये? काबर कोनो डींग मारथे? डींग हा मन के एक ठन बिकार आय। येला हिन्दी वाला मन ‘कुंठा’ कहिथें। जउन काम ला मनखे करना चाहत हे, पन करे के जांगर नइ चले, बुध हा नइ पुरय, तब वो मनखे हा कभू अकेल्ला मा अउ कभू चार झन के आगू मा बढ़चढ़ के गोठियाथे, गोठ-बात मा अपन मेड़ो ला फोरडारथे, वोहा वो काम के सपना देखथे, वो बूता के कल्पना करथे, सपना अउ कल्पना ला शब्द के कुरथा पहिराथे। माने मनखे हा अपन कमजोरी ले जनमे ‘कुंठा’ ला भाखा के सुंदर चद्दर ओढ़ाय लगथे। ‘डिंगई’ के नायक हा न तो तनसुखलाल हे, न मनसुखलाल। वोहा तो निमगा प्यारे लाल आय। जेला मन के ‘कल्पना’ सुख देथे।
ये उपन्यास मा दू ठन बात अउ आय हे- संजोग अउ चतुरई। सबो के जिनगी मा कभू न कभू अइसन बेरा आथे, जेला संजोग कहे जा सकत हे। कभू-कभू तो संजोगे हा जिनगी के दिशा ला बदल देथे। येला संजोगेला डिंगहा मन अपन ताकत समझ लेथे। जइसे बाबू प्यारेलाल हा मनखेखवा बघवा, बइहाय हाथी अउ अभियावन मंगर उपर अपन जीत के भरम पइदा करके सुख के अनभव करथे। अउ जब एक जघा फंॅादा मा फॅंदा जाथे, तब वोकर मुॅंहबोला बेटा हा अपन चतुरई ले वोला बचाथे। उपन्यास के सीख ये हे के चतुरई हा समस्या ले निकले के रद्दा होथे। संजोग हा नई होय। डिंगहा मन समस्या ले भागथें, पन चतुरा मन समस्या ले मुड़ी देके भिड़ जाथें।
लोकबाबू के सबले अच्छा बात ये हे के वोहा उपन्यास के ताना-बाना ला कपड़ा बनैया मनखे कस बने नाप-जोखके लमाय हे। एक-एक ठन ‘दृश्य’ ला अपन कल्पना के बल मा चलत-फिरत फोटू सही आगू मा राखे हे। अइसन करत खानी वोहा रस के झरन ला आॅंखी-ओधा नइ होवन दे हे। इही रस के झरन हा पढै़या मन ला किताब ला छोड़न नइ देवय।
उपन्यास के भाषा मा कुछु नवा बात घलो मिले हे। जेला देखके भविष्य के छत्तीसगढ़ के कल्पना करे जा सकत हे। मोर बिचार हे के अब छत्तीसगढ़ी भाषा मा दूसर भाषा के शब्द-प्रयोग ऊपर बात करे के समे आ गे हे। अइसे शब्द ऊपर बात करना जरूरी हे, जउन शब्दमन छत्तीसगढ़ी मा चलागन मा नइयें। जउन शब्द चलागन मा आके अपन रूप ला बदल डारे हें, वोला मान देना वाजिब हे। पन जेन शब्द मन चलागन मा नइ हें, वोला बिगाड़ के लिखना सहीं नइये। आज छत्तीसगढ़ मा शिक्षा के प्रचार-प्रसार गाँॅंव-गाॅंँव हे। गांँॅंव-गाॅंँव अखबार जावत हे। लोगन पढ़त-सुनत हे। कई माध्यम ले शब्द के उच्चारण कान मा पहँुॅंचत हे, अउ जीभ मा बइठत हे। एकर सेती छत्तीसगढ़ी भाषा के रूप बदलत जात हे। आज बोलचाल मा हिन्दी के शब्द अपन मूल रूप मा आवत हे, बिगड़े रूप मा नइ। कहँूॅं हम ‘छत्तीसगढ़ प्रदेश’ ला ‘छत्तीसगढ़ परदेस’ कहिबो त अर्थ आने असन लगथे। प्रदेश अउ परदेश के बीच मा गजब फरक हे। हमन ‘परदेसिया’ थोरे आन। परदेसिया माने आन प्रदेश के। ये हिसाब ले प्रदेश, प्रतिज्ञा, प्रतीक्षा हा अपन मूल रूप मा आवय। सवाल ये उठथे, के का हिन्दी के शब्द मन ला बिगाड़े ले छत्तीसगढ़ी हो जाथे? लोकबाबू हा हिन्दी शब्द मन ला वोकर मूल रूप मा राखे के कोशिश करे हे। ते पायके मोला ओकर भाषा मा भविष्य के छत्तीसगढ़ी के दर्शन होथे। ये किताब मा भाषा मन के बीच के लेन-देन घलो दिखाई देथे। हिन्दी के हाना ला छत्तीसगढ़ी मा प्रयोग करे गे हे। जइसे-हालत पातर होना, ऊँट पहाड़ के खाल्हे आना। जउन तरह ले भाषा पुष्ट हो सकत हे, लोकबाबू करे हे। उपन्यास मा लेखक के भाषा हा नदिया के धारा कस बोहाय है- कलकल-छलकल। ये लेखक के सफलता आय।
मोला लगथे, ये लोककथा वाला उपन्यास ला छत्तीसगढ़िया भाई मन के बीच मान-गउन मिलही। छत्तीसगढ़ी रचना-संसार मा लोकबाबू के स्वागत होना चाही।

द जीवन यदु
गीतिका,दाऊ चैरा,
खैरागढ़ 491881(छ.ग.)
मो. 9752023921

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