बस थोड़ी देर बाद

मेरे बेटे
जब छोटे थे तुम
मेरे हाथों को रहता
बहुत सारा काम
मिल नहीं पाता था
जरा भी आराम
तुम चाहते थे मैं
हर पल रहूँ तुम्हारे साथ
और मैं कहती
आती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद

1.
तुम्हारी आखें मुझे देखते ही
विहंस उठतीं
अंग-अंग चपल हो कहता
माँ लो सीने से लगा
पर मैं तुम्हें झूले में लिटा
कहती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद

2.
तुमने सीखा था
नया-नया चलना
चाहते थे
बस चलते ही रहना
दिखाना चाहते थे मुझे
अपने नन्हें परों की उड़ान
सुनना चाहते थे वाह-वाह
पर मैं तुम्हारे गाल थपथपाया
कहती थी
आती हूँ बेता
बस थोड़ी देर बाद
3.
वो तुम्हारे छोटे छोटे से खेल
जो होते थे तुम्हारे लिए खास
खेलना चाहते थे मेरे साथ
पर मैं तुम्हें खिलौनों के बीच बिठा
कहती थी
आती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद
4.
तुम्हारे वो रंगीन पुस्तकें
जिनमें खींचते थे तुम
आड़ी, तिरछी रेखाएं
भरना चाहते थे उनमें
तरह-तरह के रंग
मेरे संग
पर मैं तुम्हें छोड़ रंगों में सना
कहती थी
आती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद
5.
अब बीते गये वो दिन
बीत गई वो रातें
शेष हैं सिर्फ उनकी यादें
अब नहीं है मुझे कोई काम
समय ही समय है
आराम ही आराम
करना चाहती हूँ पूरे
वो सभी अधूरे काम
चाहती हूँ तुम्हारा साथ
बाँटना चाहती हूँ पुरानी यादें
सुनाना चाहती हूँ सु:ख-दु:ख की बातें
पर अब तुम कहते हो
आता हूँ माँ
बस थोड़ी देर बाद

- डॉ. श्रीमती शशि दुबे, रायपुर
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एक पाती माँ के नाम

ज्यों-ज्यों उम्र की सीढिय़ाँ
चढ़ती जाती हूँ
तेरे प्यार व समर्पण
को समझ पाती हूँ
त्यों-त्यों मेरी हर सांस
अधीर हो मुझे पुकारती है
माँ तू मुझे बहुत याद आती है
जब मेरी कच्ची, नादान उमर थी
चौदह से बीच के बीच की डगर थी
रंगीन ख्वाबों से दुनिया भरी थी
सिर्फ तु ही तो थी जो मेरे व
मेरी कल्पनाओं के बीच
दीवार बन खड़ी थी
हर वक्त तेरा टोकना, कोसना
झिड़कना व धमकियाना
मुझे गुस्सा दिलाता था
तेरी विद्रोही बनाता था
किन्तु आज भी जब तेरी वही डांट
मुझे भटकने से बचाती है।
माँ तू मुझे बहुत याद आती है
तेरी वो डांट, उपदेश, बंधन व ताने
घायल कर जाते मेरे हृदय को अंजाने
तुम्हारे मेरा यूँ ख्याल रखना
मुझे जरा भी नहीं भाता था
तुम्हारे प्रति मेरा मन
आक्रोश से भर जाता था
लगता तुम उपदेशों की चादर
सिर्फ मुझे ही उढ़ाती हो
भाई से तो सिर्फ
लाड़ ही लड़ाती हो
जब नहीं तब देती हो
पराये घर जाने का ताना
मुश्किल था उस समय
मेरा तुम्हे समझ पाना
क्योंकि माँ की ममता
थ्योरी नहीं प्रेक्टिकल है
ईश्वर का अंत:स्थल है
जब तक माँ न बनो
माँ के हृदय का मान नहीं होता
माँ बने बिना माँ को समझना
आसान नहीं होता
बीस से चालीस की उम्र
जिम्मेदारियों से भरी होती है
यादों के लिए न समय होता है
न दिल में जगह होती है
घड़ी की सुइयों के साथ उटना
इसका, उसका टिफिन बनाना
बच्चों की परवरिश
गृहस्थी की हजार झंझटें
आर्थिक, शारीरिक, मानसिक दिक्कतें
आशियाना बनाने के सपने
देखते बीत जाती है
इन सबके बीच
माँ तब कहीं छूट जाती है
पैंतालीय, पचास के बाद
अंतस से निकल
तू मेरे वजूद पर छा जाती है
मैं, मैं नहीं रह जाती
तूम मुझमें समा जाती है
समझ जाती हूँ तू क्यों
रखती थी मुझे बंद
अपने नयनों की तिजोरी में
नाजुक दिल सा संभालती थी
बेरहम, भूखी दुनियाँ से बचाती थी
आज जब मेरी रूह भी
अपनी नन्ही परी के लिये
वैसे की कांपती है
माँ तेरी बहुत याद आती है
उम्र के अंतिम पड़ाव पर
लगता है फिर बच्ची हो गई हूँ
तेरी गोद में सो गई हूँ
महसूसती हूँ तुझे
अपनी हर सांस हर धड़कन में
माँ तेरी इन यादों के साथ
चली जाऊंगी तब इस दुनिया से
फिर तुझसे ही मिल जाऊंगी
तेरी ममता की छाया में
करूंगी विश्राम
माँ तुझे प्रणाम
- डॉ. श्रीमती शशि दुबे, रायपुर

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