बाज़ारवाद का दैत्य लेखक

डॉ. अमरसिंह वधान
आधुनिक बाज़ारवाद और
लेखकीय संकट
साहित्य संस्कृति और समाज में गत दो दशकों में बाहरी, भीतरी और टकराहटों एवं संकटों के विभिन्न रूप सामने आए हैं। इसके मूल में विज्ञान की अद्भुत उन्नति, सूचना प्रौद्योगिकी के ग्लोबव्यापी करिश्मों, उदारीकरण, भूमंडलीकरण और आधुनिक बाज़ारवाद का प्रभाव सर्वाधिक सक्रिय है। शासनतंत्र, व्यावसायिक संगठन, राजनीति और सामाजिक विसंगतियों ने लेखकों और बुद्धिजीवियों के सम्मुख कई तरह के संकट पैदा कर दिए हैं। हर बिकाऊ चीज़ की तरह लेखक का सस्तीकरण करके प्रलोभन की चकाचौंध के जरिए उसे भी एक बिकाऊ चीज़ बना देना आधुनिक बाज़ारवाद का दर्शन है। संगठन, फिल्मी व्यवसाय, जनसंचार माध्यम और पत्रकारिता की चालें एक ईमानदार एवं विवेकशील लेखक को मौलिक तथा उत्कृष्ट साहित्य सृजन से अलग करके उसे मनोरंजनात्मक एवं लोकप्रिय साहित्य सृजन के मोह की ओर आकृष्ट करती हैं। इस सच्चाई से किसी को कुलबुलाहट महसूस हो सकती है कि आज लेखक अपने मौलिक एवं दैहिक सुख के लिए बिकता है। निराला, मुक्तिबोध, देवेन्द्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर जैसे लेखक अवश्य अपवाद के रूप में माने जा सकते हैं।
गौरतलब है कि बाज़ारवाद का दैत्य लेखक को बाहर और भीतर से पूर्णतया बदल देता है। उसकी दृष्टि सतही बन जाती है। साधारण सोच, गढ़े-गढ़ाए विचार, औसत बुद्धि और प्रारंभिक तथ्यों पर आधारित ऐसे विचारों और अनुभवों को वह प्रस्तुत करता है, जिनसे मास्तिष्क पर बोझ न पड़े। यथार्थ से पलायन, झूठी और नकली अनुभूति, रूढि़वाद, बौद्धिक दासता, विलासता, शक्तिपूजा, चौंकाने की वृत्ति आदि पर साहित्य रचा जाता है। ऐसा साहित्य दार्शनिक और नौतिक मूल्यों तथा कला के सौन्दर्य पक्ष से अलग होकर केवल मनोरंजन का साधन बनकर रह जाता है। उल्लेखनीय है कि लोक मनोरंजन के अधिकतर साधन जीवन-मूल्यों के विरोधी हैं, वे विकृत और भ्रष्ट प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देते हैं तथा नैमिक प्रश्नों से अलग रहने का प्रयास करते हैं। वे एक ऐसे संसार का चित्रांकन करते हैं, जिसमें भौतिक प्रगति ही उन्नति एवं विकास का प्रतीक स्वीकार की जाती है। बाज़ारीकरण के दबाव में लेखक जब भी समाज की विवेकशून्यता पर आक्रमण करता है तो वह कृत्रिम आक्रमण होता है या फिर अपने विचारों के लिए आत्मरक्षात्मक क्रिया। अमुक संस्थान एवं संगठन को वे अपनी ख्याति, समृद्धि और विलासिता में वृद्धि के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि बाज़ार के अनुरूप साहित्य की रचना सर्जन विधान के एकदम प्रतिकूल है। इस सूरत में लोकप्रिय पे्रस स्वतंत्र चिंतन और वर्णनात्मक शक्ति को प्रोत्साहन नहीं दे सकता। मजबूर होकर लेखक को अधिष्ठान के नियमों के अनुरूप ही साहित्य रचना पड़ेगा। यह इसलिए कि अधिष्ठान उसे भौतिक सुख विलास, मान-प्रतिष्ठा और ख्याति प्रदान करता है। सिरिल कोनाली ने ठीक ही कहा है, ''लेखक के लिए बहुत अधिक धन जहाँ खतरनाक है, वहाँ बहुुत कम धन घातक भी हैं।ÓÓ लेकिन कैथराइन एन. पोर्टर के ये शब्द भी नहीं भूलने चाहिए, ''तुम रोटी और क्रिया-स्वतंत्रता, दोनों को प्राप्त नहीं कर सकते। तुम समाज के विरोधी आलोचक रह कर यह आशा नहीं कर सकते कि समाज तुम्हें रोटी भी उपलब्ध कराएगा।ÓÓ निस्संदेह, यह कथन आधुनिक बाज़ारवाद की गिरफ़्त में फँसे भारतीय लेखक की नियति एवं संकटग्रस्त स्थति के विषय में बहुत कुछ संकेतित कर जाता है।
सह भी सत्य तथ्य है कि बाज़ारवाद की सहचर शासन-व्यवस्था लेखक के लिए एक विशिष्ट प्रकार के सन्नाटे का संकट उभारने से बाज़ नहीं आती। लेकिन विडंबना यह है कि अंग्रेजों ने जिस शासनतंत्र का निर्माण किया, उसे तोडऩे के रास्ते में बड़ी बाधा है। फिर लेखक भी समाज एवं शासनतंत्र से बाहर रहने वाला कोई प्राणी नहीं है। बाधा का ताप उसे भी झेलना पड़ता है। यद्यपि अंग्रेज चले गए, लेकिन वह शासनतंत्र और उसके आर-पार फैला हुआ सन्नाटा आज भी ज्यों-का-त्यों कायम है। शासद सत्ता और जन-जीवन के बीच फैले इस सन्नाटे को तोडऩा लेखक के लिए आसान नहीं है। भारतीय लेखक के सामने यक्ष प्रश्न यह है कि वह इस सन्नाटे के अंदर रहते हुए इसे कैसे तोड़े, इसे भेदकर शब्द कैसे दे। हमारे शासनतंत्र और उसमें संबद्ध बुद्धिजीवियों ने जिस अभिजात संस्कृति को जन्म दिया है, अपने आचरण और स्वभाव में, उसका हमारी जीवनधारा, हमारी व्यापक सांस्कृतिक भूख और आकांक्षाओं से दूर का संबंध भी नहीं विडंबना यह है कि इस भूख को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं, क्योंकि शब्दों के समूचे साधनों पर एक ऐसे पेशेवर बुद्धिजीवी का अधिकार है, जिसे भूख का कोई ज्ञान नहीं। भारतीय लेखक को बुद्धिजीवियों और जन-समुदाय के बीच उत्पन्न अलगाव, सामाजिक वर्गों के बीच आए आर्थिक अलगाव से कहीं अधिक लाइलाज़ प्रतीत होता है। ऐसी ही सच्चाई, एक अन्य संदर्भ में, लैवी स्ट्रांस ने शार बोन्यिर से बातचीत के दौरान उद्घाटित की थी।
यह करना भी $गलत नहीं है कि हमारी शासन व्यवस्था ने संस्कृति के नाम पर हमारे बीच एक विचित्र सूनेपन की रचना की है और लेखक भी इसके भीतर है। अधिकांश लेखक व्यवस्था द्वारा निर्मित उस संस्कृति से आक्रान्त हैं जो हमारे मूल्यों और हमारे सोचने समझने के चौखटों को तैयार करती है। लेकिन इधर के लेखक के लिए अपनी कलम से इन चौखटों को बदलना आसान नहीं हैं। टॉमस मान, बे्रख्त जैसे लेखकों को भी उनसे बचकर दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ती थी। आधुनिक यांत्रिकता, सामूहिकता और व्यावसायिकता ने जिस बाज़ार परिवेश को निर्मित किया है, उसमें लेखक के लिए साँस लेना कठिन है। उसकी त्रासदी यह है कि यदि वह भौतिक सुख-सुविधा को भोगना चाहता है तो उसे अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता और सृजन की आंतरिक लगन को छोडऩा पड़ेगा।
प्रसंगवश, प्रसिद्ध नाटककार रास्तां ने अपने नाटक 'सीरानोÓ में साहित्य और बाज़ारवाद की माँग की बड़ी विश्वसनीय तस्वीर चित्रित की है। सीरानो एक विवेकशील एवं संस्कारशील कवि है। जब उसका एक मित्र उससे कहता है कि वह अपनी कृति में थोड़ासा परिवर्तन कर ले तो उसकी कृति व्यावसायिक दृष्टि से प्रदर्शित हो सकती है। इस पर कवि सीरानो जो उत्तर देते हैं, वह प्रत्येक विवेकशील लेखक की आवाज़ बन जाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि हम मनुष्य पहले हैं, लेखक, मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक या वास्तुविद् बाद में। अत: लेखक से पहले एक अच्छा इंसान होना जरूरी है। मिसाल के तौर पर क्रिस्टोफर मार्लो के नाटक 'डॉ. फॉस्टसÓ का नायक फॉस्टस अपनी प्रतिभा एवं साहस से जीवन में आगे बढ़ा है। उसके पास असीम मानव ज्ञान है, लेकिन स्थितिवश वह उस ज्ञान से असंतुष्ट है। आत्म विश्वास एवं महत्वाकांक्षा ने उसे ख्यातिलब्ध बनाया था। स्वर्गदूत और नरकदूत बारी-बारी से रात्रि के समय आकर उसे अपने-अपने तर्कों से प्रभावित करते हैं। शैतान डॉ. फॉस्टस को तरह-तरह के प्रलोभन देकर जादू-टोना की विद्या सिखाकर मैफिस्टोफिल्स के साथ चौबीस वर्षों की अवधि की संविदा पर हस्ताक्षर करवा लेता है। डॉ. फॉस्टस इस अवधि के दौरान ज्ञान, शक्ति और पूर्ण विलासिता का जीवन व्यतीत करता है। संविदा की शर्त के अनुसार लूसिफर और मैफिस्टोफिल्स अर्धरात्रि में आकर उसकी आत्मा ले जाते हैं। 'डॉ. फास्टसÓ प्रलोभन में आकर अपना सब कुछ गँवा बैठता है। आत्मा की सुरक्षा के लिए ईश्वर से की गई सभी फरियादें व्यर्थ रह जाती हैंद्ध आधुनिक बाज़ारवाद के व्यावसायिक प्रलोभन में फँसे एवं मिटे ऐसे ही कई लेखकों को देखा जा सकता है।
इधर पद-प्रतिष्ठा और संगठन का दैत्य लेखक की स्वतंत्रता को खत्म करके अवैयक्तिक रिश्तों को जन्म दे रहा है। बड़े-बड़े उद्योग-धन्धों, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और जन प्रसारण के साधनों ने लेखक को एक भयंकर स्थिति में डाल दिया है। अधिकतर लेखक अपने सृजन कर्म और धर्म से फिसलकर अर्थतंत्र के नागरिक बन जाते हैं। व्यावसायिक संगठन उन्हें ऊँचे वेतन-पद एवं सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उनकी जीवन पद्धति को ही बदल देते हैं। धन, पद-प्रतिष्ठा एवं भौतिक सुविधाओं में इतराने वाला लेखक आहिस्ता-आहिस्ता अपने बुनियादी पारिवारिक जीवन, घर की नन्हीं-नन्हीं खुशियों तथा नैसर्गिक रुचियों व लगन से वंचित हो जाता है। उधर संगठन में ये सभी चीजें कृत्रिम रूप में मिलने पर भी वह प्राकृतिक संतुष्टि महसूस नहीं करता। वह 'संगठन मनुष्यÓ होने तथा अपने अस्तित्व की अतिवेदना से स्वयं को बचा नहीं पाता है।
जाहिर है कि बाज़ारवाद का 'अतिसंगठनÓ रूप लेखक पर कई प्रकार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दबाव डालकर तथा उसके पारिवारिक एवं निजी जीवन में हस्तक्षेप करके उसके अस्तित्व को संकट में डाल रहा है। लेखक को मजबूरन अमुक संगठन के मूल्य स्वीकार करने पड़ते हैं और उसका निजी विवेक , वैचारिक चिंतन और रचना कर्म संगठन के कायदे-कानूनों में दबकर रह जाता है। सफलता, पदोन्नति और उच्च पद प्राप्त करना ही उसकी योग्यता का परिमाप बन जाता है। यह एक तरह से लेखक का बाज़ारीकरण ही है। ज़ाहिराना तौर पर साहित्य का संबंध भौतिक सुरक्षा या संगठनाश्रय से कायम नहीं किया जा सकता। आर्थिक विषमताओं में भी लेखक उच्चकोटि का साहित्य सृजित करते रहे हैं। साहित्यिक अभिरुचि भौतिक उन्नति से मुक्त होती है। सृजन प्रतिभा न बाह्य प्रेरणा से पैदा होती है और न उसके अभाव में मरती है। उसकी सृजन प्रतिभा को सक्रिय करने के लिए सृजन की स्वतंत्रता ही का$फी होती है। एक विशिष्ट अर्थ में देखो तो बाज़ारवाद लेखक की सृजन शक्ति तथा साहित्यिक अभिरुचि दोनों का ही विनाश कर रहा है। लेकिन लेखक इस सच्चाई को भी न भूलें कि विज़न की स्वतंत्रता एक महान कृति की रचना की मूल शर्त है। बाज़ारवाद में उनके विज़न एवं विवेक का संरक्षण कतई संभव नहीं है।
साहित्यिक गुटबाजी, दलबंदी एवं मेड़बंदी ने भी लेखकीय संकट को बाज़ारी संकट जैसा बना दिया है। बाज़ार एवं दलबंदी दोनों में ही एक से अधिक चेहरे होते हैं, किन्तु भावना की सच्चाई गायब रहती है। कल तक नागार्जुन की कविता, कविता नहीं थी, किन्तु आज वह शीर्षस्थ है। जो लोग किसी समय नरेन्द्र के 'लाल निशानÓ, पंत की 'युगवाणीÓ आदि को उनके कवि कर्म से भटक जाने का प्रमाण मानते थे, वे अब ऊँचे स्वर से देश भक्ति को ही कविता का एकमात्र धर्म गिनते हैं। लगता है जैसे अचानक ही कई लोगों के एक से अधिक चेहरे दिखाई पडऩे लगे हैं। यह इतिहास का एक व्यंग्य ही है कि प्रगतिशील लेखकों और उनकी मान्यताओं तथा सिद्धातों के कट्टर विरोधी आज एक अन्य मार्ग से चलकर उन्हीं मान्यताओं के प्रबल समर्थन तक जा पहुँचे हैं। अवसरवादिता का बाज़ार साहित्य में भावना की सच्चाई को धूमिल करके लेखकीय संकट पैदा करता है। हमारी संपूर्ण सांस्कृतिक चेतना की पृष्ठभूमि में इस प्रकार का भाव विस्फोट एवं अवसरवादी दृष्टिकोण अंतत: रचनात्मक तन्तुओं को छिन्न-भिन्न करने में ही योग देगा, किसी नई चेतना के निर्माण में नहींं।
सांस्कृतिक दासता को भी उदारीकरण, बाज़ारीकरण निजीकरण एवं भूमंडलीकरण से बड़ा प्रोत्साहन मिलता है। अमरीका का यह बाँका सांस्कृतिक षड्यंत्र एशिया और अफ्रीका के देशों में स्थापित विचारधारा का विरोध करके काफी प्रभाव छोड़ रहा है।
निस्संदेह, आज का लेखक उलझन में है और अप्रकट संकट से संशयग्रस्त है। इस अलझन भरी नज़र से परिचित होकर लेखक ने स्वयं को बेगाना घोषित कर दिया है। उसे भतर रहना असंगत लगाता है और बाहर रहना व्यर्थ। लेकिन स्वीकार किसे करे। बाज़ारवाद के नकाबों के पीछे क्या है, यह तो वह जानता नहीं, फिर भी इनके दायरे में आ जाता है। इसीलिए साहित्य के अग्रिम दस्ते में अंधेरे का चित्रण अधिक हुआ है और लोकप्रिय साहित्य का उद्देश्य भी तो यही है। यहाँ याद रखने वाली बात यह है कि प्रत्येक आत्महत्या अंधकार से ही शुरू होती है, संदेह से ही ढलान पर लुढ़कना सार्थक लगता है। बाज़ारवाद के प्रभावाधीन जब लेखकीय रेखाएँ समानान्तर न हों और एक दूसरे को काट रही हों, सबकुछ अस्पष्ट-अपरिभाषित तथा अपरिचित होता जा रहा हो, सामने बैठे व्यक्ति, सामने के पदार्थ और घटनाएँ विश्रृंखल एवं बेमानी लगने लगे, तब स्थिति मजबूर करती है कि लेखक अपनी रचनाधर्मिता और सरोकारिता का निर्णय कैसे करे, किस आधार पर करे। इस संदर्भ में लेखक का संकट संभावतापूर्ण है, यह खोखला संकट नहीं है।
यह भी कि इधर आधुनिक बाज़ारवाद ने कई स्तरों पर नए-पुराने भ्रमों को भंग किया है। लेकिन लेखक का इस ओर कम ही ध्यान जाता है कि बाज़ारवाद अब अपने कौन-से नए भ्रम उत्पन्न करेगा। अनुभव से यह सिद्ध नहीं होता कि जो व्यक्ति और समूह मोहों में पल रहे हैं, उससे भ्रममुक्त व्यक्ति या समूह श्रेष्ठ है अथवा यह कि पश्चिमी देशों में भ्रमों पर विजय प्राप्त कर ली गई है। पश्चिमी यूरोप के नीत्शे जैसे निषेधवादी विचारकों से नाजियों ने सामूहिक हत्या का पाठ पढ़ा, जबकि नीत्शे का मन्तव्य यह नहीं था। दूसरी ओर, अमरीका में आज भी 'संकल्प शक्तिÓ अधिक है और अपनी समृद्धि की रक्षा के लिए अमरीकी चिंतक वर्ग सामंजस्य का 'भ्रमÓ प्रचारित कर रहे हैं। वैसे दो-दो महायुद्धों के बाद पश्चिमी लेखक के भ्रम टूट चुके हैं। लेकिन अमरीकी लेखक एक विनाश आशंका से पीडि़त है। भारतीय लेखक भी इसका अपवाद नहीं है। उसे मालूम है कि संभावित आगामी महायुद्ध में भारत की स्थिति क्या होगी। इतिहास के एक पन्न से पता चलता है कि रोहिणी नदी के जल विवाद को लेकर शाक्यों और कोलियों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई थी, लेकिन 28 वर्षीय की विवेकशीलता एवं शांतिमूलक तर्कों से युद्ध होते-होते टल गया था। भारतीय लेखक इस विचारधारा एवं नैतिक मर्यादा से सुअवगत है।
बाज़ारवाद भारतीय लेखक के सामने जो संकट, भय एवं प्रतिकूल स्थितियाँ पैदा कर रहा है, उनके प्रति सचेत रहने के लिए जरूरी है कि वह नई विचारधारा के प्रबल संवेग एवं संदर्भानुसार संघर्ष चेतना की धार से स्थितिशीलता में परिवर्तन करें। पे्रमचंद, तकषी शिवशंकर पिल्लै, निराला, मुक्तिबोध, ताल्स्तोय, दोस्तोव्यकी और बोरिस पास्तेर्नाक ने संगठनात्मक, व्यावसायिक एवं बाज़ारवाद के चमकीले प्रलोभनों, पद-प्रतिष्ठा तथा भौतिक सुख-सुविधाओं के चक्रव्युह से बचते हुए अपनी सृजनधर्मिता तथा सामाजिक सरोकारों को सदैव सुरक्षित बनाए रखा। माना कि आधुनिक बाज़ारवाद की ज्यामिति बड़ी आकर्षणमूलक है। लेकिन पराए बोधों एवं व्यावसायिक जीवन-पद्धतियों से न तो स्वबोध पैदा होगा और न ही संयम की अनुभूति दिशा-निर्देश दे सके गी। सच तो यह है कि साहित्य या कला सदा किसी विशिष्ट रक्त का सृजन होता है और केवल उस रक्त से संबंध रखने वाले लोग ही उसे समझ सकते हैं। ऐसा रक्त बाज़ार में किसी दुकान में पड़ी बिकाऊ चीज़ नहीं होती और न हो सकती है।

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