बार-बार गिर जाती थी

डॉ. राकेश अग्रवाल
पथ स्वयं आयेगा
चींटियों की आती-जाती लाइन को नन्हा विशु बड़े गौर से देख रहा था। उसके मन में इसको लेकर कितने ही प्रश्न चक्कर काट रहे थे। चीटियों को देखते-देखते उसने वहीं से आवाज दी, ''पापा देखो! ये चीटियाँ अपने मुँह में दाने दबा कर कहाँ ले जा रही हैं?ÓÓ यह प्रश्न वह बार-बार दोहराता रहा। उसकी जिज्ञासा को देखकर मैं भी चीटियों के श्रम को देखने के लिए वहीं पहँुच गया। चींटी कितना छोटा सा प्राणी है, किन्तु अपने कार्य में बिना किसी आलस, द्वेष, ईष्र्या, छल, कपट, भेद-भाव के निरन्तर लगा रहता है। इस छोटे जीव के अथक परिश्रम को मैंने विशु को समझाने का यत्न किया जो एकटक अब भी उन्ही चींटियों को देखे जा रहा था। इसी समय एक कोने से कुछ गिरने की आवाज आयी। मुड़कर देखा तो वहाँ एक अपाहिज छिपकली अपने शिकार के साथ अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए दीवार पर चढऩे का प्रयत्न कर रही थी किन्तु बार-बार गिर जाती थी। कई बार गिरने के बाद भी उसने हार नहीं मानी और अन्त में उसे विजय मिल गयी और वह अपने लक्ष्य पर पहूँच गयी। विशु खुशी से उछल पड़ा जैसे उसने ही विजय पा ली हो। मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया—''उर में हैं आग लक्ष्य की पथ स्वयं आयेगा।ÓÓ नन्हेें विशु की पीठ पर हाथ रखकर मैंने अपने आप से कहा-''जो लोग बीच में हिम्मत नही हारते उन्हें ही सफलता मिलती है। परिश्रम का फल सदा मीठा होता है। परिश्रम से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। श्रम में गति और गति और गति में ही जीवन है। आलस्य जीव को जड़ बनाकर उसका जीवन छीन लेता है। नदी अविरल बहती है।ÓÓ

एकता
एक दिन शरीर के अंगों में अपने-अपने महत्व को लेकर बहुत छिड़ गयी। हाथों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए शेखी बघारी कि यदि मैं काम करना छोड़ दूँ तो पत्ता भी नहीं हिल सकता। पैरों ने जमीन पर ठोकर मारते हुए दम्भ दिखाया - मुझ पर ही तो सारा शरीर अवलम्बि है, मेने बिना वह माँस के लोथड़े से अधिक कुछ भी नहीं। मुहँ, कान, नाक सबने बारी-बारी से अपने को सबसे महत्तवपूर्ण बताया। बाहरी अंगों की बहस सुनकर शरीर के आन्तरिक अंगों दिल, दिमाग आदि के भी कान खड़े हो गए। वे कुछ बोलते इतने में पैर पर किसी कीड़े ने डंक मार दिया। मस्तिष्क के आदेश पर हाथों ने आँखों की सहायता से कीड़े को दण्ड दे दिया। जलन को कम करने के लिए डंक लगे स्थान पर मुँह फूँक मारने लगा। सारे अंग हरकत में आ गए।
अब सब अंग समझ गये थे कि सहयोग, समन्वय और एकता का ही नाम शरीर है।

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