बेचैन करता हुआ नाद

डॉ. अमल सिंह ''भिक्षुकÓÓ
हिन्दी $ग•ाल की शुद्धता और विकास
'उनसे पूछो कि $ग•ाल क्या है $ग•ाल का उन क्याÓ
चंद लफ्जों में कोई आग छुपा दी जाये।
कोमल-कोमल $ग•ालों में तूफानों के पैगाम ''हफीजÓÓ
मीठी-मीठी बातों से भी तुम तो आग लगाते हो।Ó

''$ग•ालÓÓ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल अर्थ ''औरतों से या औरतों के विषय में बातें करनाÓÓ है। शुरु-शुरु में जो $ग•ालें लिखी गईं, उनके कथ्य के आधार पर ही उसका नामकरण किया गया। $ग•ाल मूलत: अरबी भाषा की एक लोकप्रिय महत्वपूर्ण काव्य-विद्या है। इस काव्य-विद्या को जब फारसी के कवियों ने अरबी से उधार तो शिल्पगत सीमाओं के पालन में उन्होंने अरबी $ग•ालकारों का ही अनुसरण किया किंतु कालांतर में वे अरबी $ग•ालकारों से विषयवस्तु की दृष्टि से आगे निकल गए। फारसी अदब से जब उर्दू अदबम में $ग•ाल आयतित हुई तो परिवेश को हू-ब-हू अपनाया गया, पर कथ्य बिल्कुल भारतीय हो गया। बहरहाल, उर्दू के समृद्ध $ग•ालकर फारसी की श्रेष्ठता ही स्वीकारते रहे। सायद इसीलिए उर्दू के दिग्गज $ग•ालकार मिर्जा गालिब के युग में $ग•ाल की शुद्धता के लिए उसकी भाषा और उसके व्याकरण को फारसी के अनुकूल-अनुरूप ही रखने पर बल दिया गया। इस तरह उर्दू $ग•ाल का आदर्श फारसी $ग•ाल को मानते हुए उसके सभी मापदंडों को ही उर्दू में ग्रहण कर लिया गया। उर्दू $ग•ाल को मानते हुए उसके सभी मापदंडों को ही उर्दू में ग्रहण कर लिया गया। उर्दू फारसी की यह सशक्त विद्या जब हिंदी में पदार्पण करती है, तब अपने परंपरागत अर्थों से वह कब की टूट चुकी होती है। यही क्यों, उसने अभिव्यक्ति के कई नये आयम तलाश कर ली है। सन 1970 के आसपास अनेक ऐसी $ग•ालें उपलब्ध हैं, जिन्हें निसंकोच हिंदी $ग•ालें कर सकते हैं।
विनय संकोची सही फरमाते हैं कि हिंदी $ग•ालें आज धड़ल्ले के साथ लिखी जा रही हैं। लेकिन यदि हम फारसी-उर्दू $ग•ाल को सामने रखें तो हिंदी कवियों द्वारा इस विद्या को अपनाने में और इसका साहित्यिक रुप बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि वे पहले उर्दू $ग•ाल के मिजाज और उसके सही स्वरुप को समझे। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो $ग•ाल लिखना उनके लिए आसानतरीन हो सकता है। इसे और स्पष्ट करते हुए ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं कि आसानतरीन यों कि हिंदी $ग•ालकारों के लिए फिर $ग•ाल की परंपरा, तगज्जुल, मिजाज जैसा कुछ नहीं बचता। उर्दू $ग•ाल, उर्दू जवान, $ग•ाल का अरुज (व्याकरण) इनका निषेध करके हिंदी $ग•ाल लिखी जाएगी तो वह $ग•ाल जैसी कोई अन्य विद्या होगी। वे आगे कहते हैं कि हिंदी $ग•ालकारों को $ग•ाले लिखते वक्त इस ओर ध्यान देना होगा कि $ग•ाल की जरुरती शर्त उसकी बहर, काफिया-रदीफ ही नहीं, $ग•ाल का मिजाज भी है। वरना हिंदी की $ग•ालें अशआर का जमघट तो बेशक होंगी, स्तरीय रचनाएं नहीं। और संभवत: इसीलिए $ग•ाल लिखने के लिए हुनर की नहीं, फन की जरुरत होती है। वरिष्ठ कवि त्रिलोचन शास्त्री जी ने भी स्वीकार किया है कि उर्दू $ग•ालों में जो भाष आती है, वह बोलचाल का वही लहजा पकड़ती है जिससे कविता में जीवन तत्व आता है। हिंदी में लिखने वाले बोलचाल का सौंदर्य देख नहीं पाते। हिंदी का वातावरण अलग है। उसको रुपायित करने के लिए वाक्यों में लोच की जरुरत है और इस लोच को लाने में बड़ी मशक्कत है।
$ग•ाल वस्तुत: कोमल और कुछ हद तक रुमानी विद्या है। उसका शेर भाव और कल्पना पर आधारित होता है जिसमें किसी एक विषय वस्तु को जेइन में धारण करते हुए $ग•ालकार शेर को इस कलात्मक ढंग से कहता है कि वह शिल्प और कथ्य की दृष्टि से नवीन मौलिक प्रतीत हो। शायद इसीलिए हिंदी $ग•ाल की संवेदना और शिल्प बारीक बुनावट के साथ सघन रचाव की मांग करते हैं। $ग•ाल का हो जाना महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण है उसमें $ग•ाल का मिजाज पैदा करना। यह हासिल होता है सघन अनुभूति और नुकीली एकाग्रता से, न कि शिल्र की चुस्ती से। कई बार देखा गया है कि शिल्पगत सौंदर्य के बावजूद भी शेर प्रभावित नहीं करते। चूंकि शिल्पगत प्रौढ़ता के साथ ही उसमें कथ्यगत नूतनता, भावनाओं का आवेग, बेचैन करता हुआ नाद और कल्पनाशील जैसे कतिपय अन्य जरुरी तत्व भी आवश्यक है। इस प्रवृत्ति को मुकव्वल तौर पर समझे बिना शुद्ध हिंदी $ग•ालें नहीं कही जा सकती है।
वैसे तो हिंदी $ग•ाल की कतिपय सुस्पश्ट और दृढ़ धारणाएं भी है। मसलन, हिंदी $ग•ाल हिंदी में उर्दू गलज से नहीं आयी। वह उर्दू $ग•ाल से नितांत भिन्न है। उसकी शब्द योजना, वातावरण, तेवर, संस्कृति और शिल्प- सब हिंदी का अपना है। जिस तरह उर्दू $ग•ाल उर्दू के व्याकरण से अनुशासित है, ठीक उसी तरह हिंदी $ग•ाल हिंदी व्याकरण और छन्द शास्त्र से अनुशासित हैं। उस पर उर्दू व्याकरण और छन्द शास्त्र की व्याकरण और छन्दशास्त्र से अनुशासित है। उस पर उर्दू व्याकरण और छन्दशास्त्र की बंदिशें थोपना न्यायसंगत नहीं है। अत: हिंदी $ग•ाल उर्दू की बाहरों में ही कही जाए, यह आवश्यक नहीं। हिंदी $ग•ाल का अपना छांदसिक सौष्ठव है। $ग•ाल सममात्रिक छन्दों में निबद्ध काव्य विद्या है। हिंदी $ग•ाल उर्दू बहरों के समानांतर हिंदी के मात्रिक छन्दों में अधिकतर निबद्ध है। हिंदी कवियों ने इस क्षेत्र में प्रयोग धर्मी प्रवृत्ति का परिचय दिया है। हिंदी $ग•ाल प्रारंभिक रिवायती (पारंपारिक इश्क, मुहब्बत और आशिक-माशूक वाली) से भिन्न खुरदुरे समकालीन यथार्थ की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई है। ''$ग•ालÓÓ शब्द का पर्याय ढूंढने के प्रयास में किसी ने उसे ''गीतिकाÓÓ कहा तो किसी ने ''मुक्तिकाÓÓ, किसी ने ''अनुगीतÓÓ कहा तो किसी ने ''द्विपंक्तिकाÓÓ और किसी ने ''तेवरीÓÓ कहा। मेरे विचार से उसे हिंदी $ग•ाल कहना ही सर्वाधिक उपयुक्त है। हिंदी में $ग•ाल की परंपरा अमीर खुसरो, कबीर, मुहम्मद कुली, भारतेंदु हरिशचंद्र और निराला से जुड़ती है न कि गालिब, जौक, दाग, हसरत मोहानी और फिराक गोरवपुरी से। हिंदी में जो लचीलापन और प्रयोगधर्मी चेतना है, वह संसार की सभी भाषाओं से अधिक है। इसने विशुद्ध फारसी $ग•ाल और विशुद्ध जापानी छन्द हायकू को पचाकर अपनी प्रकृति के अनुरुप उन्हें ढाल लिया है जिससे हिंदी में $ग•ालनुमा कविताओं की बाढ़ आ गई है। वैसे तो $ग•ाल का दूर शेर एक इकाई होता है और तथ्य की दृष्टि से पूर्ण भी होता है। दूर शेर का अलग-अलग अर्थ होता है, किंतु हिंदी में वह अपना रुप बदल चुका है। इस बदलाव ने उसे कवितानुमा बना दिया है जिससे वह आधा तितर-आधा बटेर जैसा हो गया है।
बहरहाल, हिंदी $ग•ाल ने उर्दू $ग•ालों की जो प्रचलित बहरें थी, उसे बखूबी अपनाया है। चुछ नये प्रयोग भी हिंदी $ग•ाल में किए गए हैं। यथा-उर्द बहरों में लिखी गई हिंदी $ग•ालें, हिंदी के उन छंदों का प्रयोग जो कि उर्दू बहरों में भी मिलते हैं, विशुद्ध हिंदी छन्द और नवीन के उन छन्द प्रयोग । हिंदी $ग•ाल में आठ से लेकर बत्तीस मात्राओं तक के छन्दों का प्रयोग खूब हुआ है। हिंदी $ग•ाल ने नई प्रयोगशीलता का परिचय लय, तुक, उक्ति बैचित्र्त, बिम्ब, प्रतीक, समान्तरता आदि शिल्प तत्वों की दृष्टि से भी दिया है।
आम आदमी की भाषा और शब्द प्रयोग जो काव्य की दृष्टि द्वेय रहे हैं, उन्हें हिंदी के $ग•ालकारों ने बखूबी अपनाया है। एतएव, शुद्धता की दृष्टि से हिंदी $ग•ाल वही कहला सकती है जो हिंदी भाषा की शब्दावली से युक्त, वण्र्यक्षमा रखने वाली, लालित्य, कथन-चातुर्य, सुकुमारता और प्रवाह से पूर्ण हो। अत: जो अन्य भाषा के मापदंडों से हिंदी $ग•ाल की शुद्धता मापेंगे उन्हें अवश्य ही निराशा हाथ लगेगी।
भारत में $ग•ाल का जन्म उस समय हुआ है जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। प्राचीन $ग•ालों में मुगलों की एय्याशी-अंग्रेजों के शोषण का प्रभाव स्पष्ट रुप से लक्षित होता है। माना कि आरंभित $ग•ालों में प्रेमी-प्रेमिका की प्रेमक्रीड़ाओं, प्रेमालापों, भाव-भंगिमाओं और मनोभावों का अत्यन्त ही मनोहारी चित्र खींचा गया है जिनमें लौकिक-पारलौकिक प्रेम की धारा ''सुरसरिसमÓÓ अबाध गति से प्रवाहित है। यहां विरहागिन में विदग्ध, प्रेम की पीर से व्यथित प्रेमी हृदय की पीड़ा की जीवनंत अनुभूति मौजूद हैं। अब बदलते समय के सच के साथ ही $ग•ाल ने अपने को बहुआयामी बना लिया है। उसने अपने दामन में दुनिया के प्रत्येक विषय को समेटने का भरपूर प्रयत्न किया है। आज की $ग•ालों में शायर का परिवेश बोलता है, जिसमें संपूर्ण मानव जाति का दिल धड़कता है। $ग•ालकार जीवन को जैसा देखता है वैसा ही अनुभव भी करता है और वह जैसा भोगता है उसे वैसा प्रयोग भी करता है।

फूल की केवल नहीं, अब खार भी होगी $ग•ाल
वक्त की आवाज है, तलवार भी होगी $ग•ाल

इतिहासकारों का विचार है कि उत्तरी भारत में हजलगोई की शुरुआत तेरहवीं सदी के अंत में और चौदहवीं सदी के आरंभ हुई। चूंकि अमीर खुसरों का यही काल था जिन्हें उर्दू-हिंदी का पहला कवि माना जाता है। अमीर खुसरों जहां एक ओर फारसी का बड़ा कवि था, वहीं दूसरी ओर अरबी-संस्कृत में भी पूरी महारत रखता था। वह खड़ी बोली हिंदी का पहला कवि है, जिसने दिल्ली की जनता की भाषा में शायरी की। पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ने लिखा है कि ''अमीर खुसरे चौदहवीं सदी का सबसे पहला शयार है, उनकी हिंदी रचनाएं बहुमूल्य हैं।ÓÓ यह इतनी सुंदर और आकर्षक है कि सरल एवं साफ-सुथरी हिंदी भाषा लिखी। अमीर खुसरों का यह शेर बड़ा ही मनमोहक है-

सखी, पिया को जो मैं न देखूँ तो
कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ
किसे पड़ी है जो जा सुनादे प्यापे
''पीÓÓ को हमारी बतियाँ।

सत्रहवीं सदी में ''वलीÓÓ के दिल्ली आने के बाद उर्दू शायरी ने और भी तेज गति पकड़ ली। इसके बाद ''दर्दÓÓ सैदा, और मीर की साहित्यिक जीवन का शुभारंभ हुआ। उनकी शैली ने $ग•ाल को एक नयी दिशा दी। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण ने उर्दू शायरी को काफी प्रभावित किया। उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थिति का गहरा प्रभाव उर्दू-शायरी पर पड़ा। दिल्ली से पलायन करके लोग लखनऊ चले गए और साहित्य का नया केंद्र लखनऊ बन गया। ''मीरÓÓ और सैदा के एक लंबे अंतराल के बाद महाकवि मिर्जा गालिब, मोमिन और जौक ने शेरो शायरी की कमान संभाली। इसी समय के दूसरी पंक्ति के शायरों में बहादूर शाह जफर और शेखता का नाम आता है। सन 1857 की क्रांति का सीधा प्रभाव उर्दू शायरी पर पड़ा। इस जमाने में भी ''दागÓÓ और ''अमीरÓÓ ने अपनी-अपनी $ग•ालों द्वारा धूम मचायी। बीसवीं सदी में एक तरफ ''इकबालÓÓ, ''चेखवतÓÓ और थोड़ा समय के बाद कवियों में जोशमलीहाहादी ने देशभक्ति, क्रांतिकारी राष्ट्रीय शायरी कर पूरे देश में तहलका मचा दिया। इसी शताब्दी में आगे चलकर ''शादÓÓ, ''पानीÓÓ, ''जिगरÓÓ और ''फिराकÓÓ गोरखपुरी जैसी कवियों ने गुलशने $ग•ाल की सिंचाई की। सन 1936 में अंतत: प्रगतिशील कवियों ने भी $ग•ाल को गले लगाया, सजाया, संवारा और दुल्हन बनाया जिनमें प्रमुख रुप से मजरुह सुल्तानपुरी, अली सरदार जाफरी और जगन्नाथ आजाद सम्मिलित थे। इन्होंने $ग•ाल को उसका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाया। आजकल की बिलकुल नयी पीढ़ी में ''बशीरखद्रÓÓ असद बदायूनी, खुर्शीद अकबर, तारीक, मतीन एवं कौशर मजहरी जैसे महत्वपूर्ण शायर हैं, जिनकी $ग•ालें पढऩे के बाद यह अनुमान होता है कि $ग•ाल का भविष्य काफी उज्जवल हैं।
हिंदी साहित्य के कवियों में भारतेंदु हरिशचंद्र और उनके समकालीन कवियों ने उर्दू मुशायरों की सफलता और उर्दू गलकारों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर खड़ी बोली में $ग•ाल कहने की कोशिश की। पर, फारसी की सुदृढ़ नींव पर खड़ी उस काल की उर्दू $ग•ाल तक हिंदी कवियों का पहुँचना कठिन था। उन्होंने $ग•ाल को गंभीरता से न लेते हुए केवल कोशिश भर की और देखा कि बात नहीं बन रही है तो $ग•ाल से अपना हाथ खींच लिए। जयशंकर प्रसाद की ''मूल शीर्षक कविता $ग•ाल-पद्धति की है। निराला ने भी $ग•ाल शैली अपनायी।ÓÓ दिनकर ने इसे सजाया-संवारा। निराला ने ''वेलाÓ में फारसी उर्दू $ग•ालों और उसके बहरों का जो प्रयोग किए हैं उससे खड़ी बोली हिंदी संकीर्ण दायरे से उठकर नूतन भाव-छन्द का जमीन पर प्रतिष्ठित हआ। निराला से ही ''नयी कविताÓÓ और ''नवगीतÓÓ को नये आयाम प्राप्त हुए हैं। ''नयी कविताÓÓ के कवि और नवगीतकारों ने भी $ग•ालों में अपनी अभिव्यक्ति दी है। दुष्यंत के पूर्व काल में कविता के लिए छन्द को अनिवार्य मानने वाले गीतकार ही $ग•ाल विद्या को जीवित रखे हुए थे। शमशेर, बलवीर सिंह रंग, भवानीशंकर, शंभुनाथ शेष, जानकी वल्लभ शास्त्री, रुपनारायण त्रिपाठी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन, रामावतार त्यागी, बालस्वरुप राही, शेरजंग गर्ग जैसे कवियों ने हिंदी में $ग•ाल विद्या को जीवित तो रखा है गद्योन्मुख हुई नई कविता के दौर में भी छन्द को मरने नहीं दिया।
ध्यान रहे, $ग•ाल में गेयता के गुण जरुर मौजूद हैं। पर, वह गीतात्मक होने के बावजूद भी गीत नहीं है। भले ही दोनों विधाओं में परस्पर निकटता है, इसके बावजूद मूलभूत भिन्नताएं भी हैं। $ग•ाल को हीत के चश्में से देखना-परखना बेमानी होगी, बेशक कुछ गीतकारों-नवगीतकारों ने $ग•ाल को गीत के मुहावरे में लिखने का प्रयास किया है। बिल्कुल यही $ग•ाल का मिजाज आहत हुआ। सन 1970 के आसपास दुष्यन्त कुमार ने ''साये में धूपÓÓ $ग•ाल संग्रह प्रस्तुत कर $ग•ाल की दुनिया में एक अद्वितीय नाम जोड़ दिया। उन्होंने $ग•ाल के द्वारा क्रांतिकारी विचारों की जब अभिव्यक्ति प्रदान की तो नई कविता के गद्योन्मुख आतपरद्घ छन्द की धरती पर जैसे आषाढ़ का बादल बरसने लगा। अत: हिंदी $ग•ालकार के रुप में स्थापित होने का परम सौभाग्य दुष्यंत को ही प्राप्त हुआ। बकौल दुष्यंत कुमार ''ये $ग•ालें उस बाषा में कही गई है जिसे में बोलता हूं।ÓÓ वास्तवम में, $ग•ालों के हिमालय से गंगा निकालने की बात दुष्यंत की लेखनी से ही संभव हो सका है-

''हो गई पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिएÓÓ

दतन्तर हिन्दी में $ग•ाल कहने वालों की एक पूरी पीढ़ी उभर आई है। आज हिन्दी $ग•ाल लिखने वालों की बड़ी तादाद है। वे निरंतर अच्छी-अच्छी $ग•ालें बखूबी लिख रहे हैं। दलित साहित्य में भी स्तरीय $ग•ालें लिखी जा रही हैं। हिंदी $ग•ाल आज हिंदी साहित्य में अपने पैर जमाने में लगी हुई हैं। जबकि इसके अथाह सागर में तरह-तरह के हीरे-जवाहरत भरे पड़े हैं। इसकी रंग-बिरंगी रंगीन दुनिया में एक अजीब-सा आकर्षण है। फिर भी, वह हिंदी साहित्य में सर्वमान्य विधा के रुप में अपने को स्थापित करने और अपेक्षित सफलता प्राप्त करने के लिए आज भी संघर्षरत है। पता नहीं क्यों, हिंदी साहित्य के इतिहासकार इसे एक स्वतंत्र विधा के रुप में मान्ता देने में कतरा रहे हैं।
अंत- में, कहना होगा कि हिंदी में जो शुद्ध गजें लिखी जा रही हैं, वह नवरस से परिपूर्ण एक ऐसी सतत गतिशील धारा है जो प्रवाहमान रहकर पाठकों, श्रोताओं को आनंदमग्न करती रहेगी। मुजे पूर्ण विश्वास है कि शीघ्र ही वह हिंदी साहित्य के इतिहास में एक स्वतंत्र विधा के रुप में स्थापित होगी।

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