भजन संग्रह हिंदी किताब - गायत्री देवी शर्मा

मन की बात

संसार नश्वर है ज्ञान रहने पर भी मानव पुर्नजन्म में ऊलझा हुआ है। हम मृत्यु के पहले व पुर्नजन्म पर प्रगट है। इस पुर्नजन्म पर भवसागर से मुक्त होने के लिए कागभुषुड व गरुड़ जी संवाद में चारों युगों के लिए अलग-अलग मार्ग बताये गये हैं। जो इस प्रकार है।ं सतयुग के लिए तप, त्रेतायुग के लिए यज्ञ, द्वापरयुग के लिए योग वहां कलयुग के लिए केवल भगवान का नाम आधार है। यहां नाम का आशाय ईश्वर अराधना से है।
ईश्वर भजन नाम संकीर्तन से हृदय में अनुराग अंकुरित होता है। भक्त के शरीर में सात्विक भाव का उदय होता है। ईश्वर नाम अनुपम अनिवर्चनीय और उतना ही मधुर है। जिसको पा लेने पर जीवन धन्य हो जाता है। भजन व कीर्तन में वर्णाश्रम का भी नियम नहीं है। इस के लिए देश काल का भी नियम नहीं है। तथा विशेष पवित्रता आदि की आवश्यकता नहीं है। सदा सर्वत्र सभी अवस्थाओं में भगवान नाम उच्चारण वणर््िात है। भजन व कीर्तन भगवान का साकार शब्दोपासना है। ईश्वर नाम उच्चारण आग में गिरने के समान है। आग में गिरने पर वह जल जाता है, चाहे गिरना जाने में हो या अनजाने में ईश्वर का सहज अनुग्रह प्राप्त होता है।
मानव शरीर को दो वर्गों में रख सकते हैं जो इस प्रकार है- प्रथम शरीर जो नश्वर है व द्वितीय आत्मा जो अमर है। आत्मा ईश्वर का अंश है। समर्पित व भक्ति भाव से लिया गया नाम व भजन संकीर्तन आत्मा को ईश्वर में विलीन कराता है, समाहित करता है। हमारे सामने इसके अनकों उदाहरण है। भक्त सूरदास जी व मीरा बाई जी की भजन व संकीर्तन से हम भिज्ञ है।
ईश्वर के भेद को हम जानते हैं। ईश्वर या भगवान साकार या निराकार भी है। साकार में वह विष्णुजी, ब्रह्माजी व शंकरजी हैं। ईश्वर के ये तीनों रूप हमें अन्य धर्मों में भी परिलक्षित है।
ईसाई धर्म में ईश्वर के लिए ष् ळव्क्ष् शब्द है व इस्लाम धर्म में अल्लाह या खुदा कहते हैं। इसकी वैदिक व्याख्या इस प्रकार हैः .
ळ त्र ळमदमतंजवत उत्पत्तिकर्ता अर्थात् सृष्टि रचयिता - ब्रह्मा
व् त्र व्चमतंजवत चलाने वाला अर्थात् पालन हार -विष्णु
क् त्र क्मेजतवलमत विनाशकर्ता अर्थात् संहारकर्ता - महेश
एक विश्लेषण के अनुसार अल्लाह में भी ईश्वर के तीनों रूप परिलक्षित होते हैं जो इस तरह हैं:-
अ - अवतार या जन्मदाता (जन्म प्रदान करने वाला )
ल - पालन हार या लालन पोषण करने वाला
ह - मृत्युदाता या प्राण हरण करने वाला
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि अंग्रेजी के ळव्क् शब्द, इस्लाम के अल्लाह में भी हमारी तीनों उच्च शाक्तियों का समावेश है।
हमारा पुर्नजन्म मृत्यु के समय हमारे संचित संस्कार के अनुसार बनने वाले गुण पर निर्भर करता है। सतगुण की अवस्था में मानव देव योनी में, रजो गुण की अवस्था में मानव योनी में तथा तमो गुण की अवस्था में पशुओं, किट आदि योनियों में जन्म लेता है। कलियुग की अवस्था में तमो गुण की प्रधानता है।
इस पुर्नजन्म की प्रक्रिया से मुक्ती का आधार केवल ईश्वर का नाम है। रामायण, गीता व भागवत के प्रवचनकर्ता या व्याख्याता प्रवचन या व्याख्यान के प्रारम्भ, मध्य व अंत में ईश्वर के नाम की जय बोलवाने के साथ संकीर्तन करते व करवाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए तथा अजामिल कथा से भिज्ञ होकर हम अपने हर प्रिय का नाम चाहे वह प्रिय पशु हो या पु़त्र हो, घर हो ईश्वर के नाम पर उसका नाम रखते हैं व पुकारते हैं।
ईश्वर में समर्पित होते चले जाय इस हेतु हम ईश्वर के नाम का कीर्तन करते हैं। उपरोक्त बातों ने मुझे गायन व भजन संग्रह के लिए उद्वेलित किया।
मैंने इस संकलन को इस आशय से संग्रहित किया है कि इसके पठन व गायन करने वालों को भवसागर से मुक्ति मिल सकेगी। आशा है पुर्नजन्म से मुक्ति पाने हेतु मेरा यह प्रयास इन लोंगो में ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव लायेगा।
अनेक शास्त्रों के रचयिता हमारे गुरु एवं जगद्गुरु श्रद्धेय शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द जी सरस्वती के आशीर्वाद की आकांक्षा के साथ भजन संग्रह परम पूज्य गुरु जी के साथ आप सभी को समर्पित है।

. श्रीमती गायत्री देवी प्रो. रामानंद शर्मा

Bhajan SANGRAH
SHRMATI GAYTRI DEVI SHARMA

Published by
Vaibhav Prakashan
Amin Para, Purani Basti
Raipur, Chhattisgarh  (India)
First Edition : 2015
Price: Rs. 50.00

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