भीख मांगना छोड़कर किसानी

किसानों की शिक्षा - पं. माधवराव सप्रे

रोग प्राय: सभी को होते हैं; चाहे राजा हो चाहे रङ्क, चाहे स्वतंत्र हो चाहे परतंत्र। जो समर्थ हैं उनको हाथ-पैर हिलाने में कोई रोक-टोक नहीं। वे अपनी चिकित्सा की चिंता आप ही कर लेते हैं। इसके लिए वे पहले उपाय-योजना करते हैं। नमूने के ढंग पर उसका प्रयोग करते हैं। प्रयोग करते समय जो कठिनताएं उपस्थित होती हैं उनको सरल करने की युक्तियां ढूंढ ली जाती है। और, अंत में, परिणाम देख कर उसको सार्वजनिक स्वरूप दे दिया जाता है कि अमुक औषध अमुक रोग पर अमुक प्रकार से लाभदायक है। जो बात व्यक्ति की है, वही समष्टि की - देश और राष्ट्र की है। ऐसी ही एक उपाय-योजना का वर्णन इस लेख का विषय है।
डेनमार्क अभी नेपोलियन की टक्करों से संभला न था कि बलाढ्य जर्मनी ने उसके स्लेसविग और हॉलस्टेन नामक परगने छीन लिए। इन परगनों की उपज ऐसी ही है कि हमारे यहाँ गंगा-जमुना के दोआब की। इन परगनों के निकल जाने पर बेचारा डेनिश राष्ट्र क्षीण हो गया। वहाँ के किसान निराश हो गए और भुखमरों की संख्या बढऩे लगी। इस संकट से बचने के लिए राष्ट्र ने अपने जमीन-संबंधी कानून में इतना सुधार कर दिया, लगान इतना घटा दिया और तकाबी देने की ऐसी व्यवस्था कर दी कि लोग आसानी से पड़ती जमीन उठा सकें और भीख मांगना छोड़कर किसानी से पेट भर अन्न पा सकें। किंतु इतना होने पर भी विशेष लाभ न हुआ। खेती करने का यथेष्ट ज्ञान न होने के कारण राजा और प्रजा दोनों के किए हुए प्रयत्नों में उपयुक्त सफलता न हुई। इस कष्ट से बचने के लिए उपाय सोचे जाने लगे। अंत में उन्हें एक उपाय सूझ गया। उसी का अवलम्ब करके भारत की भाँति कृषि प्रधान डेनिश-राज्य अब केवल कृषि की ही बदौलत फल फूल रहा है।
जब धरती का इस्तमरारी ह$क देने और खर्च के लिए धन देने पर भी उस देश की गरीबी दूर न हुई तब खोज करने पर ज्ञात हुआ कि जो $गरीब पेट पालने के लिए खेती करने पर उतारू हुए हैं वे मेहनत तो का$फी करते हैं पर उन्हें कृषि का यथेष्ट ज्ञान नहीं है। इसी से वे भारतीय किसानों की भाँति सिर पीट कर रह जाते हैं और दरिद्रता से अपना पल्ला नहीं छुड़ा सकते। भूखों मर कर जो लोग कृषि के लिए जी तोड़ परिश्रम करने पर भी •ामीन से उपयुक्त बदला नहीं पाते, यदि उनकी दशा का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना है तो भारत के ग्रामों में जाइए। वहाँ इसका सजीव दृश्य आपको देखने को मिलेगा।
इस अज्ञान से पीछा छुड़ाने के लिए डेनमार्क की सरकार ने देहातों में स्थान-स्थान पर ऐसे मदरसे खोले जिनमें किसानों को उनके पेशे की शिक्षा दी जाए। इन मदरसों में शिक्षा पाने वाले सभी अवस्थाओं के लोग होते थे। जवानों की तो बात ही क्या, बुड्ढे भी अध्ययन करने आते थे। उन्हें सिखाया जाता था कि अमुक फसल के लिए •ामीन को अमुक रीति से जोतना चाहिए; अमुक बीज को अमुक ढंग से बोना चाहिए और अमुक खाद देनी चाहिए; यदि फसल में कीड़ा लग जाए तो अमुक प्रकार से उसकी रक्षा करनी चाहिए; दूध देने वाले जानवरों की हि$फा•ात अमुक ढंग से करनी चाहिए; दूध-दही, अनाज, फल और फूल आदि की बिक्री इस ढंग से करनी चाहिए - इत्यादि-इत्यादि। सबसे बढ़कर शिक्षा किसान लोग इस बात की पाते थे कि मिल-जुल कर व्यवसाय कैसे किया जाता है। इन स्कूलों में जबरदस्ती शिक्षा दी जाने लगी; क्योंकि इनमें शिक्षा पाने के लिए जाने की अपेक्षा पेट के लिए दो पैसे कमाने या कोई न कोई व्यवसाय करने वाले लोग, अपना काम छोड़कर, इनमें अपने मन से थोड़े ही जाने लगे थे! राष्ट्र ने रोग को पहचाना और मरीज को जबरदस्ती दवा पिलाई; तब कहीं रोगी की दशा सुधरी। फल इसका यह हुआ कि अब वही क्षुद्र दरिद्र देश कुछ का कुछ हो गया है। इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध धनवान जमींदार ने डेनमार्क में जाकर वहाँ की खेती और शिक्षा का आँखों देखा हाल लिखा है। आपका नाम है एच. राइडर हेगर्ड। आपका मत है कि - डेनमार्क का अदना से अदना किसान, नहीं-नहीं मजदूर भी, पूर्ण स्वतंत्र और निश्ंिचत है। इंग्लैंड जैसा समुन्नत देश अंधे, लूले, लंगड़े अपाहिजों का पेट सरकारी खजाने से भरता है। किंतु यह दशा डेनमार्क जैसे छोटे से देश में नहीं। वाणिज्य-व्यापार में सब से बढ़े-चढ़े जर्मन देश की राजधानी में 50,000 भिखारी (युद्ध से प्रथम) अन्न-व-विहीन घूमते फिरते थे। ग्लासगो के प्रति 12 निवासियों में एक बिना घर-द्वार का है। किंतु इस छोटे से डेनमार्क देश में अपनी छोटी सी कुटिया में स्वावलम्बी, अत्मविश्वासधारी और हट्टे-कट्टे जवान तैयार होते हैं। खेती के (सन 1910 के) विशेष कानून ने कोई पाँच ह•ाार मनुष्यों को, दो वर्ष के भीतर, स्वतंत्र किसान बना दिया है।
अब यदि देखा जाए कि डेनमार्क के (पुराने) अशिक्षित किसानों की अपेक्षा भारत के किसान कितने शिक्षित हैं तो उत्तर शून्य मिलेगा। पढऩा-लिखना तो दूर, वे $फसल बढ़ाना, रोगों से उसे बचाना अथवा उपयुक्त समय में बेचना भी या तो भली-भाँति जानते नहीं और यदि जानते भी हैं तो उसका उपयोग नहीं कर सकते। पढऩे-लिखने में वे निरक्षर भट्टाचार्य हैं। इस अज्ञानता से वे तो दु:ख पाते ही हैं; साथ ही राष्ट्र भी पंगु हो रहा है। पानी बरसने में •ारा भी देर हुई कि बेचारों के पैर उखड़ गए। एक $फसल •ारा सी बिगड़ी कि गाय-बैल बिकने लगे। दिन भर परिश्रम करने वाले - अपने परिश्रम का भरपूर बदला पाने के लिए वास्तविक अधिकारी - इतने क्षीण क्यों हैं ? जो एक दिन दूसरों का पेट भरते थे (और आज भी रूपान्तर से भरते ही हैं) आज वही भूखों क्यों मर रहे हैं ? हम इसके अन्यान्य कारणों पर विचार नहीं करते; सिर्फ यही बतलाते हैं कि इसके प्रधान कारणों में उनका अशिक्षित रहना भी एक बहुत बड़ा कारण है। यदि वे पढऩा-लिखना जाने, यदि वे अपने और जमींदार के संबंध को भली-भाँति समझें, यदि वे कर्•ा लेने और कर्•ा चुकाने के नियमों से परिचित हों, तो उन्हें पद-पद पर उन बाधाओं से त्रस्त न होना पड़े जो जमींदारों, सूदखोर महाजनों, गाँव के प्रभु पटवारियों और क्रूर कर्मचारियों की कृपा से भोगनी पड़ती है। पारस्परिक सहायता के अभाव में बेचारों को न जाने कितना - कभी-कभी तो मूलधन से भी अधिक - ब्याज देना पड़ता है। •ारा सी देर हो जाने पर जमींदार साहब की खुशामद करते-करते प्राण जाते हैं। $फसल तैयार होने पर गाँव का बनिया मनमाने भाव में उन्हें मूँड़ता है। इधर घर में $फा$केकशी की नौबत आती है। $गरीब किसानों की अज्ञानता से यदि कोई लाभ उठाता है तो सूदखोर महाजन, जमींदार और उसके कर्मचारी आदि। उनसे किसानों की रक्षा हो कैसे ? उन्हें पेट भर अन्न मिले क्यों कर ? अपने स्वत्वों से उनका परिचय हो किस ढंग से ?
जब तक किसानों में प्राथमिक शिक्षा का प्रचार न होगा, जब तक उन्हें संसार की सामान्य बातों का ज्ञान न होगा, जब तक वे मिल-जुल कर पारस्परिक सहायता के नियमानुसार अपना व्यवसाय न करने लगेंगे, और जब तक वे अपने अधिकारों से परिचित न हो जाएंगे, तब तक उनकी दु:खनिशा का अंत न होगा। इस आवश्यकता का उनको अभी ज्ञान तक नहीं है, इस कमी को दूर करने की चिंता तो दूर की बात है। इसलिए उनके हृदय में पहले ज्ञान-पिपासा उत्पन्न करना यद्यपि भूपति का काम है; तथापि यदि वहाँ से यह काम अभी न हो सके तो उन लोगों को यह काम अपने हाथ में लेना चाहिए जो स्वराज्य का नक्कारा बजा रहे हैं। जिनके लिए तुम स्वराज्य-प्राप्ति चाहते हो उन्हें स्वराज्य का अर्थ समझने योग्य कर दो। किसानों में ज्ञान-पिपासा के उद्भूत होने पर स्वराज्य-प्राप्ति का प्रश्न सहज ही हल हो जाएगा और सैकड़ों शिक्षितों को, जो इस समय मारे-मारे फिर रहे हैं, पूरा-पूरा काम भी मिल जाएगा। इसलिए गाँव-गाँव में यथावकाश शिक्षा-प्रदान करने के लिए मदरसे खुलने चाहिए। भगवान का भजन करने के समान ही लोगों को विद्यादान करना प्राचीन काल से पुण्यदायक समझा जाता रहा है। उस पुण्य की प्राप्ति का उद्योग हमारे शिक्षित भाइयों को अवश्य करना चाहिए। शहरों में रहकर किसी द$फ्तर में 15-20 रुपए मासिक पर 'बाबू साहबÓ बनने की अपेक्षा देहातों में रहना और अपने करोड़ों देश-भाइयों के सुधार में जीवन व्यतीत कर देना कहीं बढ़कर है। पेट की आग यहां भी, ईमानदारी से काम करने पर, अच्छी तरह बुझ सकती है। यदि आप परमार्थ-मार्ग के मुमुक्षु हों तो स्मरण रहे कि वन में बैठकर समाधि लगाने से जो सुख-प्राप्ति होती है वह जनतारूपी भगवान की सेवा करने से भी हो सकती है। मोक्ष का यह भी उपाय है कि लोगों का उद्धार अज्ञान-पङ्क से किया जाए।
यदि संसार में स्वार्थ ही स्वार्थ का राज्य रहेगा, अपने ही विषयानंद में यदि जिन्दगी बिता दी जाएगी, तो मनुष्य की और विशेषत: भारतीय मानव-समाज की, अपेक्षा क्या रह जाएगी ? अपने किसान भाइयों की शिक्षा के लिए, अपनी जाति के सुधार के लिए, अपने देश के अभ्युदय के लिए और अपने राष्ट्र को ज्ञान-सम्पन्न कर्मयोगी बनाने के लिए हमारे शिक्षित युवकों को उचित है कि वे अपने हृदय-मंदिर के कपाट खोल दें। स्वच्छन्दतापूर्वक सभी लोग ज्ञान-लाभ कर सकें, इसके लिए मुक्तहस्त होकर स्वार्थ का त्याग करें। यदि आवश्यकता हो तो भिक्षा मांग कर उदर-निर्वाह करें और सात्विक त्याग के तत्व पर देहातों में - अशिक्षित जनों में - विद्यादान का महत्कार्य आरंभ कर दें। बिना त्याग के देश संपन्न न होगा, बांधव ज्ञानवान न होंगे और दरिद्रता का दूरीकरण न होगा। इसलिए दूसरों के सुख को ही अपना सुख मानकर, इस उद्योग में - किसानों की शिक्षा में - हाथ लगाना चाहिए, जिससे देश में सुख की सरिताएं बहें और प्रजा सुखी होकर इहलोक तथा परलोक का कर्तव्य पालने में समर्थ हों।

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