महज कंकाल का सा ही अहसास

डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश' - हिन्दी : राजभाषा से विश्वभाषा तक

भाषा किसी भी देश की सांस्कृतिक, बौद्धिक आध्यात्मिक एवं मूल्योन्मुखी उपलब्धियों की अभिव्यक्तियों की सबल संवाहक होती है। ज्ञान अथवा विज्ञान में वह देश कितना ही अग्रणी क्यों न हो किंतु भाषा रूपी प्राण तत्व के अभाव में समूची उपलब्धियाँ महज कंकाल का सा ही अहसास करा सकती है। भाषा की उर्वरता व मुखरता ही मनुष्य अथवा चेतन को जड़ तथा अभिव्यक्तिहीन पशुता से अलग करती है। भाषा के अभाव में जहां वैचारिक संप्रेषण संभव नहीं है वही जन और जीवन की धड़कनों को अभिव्यक्ति देने तथा अपनी अभिव्यक्तियों के माध्यम से उन तक पहुँचने का मार्ग भी असंभव-सा ही प्रतीत होता है। किसी उन्नत राष्ट्र के ज्ञान-विज्ञान का मूलाधार है भाषा। भाषा के अभाव में न ज्ञान का आदान-प्रदान संभव है और न ही ज्ञानोन्मुखी परियोजनाओं के माध्यम से मानव का सर्वांगीण विकास ही।

अभिव्यक्ति का मूलाधार है हिन्दी:
हिन्दी सदियों से ही भारत की राष्ट्रीय अस्मिता तथा जन-जीवन की अभिव्यक्तियों का मूलाधार रही है। हिन्दी, संस्कृतियों के संरक्षण के साथ-साथ मानव के आध्यात्मिक, भौतिक, बौद्धिक तथा समाजिक चिंतन का पर्याय बन कर मास्तिष्क को नव सृृजन के लिए उत्पे्ररित करती रही है। हिन्दी कालांतर से ही साधुओं, संतों, दरवेशों, फकीरों, पर्यटकों एवं जन-सामान्य के मध्य वैचारिक आदान-प्रदान का मूल माध्यम रही है। यह हिन्दी की प्रभविष्णुता, उदारता एवं अतुलनीय सामथ्र्य की पराकाष्ठा ही है कि विपुल शब्द संपदा के साथ-साथ असीमित साहित्य एवं विश्व के अनगिनत शब्दों को आत्मसात कर उसने जहाँ वैश्विक उदारता का परिचय दिया है वहीं अपनी वैज्ञानिकता के लिए समूची भाषाओं में अपना सर्वोपरि स्थान रखती है हिन्दी। हिन्दी का आश्रय लेकर संतों फकीरों ने जहाँ अपने अभीष्ट को प्राप्त किया, वहीं बौद्धिक, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धर्मोपदेशकों ने हिन्दी के माध्यम से अपने विचारों की संजीवनी से टूट चुके मनों को उर्वरता से प्राणप्रतिष्ठित किया तथा संबंधित क्षेत्रों में नवीन चेतना का संचार किया।

यद्यपि राष्ट्र विविधमुखी अभिव्यक्तियों एवं वैचारिक संप्रषेण के लिए अलग-अलग भाषाओं का अनुप्रयोग होता रहा है किंतु राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी ने सभी संस्कृतियों, भाषाओं एवं बोलियों के मध्य सेतु का कार्य किया है। हिन्दी की इस सार्वदेशिकता, सार्वभौमिकता, सर्वप्रियता, सहजता, संप्रेषणीयता व सर्वग्राह्यता आदि गुणों के कारण भारतीय संविधान में 14 सितंबर, 1949 को इसे राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया है। यद्यपि राजभाषा के रूप में लगभग छ: दशकों की यह ऐतिहासिक यात्रा अपेक्षाओं के अनुरूप संतुष्टि के गणित को साकार तो चाहे न कर पाती हो किंतु फिर भी ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में राजभाषा ने इन छ: दशकों में जो नव सृजन के नव आयाम स्पर्श किए हैं वह किसी भी प्रकार के निराशा के क्षितिज को विस्तारित नहीं करते। वैचारिक व सहज प्रयोग की दृष्टि से राष्ट्रभाषा का कद राजभाषा से भौगोलिकता एवं अनुप्रयुक्ता के रूप में अधिक बड़ा है। भाषा के अनुप्रयोग का संबंध हृदय की नैसर्गिक से होता है जिस प्रकार प्रकृति के ऋतु चक्र को हम अपनी अपेक्षाओं के अनुसार नहीं बदल सकते अथवा नहीं ढाल सकते उसी तरह भाषाई प्रवाह भी किसी बाह्य दबाव, हस्तक्षेप, एवं पूर्वाग्रह की आधारभूमि से अपने अभीष्ट अथवा गंतव्य तक नहीं पहुँचाया जा सकता। राष्ट्रभाषा नैसर्गिक रूप से आचार, व्यवहार व अपनत्व की भाषा है जबकि राजभाषा कुछ चयनित राजकर्मियों द्वारा राज-काज के कार्यों को संपादित करने की संवैधानिक भाषा। केवल कार्यालयीन काम-काज में ही दिक्कत क्यों? भाषा एक अबोध बालक के सदृश होती है जिसे यदि स्वच्छंद रूप से कार्य करने की उन्मुक्ता, स्वच्छंदता रहे तो वह प्रसन्न मन से संबंधित कार्य को रूचिपूर्वक संपादित करता है। किंतु-परंतु की नकेल उसकी नैसार्गिकता को बाधित करती है व उन्हीं क्षेत्रों पर उसका ध्यान विशेष रूप से केंद्रित करती है जिनके लिए उसे प्रतिबंधित किया जाता है। राष्ट्रभाषा के रूप में जिस हिन्दी का प्रयोग स्वच्छंद रूप से अधिकांश प्रयोक्ता अपने आचार, व्यवहार व दैनंदिन जीवन में अधिकाधिक करते हों तो उसी हिन्दी का राजभाषा के रूप में प्रयोग करने में फिर हिचक व असमर्थता क्यों? संभवत: बालक की अबोधता के समानांतर ही भाषा का वह स्वरूप जो लिखित अथवा मौखिक रूप से दबावपूर्वक यह अपेक्षा करवाता है कि अमुक कार्य अमुक व्यक्तियों को अनिवार्य रूप से राजभाषा हिन्दी में संपादित करने हैं, तो वही 'किंतुÓ और 'परंतुÓ की बलात प्रवृत्ति कहीं न कहीं उनके नैसर्गिक प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है, जबकि घर से बाजार तथा सबंधों के विस्तार तक भी, कहीं...कभी न कोई शब्दावली आड़े आती है, न भाषा अटपटी लगती है, न वैचारिक संप्रेषण से संदेह उत्पन्न होता है, बल्कि जटिल से जटिल एवं पेचीदे विषय भी सहज-सरल शैली में न केवल अभिव्यक्त किए जाते हैं बल्कि स्त्रोता पूर्णत: उनमें संतुष्टि का भाव भी प्राप्त करता है।

नकारात्मक सोच का परित्याग अपेक्षित
भाषा के इस प्रयोग में साक्षर अथवा निरक्षर होना बहुत महत्व नहीं रखता। निरक्षर व्यक्ति भी पढ़े-लिखे विद्वान, वैज्ञानिक अथवा विचारक की जटिलतम व गंभीर अभिव्यक्तियों को बिना शब्द कोश अथवा परिभाषिक शब्दावली के समझने में पूर्णत: सक्षम होता है। ठीक इसके समानांतर निरक्षर की संपूर्ण गूढ़तम, व्याकरण भाषिक अनुप्रयुक्तियों को बुद्धिजीवी वर्ग को भी समझने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत अथवा परेशानी नहीं होती। चौबीस घंटों के दिन-रात के चक्र में अधिकांशत: राष्ट्रभाषा में अपनी अभिव्यक्ति को स्वर देने वाले व्यक्ति को भी कार्यालयीन काम-काज हिन्दी में करते हुए चेतना के स्तर पर कई प्रकार की दिक्कतों का सामना आखिर क्यों करना पड़ता है? यदि गइराई से गौर किया जाए तो राज-काज की भाषा में साक्षर व्यक्ति ही साक्षर व्यक्ति से लिखित संवाद करने में संकोच करता है अथवा वैचारिक संप्रेषण में उसे शब्दावली के अनुप्रयोग, उसकी क्लिष्टता तथा संपे्रषणहीनता आदि कारणों से हिचक महसूस होती है, यह गंभीर चिंतन का विषय है। निरक्षर व्यक्ति संकोचरहित हो अत्यंत बुद्धिजीवी वर्ग से अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति कर सकता है जबकि दोनों साक्षर और परमबुद्धिजीवी एक दूसरे को लिखित भाषा में पत्र-व्यवहार अथवा विचार संप्रेषण में पूर्णत: सक्षम नहीं पाते। इस कारण की भीतरी पड़ताल नितांत आवश्यक है। कार्यालय, परिसर अथवा परिसीमाओं से बाहर भी भाषा का प्रयोक्ता वही व्यक्ति होता है जो परिवार व समग्र संसार से अपनी भाषिक संरचना के आधार पर अभिव्यक्ति को स्वर देता है। वहाँ वह अपरिचित विषय, अपरिचित संस्कृति व भाषा क्षेत्र से अपरिचिता की स्थिति में भी कार्य चला लेता है किंतु अधिकांश: विज्ञ होने पर भी अपने सरकारी काम-काज में वह उतने विश्वास से अभिव्यक्ति की क्षमता नहीं रखता अथवा नहीं रखना चाहता। इस बात की भी गहराई से पड़ताल करने की आवश्यकता है। संभवत: इसमें कहीं न कहीं हमारी नकारात्मक सोच एवं उपेक्षित वृत्ति ही चरितार्थ होती है।
कोई भी जनसामान्य प्रबुद्ध व्यक्ति अथवा विशिष्ट राजनेता जनसमुदाय से वैचारिक संप्रेषण अथवा सामूहिक संबोधन के रूप में अपने जेबों में संबंधित समुदाय, संस्कृति अथवा बोली-भाषा से संबंधित शब्दकोशों व शब्दावलियों अथवा पारिभाषिक शब्दावलियों के संग्रह के साथ नहीं रखता। यदि बुद्धिजीवी वर्ग अपनी नैसर्गिक बौद्धिक क्षमता, जिसका उपयोग वह घरेलू आहार-व्यवहार के संपादन में सुरुचिपूर्वक करता है, का उपयोग निष्ठापूर्वक राजभाषा के रूप में उसी आत्मीयता से करे तो संभवत: 50 प्रतिशत जटिलताएं, क्तिष्टताएं अबोधगम्यता तथा संप्रेषणहीनता की बात स्वत: ही हल हो जाए।
हिन्दी का कार्य राष्ट्रीय महत्व का कार्य

ऐसा भी नहीं है कि छ: दशकों की प्रगतिशील यात्रा के बावजूद राजभाषा के प्रयोग तथा प्रगति की दृष्टि से उन्नति न की हो। आज विज्ञान के जटिलतम क्षेत्र, चाहे वह समुद्रविज्ञान से संबंधित हो, भू-विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा व आयुर्विज्ञान अथवा अन्याय धातुकर्म, खनन, विमानन आदि से संबंधित क्यों न हों, सभी जगह राजभाषा हिन्दी ने अपने अस्तित्व के परचम लहराने प्रारंभ किए हैं। जिन्हें उपलब्धियों के आकाश में राजभाषा रूपी निराशा के घने बादल यत्र-तत्र छाए दिखाई देते हैं वे निश्चित रूप से राजभाषा की नैसर्गिकता से न तो गहराई से जुड़े हुए हैं अथवा न उस प्रगति को उन्होंने अत्यंत से निकटता से देखा ही है। वैज्ञानिकों, उच्चतर शिक्षा तथा कारण वे नितांत तकनीकी अथवा वैज्ञानिक विषयों को मौलिक रूप से हिन्दी अथवा भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त करने में उस रूप में सक्षम नहीं हो पाते किंतु उन्हें हृदय से यह भी स्वीकार करना होगा कि हिन्दी का कार्य करना एक सबल राष्ट्र के निर्माण एवं राष्ट्रीयता महत्व का कार्य है।

आत्मीय जुड़ाव से भाषिक समृद्धि
आत्मीय जुड़ाव हमारी भाषिक संरचना को भी समग्रता व पूर्णता की ओर ले जा सकता है। यह माना जा सकता है कि किसी नवोदित व्यक्ति के लिए नए क्षेत्र में प्रयुक्त हो रही पारिभाषिक शब्दाबली अत्यंत क्लिष्ट हो किंतु यह क्लिष्टता जीवन पर्यंत बनी रहे, तो यह हमारी बौद्धिक प्रोन्नति तथा वैचारिक समृद्धि की परिचायक नहीं। प्राय: संपूर्ण क्लिष्टताएं मानवनिर्मित ही होती है। मानव निर्मित वस्तुओं के समाधान की कुंजी भी मानव के पास ही रहती है। हमारी भाषिक अभिव्यक्ति व चिंतन की दिशा ही हमें श्रेष्ठतर अथवा निम्रतर बनाती है। यदि हम अपनी बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग शासकीय सेवाओं से इतर अपनी राष्ट्रभाषा तथा अपनी आंचलिक भाषा-बोलियों के माध्यम से श्रव्य अथवा दृश्य माध्यमों के साथ-साथ लिखित माध्यमों से भी अपने समाज व परिवेश के लिए करें तो इससे जहाँ भाषा का प्रायोगिक पक्ष प्रबल व सुदृढ़ होगा, वहीं संबंधित व्यक्ति के बौद्धिक चिंतन के प्रति समाज नत भी होगा और उसकी उपलब्धियों से गौरवान्वित भी।

प्रयोग व व्यवहार ही प्रगति का प्रांरभिक सोपान
भाषा अनुप्रयोग व व्यवहार की सीढ़ी चढ़ कर ही अपने उद्देश्य के चरम तक पहुंचती है। यदि राजभाषा के रूप में हम सदैव ऐतिहासिक भूलों का रोना रोते हुए उन्हीं पर अपने दुर्लभ चिंतन की इतिश्री कर दें तो यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं होगा। बल्कि ऐतिहासिक भूलों की पुनरावृति के बजाय चिह्नित भूलों का एक-एक कर समाधान किए जाने तथा भावी सुधारों को कार्यरूप दिए जाने की अतीव आवश्कता है।
इसके पीछे दृढ़ शक्ति एवं भाषाई स्वाभिमान का होना जरूरी है। यदि यह सब मौजूद हो तो राजभाषा के व्यावहारिक कार्यान्वयन में किसी भी प्रकार की कोई असविधा नहीं है। जहाँ तक शब्दों की क्लिष्टता का प्रश्न ह उसे शब्द के हिन्दी पर्याय के कंठस्थ अथवा आत्मसात हो जाने तक लिप्यंतरित कर मूल रूप में लिखा जा सकता है। केवल एक शब्द अथवा कतिपय शब्दों के लिए संपूर्ण वाक्य, कथ्य, विषय एवं प्रसंग को ही अवरुद्ध कर देना परिपक्व सोच का कार्य नहीं है। आज सरकारी क्षेत्रों में मानविकी से लेकर वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों तक पर्याप्त कार्य संपन्न हो रहे हैं। यह बात दीगर है कि जनसमुदाय की पहुँच तक कुछ ही कार्य प्रकाश में आ रहा है जबकि अधिकांश संस्थानों की प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों एवं विभागीय अल्मारियों में औपचारिकता के रूप में मौजूद है। इस अर्जित, संचित लोकोपयोगी ज्ञान को भाषा-बोलियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना हम बुद्धिजीवियों का कार्य है।

विश्व भाषा हिन्दी
वह सुखद है कि आज हिन्दी अपनी संरचनात्मकता, मनोवैज्ञानिकता, प्रभाविष्णुता सर्वग्राह्यता तथा विपुल शब्द सामथ्र्य तथा अत्यधिक वैज्ञानिकता के कारण समूचे राष्ट्र में ही नहीं अपतिु विश्व भाषा के रूप में उभर कर सामने आ रही है। जो भाषा राष्ट्रीय क्षितिज के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर अभिव्यक्ति, आचरण और व्यवहार के रूप में प्रयुक्त हो कर विश्व भाषा के रूप में मंचस्थ होगी, निश्चित रूप से उस भाषा की गरिमा और महिमा, सार्वदेशिकता व समृद्धि स्वत: सिद्ध है। संख्यात्मक एवं गुणात्मक दृष्टि से यह बात प्रत्येक भारतीय के आत्म संतोष के साथ-साथ आत्म गौरव की अनुभूति अवश्य करा सकती है किंतु व्यावहारिक दृष्टि से अनेक प्रेरक विचार बिंदुओं को भी अंतरमन से प्रश्न चिह्निच करती है। संपूर्ण विश्व की अभिव्यक्ति का पर्याय बनने वाली भाषा हिन्दी क्या पूर्णत: अपने ही राष्ट्र में व्यावहारिक दृष्टि से अनुप्रयोग की सफलतम सीढिय़ां चढ़ पाई है? आज छ: दशकों की अनवरत, चिंतन, प्रयोगधर्मी भाषिक अनुप्रयुक्ति के बाद भी हिन्दी अपने राष्ट्रीय व शासकीय अभिव्यक्ति को पूर्णत: नैसार्गिकता के साथ स्वर देने का कार्य क्या कर सकी है? आज भी लगातार शब्दावली की समस्या, ज्ञान-विज्ञान के विषयों को मौलिक रूप से हिन्दी में लिखने की समर्थता आदि अन्यान्य कारणों से अपने देश में ही संपूर्ण समुदायों द्वारा मौलिक रूप से क्या हो पा रहा है? विश्व भाषा का दर्जा प्राप्त करने पर इस प्रकार के अनेक व्यावहारिक विचार बिंदु हमारे मस्तिष्क में अवश्य कौंधेंगे जिनके लिए निश्चित रूप में चिंतन के स्तर पर हमें भाषाई स्वाभिमान के लिए राजभाषा के अनुप्रयोग के क्षेत्र में बहुतत जुटाया ही होगा।

अनुवाद पाट सकता है वैचारिक दूरियों को
भारतीय सिनेमा, पत्रकारिता, धर्म, आध्यात्म, दर्शन एवं जन संचार माध्यमों से विश्व के कोने-कोने तक पहुँची हुई हिन्दी भाषा ने निश्चित रूप से विश्व के अधिसंख्य समुदाय के चिंतन के साथ-साथ अभिव्यक्ति को आंदोलित, प्रभावित व विस्तारित है। आज स्वनामधन्य हिन्दी साहित्यकारों के साहित्य के अनुवादों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का डंंका अनेक देशों में बजा है। यह हिन्दी की उदारचेता प्रकृति का ही द्योतक है कि विश्व के प्रतिनिधि व पे्रेरक साहितयकारों के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद हिन्दी में संपन्न हुआ है जिससे संवदेनात्मक स्तर पर भाषागत व वैचारिक दूरियां भी पटी हैं तथा दो संस्कृतियों में सन्निकटता भी आई है। विश्व भाषा के मंच पर आसीन व समादृत होने पर निश्चत रूप से हिन्दी भाषा का बहुआयामी स्वर प्रतिध्वनित होगा। विश्व के अनेक उन देशों, जहाँ का साहित्य, संस्कृति अथवा समाज अनुवाद के माध्यम से अभी तक हिन्दी संसार तक नहीं पहुंच पाया था, संबंधित अनुवाद कार्य के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण तथा वैचारिक आदान प्रदान में अधिक सुदृढ़ता व मजबूती सुनिश्चित होगी।

विश्व के विश्वविद्यालयों में हिन्दी
आज विश्व के सवा सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन एवं प्रगामी शोध कार्य इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी अकादमिक स्तर पर भी बुद्धिजीवियों के चिंतन को परिमार्जित करने का प्रमुख माध्यम रही है। किसी भी भाषा के जीवित रहने के अनेक कारणों में एक कारण राजसत्ता का प्राश्रय हो सकता है जबकि दूसरा प्रबल, मौलिक और सक्षम कारण होता है उसकी भाषिक संपन्नता व उसमें प्रखर होने की संवदेनशील हृदयों की अतुलनीय चाह। हिन्दी चूँकि संख्या व प्रसार की दृष्टि से विश्व की सर्वोत्तम भाषाओं में से एक है, अत: संवदेनशील हृदयों की सदैव ही यह प्रबल दृष्टि से विश्व की सर्वाेत्तम भाषाओं में से एक है, अत: संवेदनशील हृदयों की सदैव ही यह प्रबल चाह होती है कि उनकी बात, उनका चिंतन उनके ज्ञान का बहुमुखी नेतृत्व भाषा के माध्यम से अधिकाधिक लोगों व मानव समुदायों तक पहुँचे। जो भाषा अधिसंख्य जनसमुदाय द्वारा हृदय से स्वीकार कर ली जाती है वह भाषा दीर्घकाल तक जीवंतता प्राप्त करती है। हिन्दी की समृद्ध साहितय परंपरा, संप्रेषणीयता, प्रबुद्ध व मर्म को छू लेने वाली प्रभविष्णुता तथा वैज्ञानिकता को देख कर विश्व के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन की भावी संभावनाएं बहुगुणित हो रही है।

पारस्परिक शोध कार्य में वूद्धि को
कितना अच्छा हो भारतीय विद्वानों, लेखकों, चिंतकों के कार्यों का मूल्यांकन भारत के साथ-साथ विदेशी विश्वविद्यालयों में हो तथा विदेशी हिन्दी सेवियों के श्रेष्ठ साहित्य का अनुसंधान तथा मूल्यांकन भारत के विश्वविद्यालयों में। जब हिन्दी समूचे विश्व की भाषा है तो हिन्दी का उद्देश्य हिन्दी में सृजित भारतीय व भारतेतर साहित्यकारों के साहित्य का परिचय विश्व के देशों में तथा विश्व के देशों के श्रेष्ठ साहित्य का परिचय एवं पारसपरिक अनुवाद अलग-अलग देशों मे संपन्न हो तथा लोकप्रिय पुस्तकों का आदान-प्रदान साहित्य के माध्यम से देशों के मध्य चलता रहे ताकि सूचना प्रौद्योगिकी, उदारीकरण तथा निजीकरण के इस दौर में हिन्दी का यह वैश्विक स्वरूप आनंदोन्मुख के साथ-साथ रोजगारोन्मुख भी हो तथा हिन्दी चिंतन की समृद्धि के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वृत्ति प्रदान करने के रूप में भी उभर कर सामने आए।

शोध कार्यों में उदार व निष्पक्ष दृष्टिकोण अपेक्षित
विश्वविद्यालय शोध की संरचना में भी वैश्विकता के समानांतर उदार दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। केवल पद अथवा कद से वरिष्ठतम, जो भले ही रचनात्मक दृष्टि से कमतर अथवा निष्कृष्ट हों, साहित्यकारों की रचनाओं के प्रकाशन, मूल्यांकन अथवा अनुवाद से निकल कर जनसामान्य, जीवन एवं जमीन से जुड़े हुए मानव मूल्यों से ओत-प्रोत रचनाधर्मियों, जो किसी भी रूप में रचना के अतिरिक्त शोध निर्देशकों को उपकृत करने की स्थिति में न हों, को भी अपने शोध-निर्देशन का विषय बनाकर अपनी उर्वर एवं निष्पक्ष सोच का परिचय दिया जा सकता है। यदि विश्वविद्यालयीन स्तर पर ऊँचे आदर्शों व मूल्यों का संरक्षण हो, सत्साहित्य का समय पर मूल्यांकन हो तो हिन्दी की अभिव्यक्ति व संप्रेषण की वैश्विक क्षमता आने वाले समय में स्वत: ही प्रगति के चरम की ओर अग्रसर होती रहेगी।

पठन-पाठन की दृष्टि से हिन्दी के वैश्विक स्वरूप को विस्तारित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालयीन शोधात्मक छात्र-वृत्ति के आधार पर भारतीय छात्रों को विदेश तथा विदेशी छात्रों को भारत में अनुसंधान तथा अनुवाद कार्यों के लिए प्रेरित व प्रतिनियुक्त किया जा सकता है। इसी तरह से विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों में मानद आचार्य (विजिटिंग प्रोफेसर) के रूप में राष्ट्र के उन ऊर्जावान, ओजस्वी व मेधावी हिन्दी विद्वानों को प्रतिनियुक्त किया जाए जिनका सृजनात्मक योगदान उन देशों में भारतीय चिंतन, भारतीय मूल्यादर्शों एवं यहांकी संस्कृति की अमिट छाप छोडऩे में सक्षम हो।

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों में प्रत्येक प्रदेश के श्रेष्ठ हिन्दी विद्वानों का चयन
हिन्दी की समृद्धि, संपन्नता एवं वैश्वि संप्रेषण हेतु समय-समय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों में भी मितव्यविता बरत कर प्रत्येक वर्ष उन हिन्दी सेवियों को, जिनका समग्र जीवन में जिन्हें कभी भी ऐसा स्वर्णिम अवसर न मिला हो, को इस हेतु नामित किया जाए। हिन्दी साधकों, चिंतकों, विचारकों, श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों एवं साहित्यकारों की उर्वर धरती है। प्रत्येक सम्मेलन में राष्ट्र के प्रत्येक प्रदेश अथवा चयनित प्रदेशों के श्रेष्ठ साहित्यकारों का प्रतिनिधित्व हो जिनमें समर्पित साहित्यकारों के साथ-साथ नवोदितों को भी विश्व मंच पर विद्वानों के संसर्ग का अवसर प्रदान किया जाए। प्राय: सभी मौलिक विद्वानों की उपस्थिति के बाद ही पूर्व में प्रतिभागिता कर चुके विद्वानों के चयन में पुनरावृत्ति हो। विश्वस्तर पर हिन्दी की समृद्धि के लिए बार-बार भेजे द्मद्मजाने वाले वही, कतिपय चेेहरे, राष्ट्रीय छवि को विश्व मंच पर उत्कर्णित करने हेतु पर्याप्त नहीं। यदि शासकीय स्तर पर गुणवत्ता का यह मानदंड नैसर्गिक तरीके से, बिना किसी भेदभाव व तोड़-जोड़ के, किया जाए तो हिन्दी के साथ-साथ हिन्दी के लिए अपना सर्वस्व समार्पित करने वाले मौलिक साहित्यकारों के सम्मान में भी वृद्धि होगी जो समग्रत: हिन्दी की वैश्विक समृद्धि का आधार बनेगा।

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