महिनत म मोती मिलय (छत्तीसगढ़ी गीत) पीसी लाल यादव

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा : कन्हैया
प्रथम संस्करण : 2015
मूल्य : 000.00 रुपये
कॉपी राइट : लेखकाधीन
महिनत म मोती मिलय
(छत्तीसगढ़ी गीत)
पीसी लाल यादव

ISBN-

l
mahinat ma moti milay

pisi lal yadav

Published by
Vaibhav Prakashan
Amin Para, Purani Basti
Raipur, Chhattisgarh  (India)
First Edition : 2015
Price: Rs. 000.00

समरपन

स्व. श्रीमती सोनकुंवर यादव

दया-मया के फुलवारी
कोरा जेखर सरग दुवारी
महिनत के मोती बगरइस
मोर मयारुक महतारी

'दया-मया के संसार सिरजैया कविताÓ

दस-पन्द्रह बरिस के बीच छत्तिसगढ़ी भाषा के कवि मन के गजब अकन कविता किताब छप के आय हे। ओमा के कतका किताब ह कविता के मान-गउन राखिन अउ कतका नइ राखिन-येला पढ़ैया विद्वान मन देखत हें। छत्तिसगढ़ी कविता के किताब निकलना चाही, पन कवि मन ल जादा लकर-लकर नइ करना चाही। थोरिक धीरज धरके कविता-किताब ल छपवाँय। अपन भाव अउ अपन बिचार म अपन जुग के समस्या ल सपोटत चलँय। तभे कविता ह आगू रेंगही। नइ तो अपनेच जघा म कदमताल करत रहि जाही। अभी कइ ठन कविता संग्रह ल कदमताल करैया लगथे।
भाई पीसीलाल यादव ह छत्तीसगढ़ी म लिखैया जुन्ना कवि आय। एखर कइ ठन कविता किताब छपइ म आ गे हे। अब समय ये हे, के यादव जी के कविता के सहीं-सहीं मूल्यांकन करे जाय- दूध अउ पानी के मिलवट सही नइ, पन दूध अउ पानी ल अलग-अलग करके देखे जाय। पन करही कोन? छत्तीसगढ़ी कविता के आलोचक-समीक्षक के तो अकाल परे हे। समीक्षक अइसे होवयँ, जउन कविता ल वोकर 'गतिशीलÓ अवस्था म देख अउ समझ सकयँ। कविता ल कहूँ तरिया के माढ़े-पानी समझ के वोकर ऊपर बिचार करे जाय। त कइसे पता चलही, के छत्तीसगढ़ी कविता ह कतका आगू रेंगिस।
भाई पीसीलील के किताब के भूमिका लिखे बर जम्मो कविता ल दस-पन्द्रह बैठकी म मन लगाके पढ़ लेवँ। मयँ ह एखर समीक्षा नइ करत हवँ। ये संग्रह मं जउन बात मोला मिलिस, उही बात ले 'भूमिकाÓ म लाय के उदिम करत हवँ।
किताब के पांडुलिपि ल पढ़े के बाद मोला लागिस, के भाई पीसीलाल ह बड़ भावुक कवि आय। वोकर कविता ल कोनो एक बिचार धारा मं नइ बाँधे जा सके। अइसे कोनो कवि नइ हे, जेमा थोकन भावुकता नइ होय। कोनो म जादा भावुकता होथे, कोनो म कमती। भावुकता समके उल्होवय नइ, उप्पर कोती चढ़े नइ, बढ़े नइ। वोला उप्पर कोती चढ़े बर 'बुद्धिÓ के 'निसैनीÓ घलो चाही। कविता ह हिरदे म जनमथे अउ बुद्धि तक के यात्रा करथे। तभे कविता ह अपन कवितापन के पहिचान ला बनाथे।
पीसीलाल जी के कविता के नदिया ले कई ठन धारा फूटे हे। कोनो जघा के एक धारा हा दूसर धारा ल काटे ल धरथे। यादव जी के पहली धारा आय-मध्यकालीन भाव-धारा। मध्यकाल के भक्तिधारा के कवि मन मं 'उपदेशपरकताÓ के गुन बहुत मिलथे। वो समय वइसनेच कविता के जरुरत रहिस हे। वो समय के समाज म उपदेश ल सुने के धीरज रहिस हे। वो कवि मन के कविता अतका प्रभावशाली रहिस, के वो धारा के प्रभाव आजो ले कविता म मिल जाथे। कहूँ-कहूँ उपदेश ह सलाह म घलो बदल जाथे- 'तयँ अइसे कर, अइसे मत करÓ। अइसने मुँहरन सलाह कविता म कइ जघा देखे ल मिलथे।
'बेरा के कर पहिचान रे,
बेरा के बड़े बलवान रे संगी।Ó
'रिस के आगी म जिनगी झँवा झन।
जिनगी अमोल हे, बिरथा गँवा झन।Ó
एमा जउन बात ल कवि कहना चाहत हे, वो बात ल भक्तिकाल के कवि मन कइ-कइ बेर कहि डारे हें। ये भक्तिकाल के कवि मन के प्रभाव आय। येकरे कारन मँय येला मध्यकाल ले प्रभावित धारा मानथौं। कभू-कभू इही उपदेश न 'भाग्यवादÓ ह घलो लपटाय आ जाथे। 'भाग्यवादÓ ह हमर देश के पुराना 'दर्शनÓ आय। 'कर्मवादीÓ अउ 'भाग्यवादÓ के झगरा आजो चलत रहिथे। भाई पीसीलील ह दूनो बिरोधी बिचार ल अपन समर्थन देवत हे, तइसे लगथे।
'तोरे कस कतको हें जग मा,
जेखर भाग मा सुख नइ हे।Ó
अइसने किसम ले 'कर्मवादÓ के कविता भरपूर हे। भलुक, कर्मवाद के कविता जादा हे। ये कविता मन कवि के पक्ष ल निर्धारित करथें। जइसे-
'महिनत न मोती मिले।
जीवन बर जोती मिले।Ó
'जिनगी Ó ये सागर, थहि ले मनखे।
बूंद के मोती ल, गहि ले मनखे।
भक्तिकाल के प्रभाव म कहुँ-कहुँ कविता मं 'भजनपनाÓ घलो आ गे हे। भजन ह मध्यकाल के भक्ति धारा के कवि मन के कविता-शैली रहिस। उही शैली म वोमन अपन जुग के जीवन अउ दर्शन ल भाई पीसीलाल ह उठाय के उदिम करे हे। 'मालिकÓ अउ 'दासÓ के नाता-गोता उही सामंती काल के दर्शन आय। अइसने बानी के कविता के उदाहरण रखत हेें-
'मन के हर मालिक अँधियारी।
अंतस बगरा दे उजियारी।Ó
'तोर तन के नइ हे भरोसा रे
तोला देही एक दिन धोखा रे।
राम नाम सुमर के संगी-
कर ले जिनगी के जोखा रे।Ó
भाई पीसीलाल ह 'दूध मोंगराÓ सांस्कृतिक मंच के गीतकार आय। सांस्कृतिक मंच बर गीत लिखना अलग बात हे, अउ कविता के रचना करना अलग बात। दूनो काम के बीच 'मानस के तियारीÓ ह बदल जाथे। कवि ल बदलेच ल परथे। पन सांस्कृतिक मंच के प्रभाव ह कविता उप्पर परभे करथे- अइसे मोर मानना हे। सांस्कृतिक मंच के रचना ह सुर-सुरावट ऊपर निर्भर रहिथे, पन कविता ह भाव अउ बिचार ऊपर ठौर पाथे। ये संग्रह म कुछ कविता ऊपर सांस्कृतिक-मंच के प्रभाव मिलथे। जइसे-
'होई रे होई रे बिहन्ती के बेरा।
चिरई-चिरगुन छोड़े, बिहन्ती के बेरा।Ó
संसार ल सिरजे म मया-पिरित के बड़ हाथ हे। मया-पिरित नइ होतिस, त ये दुनिया नइ होतिस। मया-पिरित वाला कविता ह भाई पीसीलाल के माई चिन्हारी आय। इही वोकर असल पहिचान आय। ये संग्रह म मया-पिरित ल विषय बना के कई ठन कविता लिखे गे हे। अइसे लगथे, ये संग्रह के उद्देश्य मया-दुलार वाला संसार सिरजना हे। मया ह दुनिया ल सिरजिस। अब दुनिया ल चाही, के वोहा मया ल सिरजे। आज चारों कोती लड़ई झगरा, मार-काट माते हे। येला खतम करे बर मया वाला मयारू संसार के रचना करना जरूरी हे। भाई पीसीलाल हा उही बुता ल उठाय हे।
'मया-पिरित के बरे डोरी ल, झन उलार हे।
मनखेपन ल मनखे, अपन कोरा म दुलार रे।Ó
'संगी, मया के गीत गा।
सरी जग ल जीत जा।Ó
मया-प्रेम मा कवि अइसे बूड़े हे, के उसर-पुसर के वोकरे गीत गाथे। वोकर धियान ह शब्द अउ कविता-डाँड़ के दुहराव ऊपर चिटको नइ हे। जइसे-
'मया म संगी मान मिलय,
मया म सरी जहान मिलय,
मनखे तो मनखे का कहिबे-
मया म भगवान मिलय।Ó
ये डाँड़ मन 'मया के रीतÓ कविता के आय। इही ह जस के तस 'मया म भगवान मिलयÓ कविता म घलो मिलथे। ये आय मया-प्रेम के रस मं बूड़ के कविता लिखइ। पन येहा कविता के कमजोरी घलो आय।
भाई पीसीलाल के कविता ह मनखे के तरफदारी करैया कविता आय। मनखे रहही, त कविता ह घलो फरही-फूलही। कवि हा मनखे ल देव-धामी ले घलो महान माने हे-
'देव ला पूजे के पहली तैं
मनखे के तो पूजा कर।
सुवारथ के सूजी ल मूरख
बरपेली झन सूजा कर।Ó
ये संग्रह म नवा धारा के कविता घलो हे। अपन जुग के समस्या ऊपर चिंतन करे गे हे। येहा अच्छा संकेत आय। हर समाज ह दू भाग मं बँटाय हे। एक ह धन के बल म ललियावत हे। अउ एक ह हर जिनिस बर ललात हे। समाज के जउन भाग ह ललात हे, तेखर पुछंतर कोनो नइ हे। कवि के जिम्मेवारी हे, के अइसन मन के पुछैया बने। वोकर मन के सुख-दुख ल लिखे। जेमन पर के कमई म फुदरत हें, तेखर पोल-पट्टी खोलयँ। भाई पीसीलाल के कइ ठन कविता आसा जगाथे-
'करोड़पति बने बर मनखे
रेंगत हें अरकट्टा।Ó
'झोलिया सकेले झपट के रे।
जतके तयँ हा दबबे, ततके दुनिया ह दबाही।
तोर बाँटा ल झटकÓ के बइरी पोगरी वो खाही।Ó
भाई पीसीलाल ह कवि के संगे-संग शिक्षक घलो आय। वोकर कामे आय शिक्षा देना। वोकर काम-धंधा के प्रभाव वोकर कविता मं देखे ल मिलथे। वोहा सीख-सिखावन के बात ल कविता मं करथे। वोकर एक धारा शैक्षिक कविता के निकलथे। शैक्षिक-कविता ह समाज ल रद्दा देखैया कविता आय। जइसे- 'बिरछा ल काट झनÓ अउ 'तैं पानी बचा रेÓ। 'पानी ल विषय बना के गजब लाम कविता लिखे गे हे। एमा मोर कहना हे, के अइसन शैक्षिक-कविता के अलग संग्रह होना चाही। काबर के, अइसन कविता ह लइकन मन ल संस्कार दे के काम करथे।
छत्तिसगढ़ी भाखा बड़ गुरतुर भाखा आय। एमा लिखे साहित्य ह अपन 'गुरतुरपनÓ के कारन हिरदे ल छू लेथे। छत्तिसगढ़ी भाखा आज अपन कोख म कई ठन भाखा-बोली के शब्द ल धर ले हे। येहा छत्तिसगढ़ी के उदारता आय। भाई पीसीलाल जी ये दू ठन कविता-डाँड़ ह पूरा संग्रह ऊपर भारी पड़ते थे-
'जेन भाखा उदार होथे,
उहीच् ह गुदार होथे।Ó
ये संग्रह के छंद-विधान, शिल्प अउ शैली ऊपर समीक्षक मन अपन कलम चलाही। मयँ तो बस अतके कहि सकत हों, के अइसन उदार भाखा म गुदार कविता लिखैया भाई पीसीलाल यादव ल वोकर महिनत के पाछू वोकर 'बिरोÓ मिले- मोर इही कामना हे।
-डॉ.जीवन यदु
गीतिका, दाऊ चौरा, खैरागढ़

अंतस के गोठ

मनखे के मन झिरिया कस होथे जेन ह झिर-सिर, झिर-सिर झिरत रहिथे। इली ल गुनिक मन गीत कहिथे। गीत हमर जीवन-मरन के संगवारी ये, गीत दया-मया के फुलवारी ये, गीत जिनगी जिये के तियारी ये, गीत भूखाय 'मनÓ के बियारी ये। गीत कहाँ नई हे? माने गीत सब ठउर म समाय हे। प्रकृति के कन-कन ह गीत गाथे ओला समझे के जरुरत हे। मनखे के मन तो गीत के ढोली ये छाबा ये बस ओखर अवना ल उलाय के उदिम होना चाही।
'महिनत म मोती मिलयÓ अइसने एक ठन उदिम आय। मनखे समाज म रहिथे त समाज के सुख-दुख, गोठ-बात सब ओखर अपन हो जथे। जहाँ अपन के बोध होथे तहाँ मया ओगरथे अउ गीत-कविता बनके बगर जथे अंजोर बरोबर। अइसने महिनत घलो आय जेन ह जिनगी ल सुधराथे। महिनत बिना जिनगी अकारथ हे। महिनत के बखान सबे करथे। महिनती मनखे ल सबे सहिंराथे। महिनती मनखेच ह बिरो पाथे। अउ सबले अगुवाथे। एखरे सेती कहिथे घलो-
महिनत म मोती मिलय, मिलय सरग के सुख,
बिन महिनत जिननी जस, सुक्खा ढुडग़ा रूख।।
ये संग्रह ह मया अउ महिनत के भाव ल सकेल के गीत रुप म सिरजाय के लइकुसहा उदिम आय। मया अउ महिनत के सीख में अपन महतारी ले पायेंव। दुख-पीरा ले जुझे के सीख ददा ले सीखेंव। आज ऊँखर अड़बड़-सुरता आथे। जिनगी के रद्दा म ऊँखर मया-दुलार अगासदिया कस अंजोर करत हे। तभे तो मया अउ महिनत के भाव सरलग झरत हे। जिहाँ मया के मान, उँहे सुँहे भगवान...
मैं हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के पोठ कवि डॉ. जीवन यदु के बड़ आभारी हवँ, जेनहव बड़ सहज भाव ले ये संग्रह के भूमिका लिख के अपन पिरित के पलोंदी दिस। अब 'महिनत म मोती मिलयÓ आप मन ल सुपरित हे।

दिनांक-25.9.2015 -पीसीलाल यादव

अनुक्रम

क्रं. कविता पृ.क्रं.
1. किरिया हे हिन्दुस्तान के 13
2. छत्तीसगढ़ महान 14
3. मोर छत्तीसगढ़ महतारी 16
4. जांगर के गीत 18
5. मनखे ह भगवान हो जथे 20
6. सुख बाँटे म सुघराथे जिनगी 22
7. मया के रीत 23
8. मया में भगवान मिलय 25
9. ओगरे पसीना के धारी 27
10. मन के मीत कभू झन छूटे 28
11. बारी में तरकारी के मेला 30
12. कइसे के मानन सगा, रे बादर 32
13. बरखा थिरागे 34
14. मन ले मन के मेल 35
15. करम हे मनखे के चिन्हारी 36
16. दुख के रोना ल झन रो 38
17. आगे काँपत सुरुज 40
18. जिनगी ये सागर 42
19. मया के बाट 44
20. अनजरी के आँच 45
21. आगे सावन महिना 46
22. बाँहा बल के आस कर 48
23. महिनत ले हे मान 49
24. बेरा के कर पहिचान 50
25. संगी मया के गीत गा 52
26. मनखे तोर जिनगी म 53
27. झोलिया सकेले झपट के 54
28. डहर छेंकइया बिरो नई पावय 56
29. अक्कल 58
30. पिरित कब लुकाय हे? 59
31. बाती म अंजोर हे 61
32. दीया बरे 62
33. बिरो कइसे पाही? 63
34. बिरछा ल झन काट 65
35. मनमोहना माँघ फागुनवा 67
36. अपन अंतस दीया बार 68
37. अंतस बगरा दे उजियारी 69
38. हरियर होगे परान 70
39. भाखा 71
40. कर चिन्हारी तैं संगवारी 73
41. कर जिनगी के जोखा 74
42. बेरा ल झन कर कुबेरा 75
43. बरस न बादर पानी 76
44. तैं पानी बचा ले रे 79
45. मया जिनगी के सार 81
46. जागे रे जागे भईया 82
47. बेटी बिदा 83
48. बने ल बने मिलथे 85
49. झिल्ली के झाँझ-झोला 86
50. मनखे-मनखे एक समान 87
51. पहुना पधारे हे दुवार 88
52. मनखे तोर जिनगी म 90
53. मनखेपन 91
54. धरम-करम म लगगे बट्टा 93
55. संगी आवव रे 94
56. बिहन्ती के बेरा 96
57. पानी बचाओ पानी रे 97
58. जिहाँ जांगर तिहाँ जिनगी 99
59. आखर अंजोर 100
60. पानी 101

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