यहीं के हो कर रह गए

ओम प्रकाश सेठी
कौन जाए दिल्ली की गलियाँ छोड़कर
दिल्ली का नाम दिल्ली कैसे पड़ा - इस बारे में कई मत हैं, एक मत के अनुसार मध्य काल में वर्तमान महरौली के आस-पास एक शहर होता था जिसका नाम था ढिल्ली जिसका उच्चारण बिगड़ते-बिगड़ते दिल्ली हो गया। एक अन्य मत के अनुसार ऐसा भी कहा जाता है कि आज की दिल्ली जिस जगह पर मौजूद है, वह जगह वही है जहां पर ईसा से लगभग 1450 वर्ष पूर्व पांडवों द्वारा बसाई गई राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। लोग कहते हैं कि दिल्ली सात बार उजड़ी और सात बार बसी। दिल्ली का पहला रूप उस समय के शासकों के लिए बहुत अच्छा था। केवल एक चीज की दिक्कत थी। यमुना नदी 18 किलोमीटर की दूरी पर थी। बाद में बसने वाली दिल्ली धीरे-धीरे यमुना के नजदीक बसनी शुरू हुई। शहजहाँ द्वारा बसाई दिल्ली यानी पुरानी दिल्ली तो एकदम यमुना नदी के किनारे ही बसाई गई थी।
पहली दिल्ली सन् 1302 के आस-पास मौजूदा सिरी फोर्ट के पास 'सिरीÓ के नाम से अलाऊद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित की गई। अलाऊद्दीन ने 1303 में अपनी इस राजधानी में एक शानदार हौज़ (टैंक) बनवाया था जिससे उस वक्त की दिल्ली के लिए पीने के पानी की सप्लाई की जाती थी इसी वजह से उस जगह का नाम हौज़ खास पड़ा। दूसरी दिल्ली यानि 'तुगलकाबादÓ की स्थापना 1321 से 1325 के बीच गियासुद्दीन तुगलक द्वारा की गई। परन्तु पानी की कमी के कारण यह दिल्ली शीघ्र ही नष्ट हो गई। उसके उत्तराधिकारी मोहम्मद शाह तुगलक ने 1325 और 1351 के बीच तीसरी दिल्ली बसाई जिसे 'जहाँपनाहÓ का नाम दिया गया। यह दिल्ली कुतुब मीनार के नजदीक थी। मोहम्मद शाह तुगलक के बेटे फिरोजशाह तुगलक ने सन् 1351 और 1351 और 1388 के बीच फिरोजाबाद नाम से चौथी दिल्ली की स्थापना की। यह दिल्ली वर्तमान फिरोजशाह कोटला मैदान के नजदीक थी। उसके पश्चात् 1530 ई. में द्वितीय मुगल सम्राट हुमायूँ ने यमुना नदी के किनारे पांचवी दिल्ली बसाई जिसे 'दिनपनाहÓ नाम दिया गया। उस समय का दिनपनाह आज पुराने किले के नाम से प्रचलित है। हुमायँू के पड़पोते व पांचवे मुगल बादशाह शाहजहाँ ने सन् 1638 और 1649 के बीच शाहजहांनाबाद नाम से छठी दिल्ली का निर्माण किया था। इसे आजकल हम पुरानी दिल्ली के नाम से जानते हैं। इसे ङ्खड्डद्यद्यद्गस्र ष्टद्बह्ल4 भी कहते हैं, क्योंकि इसके चारों ओर एक ऊँची और मजबूत दीवार थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ब्रिटिश काल में हिंदुस्तान की राजधानी कलकत्ता थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सर्वप्रथम अपने कदम कलकत्ता की सरजमीं पर ही रखे थे। अत: इंडिया कंपनी की स्थापना से यानी सन्1600 से 1911 तक अर्थात् लगभग 300 साल तक भारत की राजधानी कलकत्ता ही रही। सन् 1911 में ब्रिटिश शासकों ने राजधानी कलकत्ता से नई दिल्ली में शिफ्ट करने की सोची। उस समय के वाइसराय किंग जार्ज पंचम ने 25 दिसम्बर 19911 को यह निर्णय लिया कि भारत की राजधानी कलकत्ता न होकर नई दिल्ली होगी। यह सातवीं दिल्ली हैं। नई दिल्ली का निर्माण सन् 1911 से 1931 तक 21 वर्षों में हुआ। एक अनुमान के अनुसार नई दिल्ली के निर्माण पर 10 मिलियन पाउण्ड्स खर्च हुए थे। 1911 में जब अँग्रेजों ने नई दिल्ली को देश की राजधानी बनाने का फैसला किया था तो उन्होंने पुरानी दिल्ली को नहीं छोड़ा। नई दिल्ली को बसाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी ली लार्ड हार्डिंग ने। उसके बाद लार्ड चेम्सफोर्ड व लार्ड रीडिंग के काल में नई दिल्ली की योजना पर अमल शुरू हुआ। 1926 में लार्ड इर्विन के काल में यह योजना सम्पन्न हुई। बेकर ने उस वक्त नई दिल्ली 70 हजार लोगों के लिए डिजाइन की थी। नई दिल्ली का निर्माण करने वाले शिल्पकार का नाम लुटियन था। इसलिए कुछ लोग आज भी नई दिल्ली को लुटियन दिल्ली कहते हैं। उस वक्त नई दिल्ली का क्षेत्र मात्र 10 वर्ग कि.मी. था। नई दिल्ली के निर्माण के लिए 30 हजार मजदूरों को लगाया गया था। तत्कालीन वाससराय के लिए वायसराय भवन बनाया गया जिसे आज हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं। यह भवन 330 एकड़ में बनाया गया है। इसमें 340 कमरे हैं। इस भवन के उत्तर और दक्षिण में दो प्रशासनिक भवन भी बनाए गए थे जिन्हें हम आज नार्थ ब्लाक और साऊथ ब्लाक के नाम से पुकारते हैं। कनॉट प्लेस पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली को जोड़ता है। कनॉट प्लेस सन् 1931 में बना था। उस वक्त यह एक ऐसा मार्किट था जिसमें पार्किंग की भी व्यवस्था की गई थी।
नई दिल्ली बसाने में उस वक्त के पाँच गाँवों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ये गाँव थे पिलंजी गाँव - जहाँ पर आज का सरोजिनी नगर बसा हुआ है। जब यह कालोनी सन् 1949 से 1953 के बीच बसी थी उस वक्त इसका नाम था विनय नगर। यह एक बाबुओं की कालोनी है तभी तो इस कालोनी में एक बाबू मार्किट भी है। दूसरा गाँव था अलीपुर गाँव - जहाँ पर आज का सफदरजंग हवाई अड्डा बना हुआ है। तीसरा गाँव था खैरपुर - जहाँ 1936 में लोदी गार्डन बनाया गया था। चौथा गाँव था अलीगंज - जहाँ पर आज की लोदी कालोनी बसी हुई है। पाँचवाँ गाँव था जुड़बाग - जहाँ पर आज का आलीशान व सबसे मंहगा इलाका जोरबाग बसा हुआ है। इन पाँचों गाँवों में रहने वाले ब्राह्मणों, बनियों, मुसलमानों, हरिजनों, कुम्हारों व गूजरों से यह गाँव तत्कालीन डिप्टी कमिशनर यंग ने खाली करवाए थे और मुआवजे के तौर पर भोगल पहाड़ी के इर्द-गिर्द कोटला मुबारकपुर और उसके आसपास की जमीनों पर प्लाट काट कर इन गांवों के विस्थापित लोगों को पट्टे पर दिए गए थे। उन्हीं यंग साहब के नाम पर एक बस्ती का नाम यंगपुर पड़ा। यह यंगपुर, भोगल व लाजपतनगर के नजदीक बसा हुआ है।
आज दिल्ली में जगह नहीं रही। अत: दिल्ली के चारों ओर मेट्रोपोलिटन सिटीज का फैलाव बढ़ता जा रहा है। इन मेट्रोज सिटीज में सम्मिलित हैं गुडग़ांव, फरीदाबाद, नौएडा, ग्रेटर-नौएडा, गाजियाबाद, सोनीपत, पानीपत आदि आदि। महाभारत काल में पांडवों ने कौरवों से पांच गाँव माँगे थे परन्तु उन्होंने बिना महाभारत युद्ध लड़े एक इंच जमीन भी नहीं दी थी। ये पाँच गाँव थे - स्वर्णपत / पर्णपत / कर्णपत / बागपत व इन्द्रप्रस्थ। उस समय का इन्द्रप्रस्थ ही आज का इन्दप्रस्थ (दिल्ली) है। दिल्ली कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। दिल्ली का शाब्दिक अर्थ है दिल्+ली यानी जिसने आपका और हमारा दिल ले लिया। हमें अपनी दिल्ली पर नाज़ है क्योंकि दिल्ली दिल है हिंदुस्तान का।
1947 में विभाजन के उपरांत पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के लिए दिल्ली के चारों ओर कुछ कालोनियों का निर्माण किया गया। इनमें कर्बला, कालकाजी, लाजपतनगर, रमेश नगर, पटेल नगर तथा राजेन्द्र नगर की पुनर्वास कालोनियां सम्मिलित हैं। कई लाख पंजाबी लोग दिल्ली में आए और यहीं के हो कर रहे गए। अँग्रेजों ने नई दिल्ली केवल 70,000 लोगों के लिए बनाई थी परन्तु आज इसमें कई लाख लोग रह रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार आज दिल्ली में एक वर्ग किलोमीटर में 57,000 लोग रहते हैं। दिल्ली जो कभी एक विशाल गाँव सा लगता था आज एक केंद्र पवर्तित क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है। यह परिवर्तन आज चिंता पैदा करता है। आगे-आगे देखिए होता है क्या?
दीवारों वाली दिल्ली का इतिहास चाँदनी चौक से शुरू हो कर खारी बावली से होता हुआ सदर बाजार तक ही खत्म हो जाता है। दीवारों के बाहर एक दिल्ली है जिसके इर्द-गिर्द बड़े-बड़े टोल ब्रिज और हाई-वे, पॉश कालोनियां देख कर विश्वास ही नहीं होता कि हम दिल्ली में हैं या सिंगापुर में हैं। लगता है कि एक दिल्ली में कई दिल्लियां हैं। दिल्ली में जो शख्स एक बार आ गया फिर जाने का नाम नहीं लेता। दिल्ली सभी का दिल मोह लेती है। उर्दू के मशहूर शायर जोक ने ठीक ही कहा था ''कौन जाए दिल्ली की गलियाँ छोड़करÓÓ

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