राजभाषा

संस्कृत के पश्चात हिन्दी भाषा को ही श्रेष्ठता मिली

महर्षि दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, विनोबा भावे आदि उच्च विचारकों ने अपने विचारों को व्यक्त करने का साधन हिंदी भाषा को ही बनाया। जिसके परिणाम स्वरुप कई जन जागरण हुए। इतिहास इसका प्रमाण है।
'हिन्दी मय है देश हमारा,
इस पर निर्भर विकास हमारा।
पावन धरती को बोली हिन्दी
यह तो भारत माँ की बिंदी।Ó
हिन्दी हिंदुस्तान की जान है। आन, बान एवं पहचान है। इसमें देश का गौरव समाप्त है। खड़ी बोली हिंदी का प्रारंभ, शौरे सैने अपभ्रंश से हुआ। किंतु वास्तविक प्रारं्र 100 ई से माना जाता है। हिंदी के पौने दस सौ वर्षों को विद्वानों के द्वारा तीन भागों में बांटा गया।

Tags: 

विडम्बना देखिये

जगदम्बी प्रसाद यादव
अंग्रेजी के खतरे बहुत हैं
स्वतंत्रता के अड़सठ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। पर क्या हम इस गम्भीर तथ्य के प्रति सचेत हैं कि राष्ट्र बिना अपनी स्वतंत्र भाषा के गूँगा बना हुआ है और विश्व में इस दिशा में अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बना पाया है। अंग्रेजों के जाने की स्वर्ण तो मनायी, पर यह न सोचा कि अंग्रेजी और अंग्रेजियत परतंत्रता के काल से भी अधिक सुदृढ़ होकर भारत और भारतीय भाषाओं पर राज कर रही है। आखिर यह कैसी विडम्बना है?

Tags: 

Subscribe to RSS - राजभाषा