राजेन्द्र मिश्र

गुरु का मुक्का

प्रथा आधुनिक है। जब किसी से मिलो तो उसे अपने बारे में अनुमान लगाने का कष्ट मत दो। अपना नाम-धाम बताओ और सीधे काम में लग जाओ। व्यावहारिक दृष्टि से यह अच्छी आदत है लेकिन जीवन क्या व्यावहारिकता का पर्याय है?

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जिंदगी के बीचों-बीच रची-गढ़ी कविताएँ

- राजेन्द्र मिश्र
मुख्यतः सार्वजनिक थीमों में चरितार्थ इन कविताओं में जगत-गति और आत्म-गति के बीच एक गहरा उद्वेेलन है। ऐसे उद्वेलन को लेकर या तो विलाप किया जा सकता है या फिर व्यंग्य। दीपक ने व्यंग्य किया है, लेकिन उनकी कविता हिन्दी में लिखी गई उन सैकड़ों व्यंग्य कविताओं से बिल्कुल अलग है, जो मनुष्य को इकहरा और उसकी भाषा को पूरी तरह सपाट बना देती है। ध्यान और धैर्य से देखें तो कवि जैसे अमिधा में व्यंजना को मुक्त करने के लिए बार-बार एक अवकाष गढ़ रहा होता है। उसका ‘’बच्चो, मैंने बेहतर समय देखा है !‘’ अपनी परिणति में मनुष्य के इतिहास का सबसे ट्रैजिक समय बना दिया गया होता है।

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