विडम्बना देखिये

जगदम्बी प्रसाद यादव
अंग्रेजी के खतरे बहुत हैं
स्वतंत्रता के अड़सठ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। पर क्या हम इस गम्भीर तथ्य के प्रति सचेत हैं कि राष्ट्र बिना अपनी स्वतंत्र भाषा के गूँगा बना हुआ है और विश्व में इस दिशा में अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बना पाया है। अंग्रेजों के जाने की स्वर्ण तो मनायी, पर यह न सोचा कि अंग्रेजी और अंग्रेजियत परतंत्रता के काल से भी अधिक सुदृढ़ होकर भारत और भारतीय भाषाओं पर राज कर रही है। आखिर यह कैसी विडम्बना है?
इतिहास गवाह है कि इंग्लैण्ड व रूस में भी कभी विदेशी भाषा 'फ्रैंचÓ का आधिपत्य था। किन्तु समय ने पलटा खाया और इन दोनों देशों ने क्रमश: अपनी भाषा अंग्रेजी और रूसी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया तो दोनों राष्ट्र महान हुए। विडम्बना देखिये भारत में ऐतिहासिक घटना का संगम स्वतंत्रता स्वर्ण जयन्ती वर्ष और भारत के महान सपूत सुभाष चन्द्र की जन्मशती भी बीत पर क्या विदेशी और परतंत्रता की भाषा अंग्रेजी से पिण्ड छुड़ाने के लिए वास्तव में हम कुछ ठोस कर पाये हैं? स्वतंत्रता संग्राम का एक स्वप्न था-अपना देश, अपनी भाषा। लेकिन इस संकल्पना को पूरी तरह से मूर्त रूप देने का संकल्प क्या हम पूरा कर पाए हैं। मंथन का एक समय और आ रहा है- राजभाषा हिन्दी की घोषणा का स्वर्ण जयन्ती वर्ष। क्या अब भी नहीं सोचना चाहिए कि कैसे भारत को इण्डिया और अंग्रेजी के तमगे से मुक्त करें। आज हमामरा संघर्ष विदेशियों से नहीं वरन् विदेशी भाषा की ज्यादती से है। यह समय अपनी मानसिकता को बदलने का है।
हिन्दी की समस्या ही आज देश की समस्या है। इसे समझ लिया जाये तो हर समस्या के समाधान का मार्ग प्रशस्त हो जाये। यह कटु सत्य है कि स्वतंत्रता के साथ स्वतंत्र भाषा को भी देश ने अपनाया होता तो समाज का एक बड़ा हिस्सा आज रोटी, कपड़ा, और रोजी को न तरसता। न ही समाज दो भागों में बँटता-एक, छोटा सा वर्ग तो लंदन का जीवन जीये और बाकी समाज अभावों में रहने को बाध्य। आज हिन्दी की बात में सभी भारतीय भाषाओं की समस्या है। आज भाषाओं का दारोमदार कम्प्यूटर पर है। जिस भाषा ने कम्प्यूटर को नहीं अपनाया वह भाषा आगे नही बढ़ेगी।
विचारणीय प्रश्न है कि अंग्रेजी आज भी राज क्यों कर रही है? हिन्दी या भारतीय भाषाएँ राजकाज की भाषा क्यों नहीं बन पा रही है?
संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में हिन्दी को राजभाषा बनाने की घोषणा की, पर घोषणा करते समय इस बात को बिसरा दिया कि कोई भी भाषा प्रयोग करने से समूद्ध होती है। अगर धीरे-धीरे हिन्दी को अंग्रेजी के स्थान पर लाना था, तो क्या हिन्दी का प्रयोग वास्तव में नहीं बढ़ाया जाना चाहिए था? लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी के लिए भारत में ऐसा ही किया था, जिसके परिणामस्वरूप विदेशी भाषा अंग्रेजी का प्रयोग और सम्मान बढ़ता चला गया जबकि तब अंग्रेजी को अनिवार्य भी नहीं किया गया था। भला बिना नदी-तालाब में कूदे कोई तैरना क्या किताब पढ़कर सीख सकता है।
ऐसा भी नहीं है कि हिन्दी को राजभाषा बनाकर उसके लिए उपाय कुछ नहीं किये गये। होने को तो राजभाषा अधिनियम बने, वार्षिक हिन्दी प्रगामी कार्यक्रम बना, हिन्दी प्रशिक्षण और कार्यशालाएँ चलायी जाने लगीं, केन्द्रीय हिन्दी समिति बनी, संसदीय राजभाषा कार्यान्वयन समितियाँ बनीं और हर वर्ष 14 सितम्बर 'हिन्दी दिवसÓ के रूप में बनाया जाने लगा। पर आज तक हिन्दी का राष्ट्रभाषा- राजभाषा के रूप में पूरा स्थिरीकरण नहीं हो पाया है।
आज सत्ता, साधन, सुविधा पर अंग्रेजी का ही वर्चस्व स्थापित हो गया है। हर आधुनिक प्रगति में अंग्रेजी ही समृद्ध बनती जा रही है। देशी-विदेशी मदद आज किसी भाषा को मिल रही है तो वह है मात्र अंग्रेजी। यह कैसा मायाजाल है कि शिक्षा, परीक्षा, दीक्षा, नौकरी, प्रोन्नति के साथ रोजी-रोटी की भाषा आज भी अंग्रेजी है। आज कोई आदमी यदि अपनी संतान के भविष्य के विषय में सोचता है तो उसे इस बात के लिए बाध्य होना पड़ता है कि वह उसे अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाये। ऐसा क्यों लगता है कि कहीं उनका हिन्दी प्रेम बच्चे का भविष्य अंधकारमय न बना दे? यह एक गम्भीर प्रश्न है। हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं को लेकर दिल्ली में चल रहा विश्व का सबसे बड़ा धरना अब नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यह संघर्ष इसी बात को लेकर तो चल रहा है कि लोक सेवा परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त किया जाये, पर अंग्रेजी अडिग है। क्या अंग्रेजी की जड़ेें इस देश में इतनी गहरी हो गयी हैं कि कोई उसे हिला नहीं पा रहा है।
भाषा मात्र विचार-संप्रेषण का साधन ही नहीं, वरन् भाव भी है, विकास का माध्यम है, देश का इतिहास है, और निस्संदेह भूगोल भी है, क्योंकि उसमें देश की मिट्टी की गंध-सुगंध भी रहती है। अंग्रेजी भाषा अंग्रेजीयत के रूप में भारतीय संस्कृति को गहराई से विभाजित कर रही है जो भारतीय अस्मिता को धूमिल करते हुए भारतीयों में अपनी ही भाषा के प्रति हीन भावना भरने में सफल हो रही है। इसने मु_ी भर भारतीयों को काला अंग्रेज तो बना दिया जो आज ताना-बाना लेकर अंग्रेजी की सुरक्षा में तरह-तरह की कसरत कर रहें हैं। पर वे चाहे जितना जोर लगा लें कभी गोरे अंग्रेज या अंग्रेज नहीं बन सकते, रहेंगे भारतीय ही। और, इसी सच को हम भूलने लगे हैं। यहूदी जाति विश्व में सबसे ध्यानी, शिक्षित, प्रगतिशील रही, पर वक्त की चपेट में उसे जब अपनी अस्मिता समाप्त होती सी दिखी तो इजरायल बना और उन्होंने दो हजार वर्ष से भूली बिसरी 'हिबूÓ भाषा को अपनाया। आज भारतीय मूल के लोग विदेशों में अपने को, अपनी संस्कृति और अस्मिता से अलग-अलग पाने लगे हैं और जहाँ-तहाँ अपनी संतान को सांस्कृतिक शिक्षा देने का प्रयास करने लगे हैं। बहुत कुछ संभव है कि वैसा दिन भारत में भी देखने को मिले कि जब भारत के बड़े लोग अपने ही लोगों से कटे-छँटे दिखाई देने लगे।
हिन्दी को राजभाषा बनाने की घोषणा हुए पचास वर्ष होने को हैं। यानि एक और स्वर्ण जयन्ती। सरकार और भारत की जनता को इस ठोस संकल्प के साथ इसे मनाना चाहिए कि भारत सरकार जो प्रयास हिन्दी के प्रयोग, प्रसार, प्रचार के लिए धन, जन, समय लगाकर कर रही, वह प्रयास सार्थक हो, वास्तविक हो। सरकार ने जिम्मेदारी ली है तो उसके बड़े अधिकारी पहले स्वयं अंग्रेजी की मानसिकता का त्याग कर अपने अन्य अधिकारियों के प्रेरणा-स्रोत बनें। मन में अगर वे यह संकल्प लेते हैं कि देश को स्वतंत्र वाणी देनी है, राष्ट्र का गूँगापन मिटाना है तो हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं का मार्ग स्वत: साफ होगा। उन्हें जनसाधारण के प्रति सजग होना होगा। जब तक शासन हिन्दी व भारतीय भाषाओं में नहीं होगा, साधारण जनता को शासन और विकास में भागीदारी नहीं मिलेगी। भला विकास के एक रुपए में वृहत्तर समाज को मात्र 15 पैसे क्यों मिले, पूर्ण रुपया मिले तब तो विकास होगा।
ब्रिटिश काल में जब अंग्रेज आई.सी.एस. बनकर भारत आते थे तो वे इंग्लैण्ड ही सें हिन्दी का कामचलाऊ ज्ञान लेकर आते थे। आज भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने वाले नौकरी के बाद क्यों शासकीय (हिन्दी भाषा सीखे) भाषा (हिन्दी) सीखें, क्यों न वे अपनी भाषा समझकर भर्ती होने के साथ ही इसे सीखें। भारत में तीर्थाटन करने वाले व्यापारी, धर्मप्रचारक भी हिन्दी का प्रशिक्षण प्राप्त किये बिना स्वत: व्यवहार से हिन्दी सीख जाते हैं। कहावत भी है-'शहर सिखावे कोतवालीÓ।
चीनी परिवार की भाषा के बाद दूसरी विश्व की बड़ी भाषा हिन्दी ही है। इसका आकलन आंकड़े से नहीं समझदारी से किया जाए तो उदाहरण हैं- रामायण और महाभारत के धारावाहिक को दूरदर्शन पर भारत के कोने-कोने के लोगों ने प्रेम श्रद्धा से देखा-समझा। यही कारण है कि भारत के सन्तों ने अपना देशव्यापी उपदेश हिन्दी या सधुक्कड़ी भाषा में दिया। उन्होंने तो अनजाने ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा का स्वरूप दे दिया था। हिन्दी अपनी आन्तरिक ऊर्जा से अपनी सरलता, सुबोधता, समन्वय की भावना से आज तक प्रगति करती जा रही है विश्व में अपना प्रचार-प्रसार भी पा रही है। आज विश्व हिन्दी सम्मेलन भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में हो रहा है। विश्व के सौ से अधिक संस्थान हिन्दी पढ़ाने तथा इसके शोध-कार्य में लगे हैं, दर्जनों देश अपने राष्ट्रीय प्रसारण, समाचार प्रसारण हिन्दी और भारतीय भाषाओं में भी करते हैं। यह सिद्ध है कि शासक हो या शासित, धर्म प्रचारक हो या व्यापारी समाज सुधाकर हो या नेतागण उन्हें जब जन-सम्पर्क करना पड़ता है तो हिन्दी या भारतीय भाषाओं का ही सहारा लेना पड़ता है।
भारत अनुसंधान के क्षेत्र में क्यों पिछड़ा है? कारण बस एक ही है-सोच और मौलिक विचार अपनी ही भाषा में प्रभावी हो सकते हैं। अनुवाद की भाषा में नहीं। अध्ययन काल का आधा जीवन तो अंग्रेजी सीखने में लग जाता है। आज अंग्रेजी का जुआ अंग्रेज नहीं ब्रिटिश साम्राज्य में रहे अरबों लोग ढो रहें हैं। जुआ उतारकर जब फेंका जायेगा तो साम्राज्यवादी भाषा की बोलती बन्द हो जायेगी।
भारत को चाहिए कि वह राजभाषा हिन्दी की घोषणा की स्वर्ण जयन्ती कि वह राजभाषा हिन्दी की घोषणा की स्वर्ण जयन्ती वर्ष भर मनाये और साथ में यह संकल्प ले कि अब बहुत हो चुका परतंत्रता और विदेशी भाषा को अपनाया जाना। जब खण्डित आयरलैण्ड अपनी भूली भाषा को अपना अस्तित्व बचाने के लिए राष्ट्रभाषा बना सकाता है तो भारत क्यों नहीं बना सकता।
गुलामी के दौर में जब अंग्रेज भारतीयों को गुलाम होने का अहसास कराते थे तो भारतीय आजादी के संग्राम में कूद पड़ते थे और तभी आजाद भी हुए। आज विदेशों में जब पूछा जाता है कि क्या भारत में ऐसी कोई भाषा नहीं जिसमें वे अपनी सरकार का काम-काज चला सकें। आखिर कब तक ऐसी बातें सुननी पड़ेेंगी। अब तो हिन्दी और भारतीय भाषा केन्द्र सरकार की भाषा बने यह संकल्प लेने का समय आ गया है। स्वर्ण जयन्ती वर्ष से अच्छा अवसर इसके लिए और भला क्या हो सकता है?
हम स्मरण करें स्वतंत्रता के प्रेरणा स्रोत शहीदों को और संतों को, भारतीय मनीषियों को जो भारत को स्वतंत्र विचार ही नहीं स्वतंत्र वाणी भी देना चाहते थे। हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को उनको अपना स्थान दिलाने का वह संकल्प कब पूरा होगा-यह जिम्मेदारी तो हर भारतीय की है और जो प्रबुद्ध हैं सरकारी पदों पर आसीन हैं, उनकी अधिक है। उन्हें एक ही तो संकल्प लेना है अंग्रेजी की मानसिकता से पिण्ड छुड़ावें और हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में अपनी निष्ठा कायम करें-वह दिन भारत का सुनहरा दिन होगा जब स्वतंत्र भाषा राजकाज की भाषा होगी और विदेशी एवं गुलामी की भाषा से त्राण मिलेगा। महामहिम राष्ट्रपति जी ने संसदीय राजभाषा समिति के चार खण्ड प्रतिवेदनों पर जो आदेश दिये है उनका सही में अगर पालन-कार्यान्वयन हो तो राजभाषा का मार्ग प्रशस्त होगा।
सभी क्षेत्रों में कुलबुलाहट है और हिन्दी प्रयोग के प्रति सभी सचेत होकर प्रयास भी प्रारम्भ कर रहे हैं।

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