विधा के विकास के प्रति अपनी चिन्ता

डाॅ. छन्दा बैनर्जी
हिन्दी समालोचना के प्रणेता
पं. माधवराव सपे्र
पं. माधवराव सप्रे जी का युग भारतीय नवजागरण के ऐतिहासिक कालखण्ड का गौरवशाली युग था। सप्रे जी ने 1900 ई. में छत्तीसगढ़ मित्र के माध्यम से पत्रकारिता के क्षेत्र में अल्प समय में ही राष्ट्रीय पहचान बनाई। छत्तीसगढ़ मित्र तत्कालीन हिन्दी पत्रकारिता में विस्तृत
समालोचना प्रकाशित करने वाली पहली पत्रिका थी। हिन्दी समालोचना की शुरूआत हिन्दी गद्य के प्रादुर्भाव के साथ हुआ। हिन्दी साहित्य में विधिवत समालोचनाओं का सूत्रपात यद्यपि हरिशचन्द्र युग से हुआ माना जाता है परन्तु हिन्दी समालोचना को सुव्यवस्थित रूप से स्थापित करने का श्रेय पं. माधवराव सप्रे जी को जाता है। सप्रे जी हिन्दी साहित्य की सही दिशा में समृद्धि चाहते थे और उसके लिए उनके अनुसार सही कसौटी श्समालोचना ही थी। उनका यह मानना था कि समालोचना साहित्य का प्राण है इससे श्रेष्ठ साहित्य सृजन को बल मिलता है। सप्रे जी छत्तीसगढ़ मित्र के माध्यम से निरन्तर समालोचना सम्बन्धी लेख लिखते रहे। उनका मानना था कि - सही समालोचना से लेखकों को भी सही दिशा मिलती है। इस प्रकार उन्होंने हिन्दी समालोचना के राजपथ का मार्ग प्रशस्त किया।
सप्रे जी की समालोचना पद्धति में सूक्ष्म और विशद दृष्टिकोण का समावेश होता था। अपने इस दृष्टिकोण से सम्बन्धित नीति का स्पष्टीकरण उन्होंनेेे छत्तीसगढ़ मित्र के प्रथम अंक के सम्पादकीय में लिखा था - आजकल भाषा में बहुत-सा कूड़ा करकट जमा हो रहा है वह न होने पावंे इसलिए प्रकाशित ग्रन्थों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा
समालोचना भी करें। इससे स्पष्ट होता है कि सप्रे जी उत्तम ग्रन्थों की आलोचना द्वारा हिन्दी साहित्य को प्रतिष्ठापित करना चाहते थे। यही कारण है कि तत्कालीन स्थापित लेखकगण जैसे-श्रीधर पाठकए मिश्र बन्धु पदमसिंह शर्मा आदि अपनी रचनायें समालोचना के लिए सप्रे जी को भेजा करते थे।
समालोचना छत्तीसगढ़ मित्र की अत्यन्त महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस पत्र ने हिन्दी समालोचना के क्षेत्र में कई सफल नवीन प्रयोग किये। यही कारण है कि पं. माधवराव सप्रे जी को हिन्दी समालोचना का प्रणेता कहा गया है। पं. श्रीधर पाठक की कविता उजड़-ग्राम पर पहली समालोचनात्मक टिप्पणी सप्रे जी ने ही की थी। व्याकरणाचार्य पं. कामता प्रसाद गुरू ने कहा था कि - हिन्दी में समालोचना का प्रारम्भ और प्रचार छत्तीसगढ़ मित्र ने ही किया। समालोचना के सम्बन्ध में सपे्र जी की दृष्टि अत्यन्त सूक्ष्म थी। समालोचना को परिभाषित करते हुए उन्होंने लिखा है - ... पहिले समालोचक और समालोचना के विषय में कुछ थोड़ा सा कह देना हमें आवश्यक जान पड़ता है। ‘समालोचक’ शब्द का अर्थ यद्यपि बहुत अच्छा है तथापि साधारणतः कोई लोग उससे बुरा ही अर्थ लेते हैं। कहते हैं कि किसी के छिद्र ढूंढना और समालोचना करना एक बराबर है। .... चाहे जैसा हो, कोई भला कहे या बुरा जो काम हाथ में लिया, उसको बुद्धि के अनुसार ठीक-ठाक कर देना ही समालोचक का कार्य है। इस पर से कोई ऐसा न समझे कि
समालोचक की कृति में कोई त्रुटि ही नहीं रहती। समालोचक भी एक मनुष्य है और मनुष्य से प्रमाद हो जाना स्वभाविक है। ... सर्वथा निर्दोषी एक परमात्मा है ..... परन्तु समालोचक के काम की परीक्षा इस दृष्टि से कभी न होनी चाहिए। (जौहरी से तुलना करते हुए) समालोचक भी साहित्य के रत्नों (ग्रन्थों) की परीक्षा करते-करते दूषित पुस्तकों की निन्दा और सतुल्य पुस्तकों की प्रशंसा करे तो क्या वह छिद्रान्वेषण के पाप का भागी हो सकता है ?
सप्रे जी छत्तीसगढ़ मित्र के माध्यम से आधुनिक समालोचना विधा को स्थापित कर उसे पूर्णता प्रदान करना चाहते थे। हिन्दी समालोचना में उनके प्रदेय पर स्व. श्री प्यारेलाल गुप्त जी ने लिखा है - हिन्दी भाषा और उसमें लिखा गया साहित्य सर्वथा दोष रहित हो इसी उद्देश्य को लेकर सप्रे जी ने सबसे पहले पुस्तकों की समालोचना करने की पद्धति हिन्दी संसार में चलाई थी। हिन्दी में समालोचना विधा को सुगठित करने एवं समालोचना की गुण-दोष पद्धति को
विकसित करने का श्रेय सप्रे जी को ही जाता हैं। उन्होंने काशी-नागरी प्रचारिणी सभा से अपील की थी कि सभा के सदस्य गण कुछ ऐसा प्रबन्ध करें कि हिन्दी भाषा उत्तम और आवश्यक विषयों के ग्रन्थों से शीघ्र अलंकृत हो जायें। हिन्दी के विकास के लिए सप्रे जी ने समालोचक सभा की स्थापना पर विशेष जोर दिया। इसका विस्तृत वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि - इस समालोचक सभा में ऐसे-ऐसे विद्वानों का समावेश होना चाहिए जो एक या दो या उससे अधिक विषयों को अच्छी तरह जानते हों। जिसे जो विषय अच्छी तरह आता होए वह उसी विषय के ग्रन्थ की आलोचना करें। यह आलोचना एक पृथक मासिक पुस्तक में प्रकाशित हुआ करें। उसमें समालोचना के सिवाय दूसरा कोई भी विषय न रहे।
हिन्दी समालोचना विधा को सुगठित करने की दिशा में सप्रे जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं। यह बात अलग है कि तत्कालीन समय में हिन्दी के विद्वान साहित्य की विभिन्न विधाओं के विकास में ध्यान दे रहे थे और तब समालोचना विधा प्रायः उपेक्षित ही थी। ऐसे समय में समालोचना विधा को सप्रे जी ने सम्बन्धित निर्देशों के तहत विकसित किया जिसका बड़ा महत्व था। उन दिनों देश के कई हिस्सों में समालोचक समितियों का गठन किया गया परन्तु आशाजनक परिणाम नहीं था। हिन्दी समालोचना विधा के विकास के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए सप्रे जी ने लिखा है कि - हमें विश्वास है कि आज हिन्दी पठित समाज में हिन्दी समालोचना विषय नया नहीं है। कुछ दिनों से इसकी चर्चा हमारे प्रसिद्ध समाचार पत्रों में हो रही है। जयपुर में तो एक समालोचक समिति स्थापित भी हो चुकी है। मालूम नहीं कि वह अब तक जीती है या नहीं, क्योंकि बाला बोधिनी नामक पुस्तक की समालोचना के अतिरिक्त उसने अभी तक दूसरी समालोचना प्रकाशित नहीं की है। यदि की है तो हमारे देखने में नहीं आई।
पं. माधवराव सप्रे जी द्वारा निरन्तर नागरी प्रचारिणी सभा से अपील करने का सुपरिणाम यह हुआ कि अंततः सन् 1901 में नागरी प्रचारणी सभा के द्वारा एक समालोचक समिति का गठन किया गया, जिसमें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं. श्रीधर पाठक, पं. श्याम बिहारी मिश्र, पं. गंगा प्रसाद अग्निहोत्री एवं सप्रे जी को सम्मिलित किया गया था। सप्रे जी चाहते थे कि हिन्दी समालोचना विधा के उन्नति के लिए व्यापक योजना को क्रियान्वित किया जायेए तथा अधिक से अधिक लोगों को समिति में सम्मिलित किया जाए। उनका मत था कि एक स्वतन्त्र मासिक पत्र नागरी समालोचक का प्रकाशन किया जाए जिसमें
‘समालोचना’ के सिवाय दूसरे विषय शामिल न किये जायें।
सप्रे जी के अनुसार किसी भी कृति की संरचना के पूर्व कृतिकार को विषय चयन में सूझबूझ का परिचय देना चाहिए। अन्यथा कृति की अन्तः प्रकृति स्पष्ट नहीं हो पाती है। मिश्र बंधु द्वारा रचित लवकुश चरित्र काव्य की समालोचना करते हुए सप्रे जी ने साहित्यिक विषय चयन की विशद व्याख्या की हैं। सप्रे जी की यह समालोचना छत्तीसगढ़ मित्र के चार अंकों में प्रकाशित हुई थी। लवकुश चरित्र का विषय चयन मिश्र बंधुओं द्वारा अत्यन्त जल्दी में किया गया था। सप्रे जी की धारणा थी कि जल्दबाजी में विषय चयन कर सृजन की प्रकृति में संलग्न हो जाने के परिणामस्वरूप उक्त काव्य में अनेक त्रुटियां परिलक्षित होती हैं। अंग्रेजी के महाकवि मिल्टन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सप्रे जी ने लिखा-मिल्टन ने पैराडाइज लाॅस्ट विषय का चयन कई वर्षों में निश्चित किया था। उक्त कृति इसीलिए इतनी श्रेष्ठ बन पड़ी है। सप्रे जी का कथन है कि - कथा प्रसंग को लेकर काव्य बनाना जितना सहज दिखाई देता है यह उतना ही कठिन कार्य है। कथा के चुनने और उसके वर्णन करने में ही कवि की चतुराई की परीक्षा होती है। यदि प्रसंग स्वयं विलक्षण भावपूर्ण हो तो कवि के बहुत से श्रम बच जाते हैं। पर यदि प्रसंग समयानुकूल तथा सर्वांग सुन्दर न हो तो उसके वर्णन में मधुरता विचित्रता मनोरंजकता आदि प्रसादिक गुणों को लाना तथा उसे लोकप्रिय करना एक उत्तम कवि का ही काम है।
सप्रे जी ने समालोचक की तुलना न्यायाधीश से की है। दोनों समानधर्मी होते हैंए किन्तु दोनों के दृष्टिकोण में कुछ आधारभूत अन्तर भी होता है। समालोचक का कर्तव्य गुण-दोष विवेचन के पश्चात् निर्णय देना मात्र नहीं हैं उसके कत्र्तव्य की सीमा अधिक विस्तृत होती है। न्यायाधीश और समालोचक बाह्य दृष्टि से गुण-दोषों का विवेचन करते हैं और दोनों को ही निर्णय देना पड़ता है। किन्तु न्यायाधीश बने बनाए नियमों और परम्पराआंे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता। समालोचक के सामने सीमा का बंधन नहीं होता। उसे न्यायाधीश की तुलना में अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। देश, काल और वातावरण के अनुसार उसे अपने दृष्टिकोण का गठन करना पड़ता है। बौद्धिक रूप से दोनों ही निष्पक्ष होते हैं किन्तु
समालोचक की सहृदयता भी अपेक्षित होती है।
सप्रे जी ने समालोचना को यथार्थ गुण-दोष-विवेचन की संज्ञा दी है। उर्दू में नुसखा ख़ब्त अहमदिया शीर्षक से एक मौलिक पुस्तक लिखी गयी थी, जिसके मूल लेखक पं. लेखराम जी हैं। इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद षारत गौरवादर्श शीर्षक से किया गया, जिसके अनुवादक थे - पं.सूर्यप्रसाद मिश्र, जिसकी समालोचना के सन्दर्भ में सप्रे जी ने यथार्थ गुण-दोष-विवेचन की पद्धति पर प्रकाश डाला है। वे लिखते हैं - प्रत्येक पदार्थ के दो अंग होते हैं, जैसे धूप और छांह, सफेद और काला, अंधियारा और उजाला, सुख और दुःख, अच्छा और बुरा आदि। यद्यपि ये तर्क-शास्त्र (लाॅजिक) के अनुसार परस्पर विरोधी शब्द नहीं है, तथापि एक वस्तु या एक स्थिति के भिन्न-भिन्न दो अंगों को सूचित करते हैं। जब तक किसी पदार्थ के दोनों अंगों का पूरा-पूरा ज्ञान न हो जाए, तब तक उसके विषय में हमारी बुद्धि किसी प्रकार निश्चित नहीं हो सकती। कोई न्यायाधीश तभी न्याय करने में समर्थ होगा, जब वह वादी और प्रतिवादी दोनों का इज़हार सुन ले। इस प्रकार छत्तीसगढ़ मित्र में समय-समय पर पुस्तकों की तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष समालोचनाएं प्रकाशित हुआ करती थीं।
सप्रे जी के अनुसार समालोचना के लिए गहन ज्ञान की आवश्यकता होती है। उसे अन्य भाषाओं के साहित्य की अन्तर्धाराओं और परिवर्तनों का ज्ञान भी आवश्यक हैं जब तक किसी भी साहित्य में उच्च कोटि के आलोचक नहीं होंगे तब तक उस भाषा का साहित्य युगान्तरकारी नहीं हो सकेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि समालोचक का पूर्वाग्रहों पर नियंत्रण भी जरूरी हैं। जब सप्रे जी किसी पुस्तक की समालोचना करते थे तब उसके साथ पूरा न्याय कर अपने सभी विचार उड़ेल कर ही रूकते थे। छत्तीसगढ़ मित्र में
समालोचना प्रकाशित करते समय सप्रे जी पुस्तक के नाम के आगे एक क्रमांक भी प्रकाशित करते थे ताकि पाठक भविष्य में भी यह जान सकें कि इसके पूर्व कितनी पुस्तकों की समालोचना प्रकाशित हो चुकी हैं। उदाहरण के लिए-26 भारत गौरवादर्श (छत्तीसगढ़ मित्र, वर्ष 2 अंक 3 में प्रकाशित), 27 हास्य मंजरी (छत्तीसगढ़ मित्र, वर्ष 2 अंक 4 में प्रकाशित), 28 लवकुश चरित्र (छत्तीसगढ़ मित्र, वर्ष 2 अंक 8 में
प्रकाशित)।
छत्तीसगढ़ मित्र कभी 32 और कभी 36 पृष्ठांे में मुद्रित होता था, स्थानाभाव के कारण हर अंक में समालोचना नहीं छप पाती थी। सप्रे जी यह भी आवश्यक नहीं समझते थे कि एक ही अंक में एक पुस्तक की समीक्षा समाप्त कर दी जाए। कई प्रमुख ग्रन्थों की समालोचना करते समय सप्रे जी के
समालोचक मन ने बंधनमुक्त होकर ही पुस्तक-लेखन के प्रति न्याय किया हैं यही कारण है कि कुछ पुस्तकों की समालोचना छत्तीसगढ़ मित्र के लगातार तीन-चार अंकों में क्रमशः प्रकाशित हुई हैं। जैसे:- सप्रे जी ने पं. श्याम बिहारी मिश्र और उनके छोटे भाई पं. शुकदेव बिहारी मिश्र द्वारा लिखे 100 पृष्ठों के एक काव्य ग्रन्थ लवकुश चरित्र की समालोचना 35 पृष्ठों में की, जिसे छत्तीसगढ़ मित्र के लगातार पांच अंकों में प्रकाशित किया।
इस समालोचना में उन्होंने इस काव्य ग्रन्थ के बारे में तत्कालीन समाचार पत्रों में छपी विद्वानों की सम्मतियों का भी उत्तर दिया और लिखा कि -केवल प्रशंसा कर देना ही यदि समालोचना का मुख्य हेतु है तो अधिक लिखने की कुछ आवश्यकता नहीं है। फिर भी सप्रे जी ने इस काव्य ग्रन्थ की इतनी लम्बी और परिपूर्ण समालोचना इसलिए की है, कि पं. श्याम बिहारी मिश्र ने, जो बनारस के डिप्टी कमिश्नर थे, सप्रे जी को पत्र लिखकर निवेदन किया था कि मैं आपसे इस बात की प्रार्थना करता हूं कि आप समालोचना अत्यन्त स्वच्छन्दता से पक्षपात रहित होकर कीजिये और ग्रन्थ के समस्त गुण-दोषों को प्रदर्शित करने की चेष्टा अवश्य करिए। मिश्र बन्धु उस ज़माने के सम्माननीय साहित्यकार थे और उनके ग्रन्थ की समालोचना करना साधारण बात नहीं थी। इसलिए सप्रे जी ने इसके लिए काफी समय व्यतीत कर इतनी बड़ी समालोचना की।
इस तरह कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में हिन्दी समालोचना को सुगठित रूप से स्थापित करने का श्रेय पं. माधवराव सप्रे जी को ही है। सप्रे जी कुशल पत्रकार, साहित्यकार, निबन्धकार ही नहीं, कुशल समालोचक भी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ मित्र के माध्यम से समालोचना विधा को स्थापित करने का जो प्रयास किया उसका ऐतिहासिक महत्व अत्यन्त गौरवपूर्ण है। हिन्दी साहित्य के इतिहास का यदि पुनर्लेखन किया जाए तो सप्रे जी की अनेक टिप्पणियों से साहित्य की अन्य विधाओं के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रमुख तथ्यों को शामिल किया जा सकता है।

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