शिवनाथ बेसिन में भूमि उपयोग एवं कृषि नवाचार

प्राक्कथन - मुझे डा. (श्रीमती) शालिनी वर्मा की पुस्तक ‘‘शिवनाथ बेसिन में भूमि उपयोग एवं कृषि नवाचार‘‘ का प्राक्कथन लिखने में अत्यंत प्रसन्नता हो रही है । यह पुस्तक लेखिका के पी-एच. डी. शोध प्रबंध का संषोधित रूप हैं । यह शोध कार्य षिवनाथ बेसिन जिसमंे वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के पाँच जिले - दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, राजनांदगँाव एवं कवर्धा शामिल हैं, के 33 गाँवों के 1838 कृषकों के साक्षात्कार से कृषि नवाचार एवं उसके निर्धारकों के बारे मे संग्रहित विस्तृत जानकारी पर आधारित है । प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित यह पुस्तक कृषि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सूचना है ।
कृषि षिवनाथ बेसिन की प्रमुख अर्थव्यवस्था है । इस बेसिन के बहुसंख्यक जनसमुदाय के जीवकोपार्जन का यह साधन मात्र नहीं है, वरन जीवन प्रणाली भी है । पिछले दो दषकों में षिवनाथ बेसिन के कृषि के स्वरूप में बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है । बेसिन की तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं । भारत की कृषि में हो रहे अनेक तीव्रगामी परिवर्तनों से बेसिन की कृषि भी अछूती नहीं है । यहाँ की कृषि में न केवल यंत्रीकरण में वृद्धि हुई है तथा सिंचाई, रासायनिक खादों का उपयोग, कीटनाषक दवाईयों के उपयोग में बहुत अधिक वृद्धि हुई है, वरन कृषि की पद्धति तथा तकनीकी में भी बहुत अधिक सुधार हुआ है जिससे कृषि उत्पादकता में बहुत अधिक वृद्धि हुई है । अतः बेसिन में आर्थिक क्रियाओं के साथ ही कृषि के शस्य प्रतिरूप, प्रादेषिक स्वरूप तथा आंतरिक संरचना में तेजी से परिवर्तन हुआ हैं । फिर भी यहाँ की कृषि में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है ।
बेसिन की आवष्यकताओं के अनुरूप न केवल भूमि उपयोग एवं शस्य परिवर्तन की आवष्यकता है, वरन कृषि उत्पादन और प्रति हेक्टेयर उत्पादन दर में बहुत अधिक वृद्धि करने की आवष्यकता है । कृषि विकास में प्रादेषिक असंतुलन भी बहुत अधिक है । इसे कम करने की आवष्यकता है ताकि सभी क्षेत्रांे का समन्वित विकास हो सके । कृषि उत्पादन अनेक भौतिक, आर्थिक और संस्थागत कारकों के अतिरिक्त तकनीकी एवं संगठनात्मक कारकों के सम्मिलित प्रभावों की देन होती है । अतः इन कारकों में परिवर्तन करके बेसिन की कृषि प्रणाली मंे परिवर्तन लाया जा सकता है । भूमि सुधार एवं शस्य प्रतिरूप में परिवर्तन करके बढ़ती हुई जनसंख्या की आवष्यकताओं की पूर्ति करने की आवष्यकता है ।
छत्तीसगढ़ में कृषि नवाचार पर अध्ययन नगण्य है । डा. वर्मा ने अपने अध्ययन में भूमि उपयोग को प्रभावित करने वाले जनांकिकीय, आर्थिक एवं सामाजिक कारकों को स्पष्ट किया है । इसके अतिरिक्त षिवनाथ बेसिन में कृषि नवाचार के घटक - गोबर खाद, रासायनिक खाद, उन्नत बीज, कीटनाषी दवाईयों के उपयोग, सिंचाई एवं कृषि पद्धति के स्तर को ज्ञात करने का प्रयास किया गया है । कृषि नवाचार के घटकों के उपयोग के आधार पर सम्पूर्ण बेसिन को कृषि नवाचार के चार स्तर - अपेक्षाकृत उच्च, मध्यम, निम्न एवं अतिनिम्न में बाँटा गया है । कृषि नवाचार के अंगीकरण के लिए जोत का आकार महत्वपूर्ण निर्धारक है परन्तु षिवनाथ बेसिन में जोत का औसत आकार मात्र 1.48 हेक्टेयर है । यहाँ तीन-चैथाई जोत सीमांत अथवा लघु है । यही कारण है कि बेसिन के 25 विकासखंड में से 10 विकासखंड में कृषि नवाचार का स्तर अतिनिम्न/निम्न है । केवल एक विकासखंड में कृषि नवाचार का स्तर अपेक्षाकृत उच्च हैं।
षिवनाथ बेसिन में कृषि नवाचार के निर्धारक तत्वों - षिक्षा, जोत का आकार, पारिवारिक आय, सामूहिक चर्चा, प्रषासनिक सम्पर्क, अखबार की उपलब्धता, रेडियो एवं दूरदर्षन की उपयोगिता का कृषि नवाचार पर प्रभाव को स्पष्ट किया गया है । इसके लिए उपयुक्त सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया गया है । अतः कृषि में आर्थिक तथा सामाजिक कारकों की विवेचना को अधिक तार्किक बनाया गया है ।

डा. (श्रीमती) शालिनी वर्मा ने शिवनाथ बेसिन में कृषि नवाचार के स्तर तथा कृषि नवाचार के निर्धारक जनांकिकीय, सामाजिक एवं आर्थिक तत्वों की विषद विवेचना की है । यह शोध कार्य कृषि नवाचार से संबंधित समस्याओं पर गहरी समझ प्रदान करता है । इससे प्राप्त अँाकड़े तथा निष्कर्ष कृषि भूगोल पर शोध कार्य करने वाले शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है । साथ ही यह षिक्षाविदों, नियोजकों, प्रषासकों एवं सभी सामान्य नागरिकों के लिए एक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ है ।

डा. (श्रीमती) अनुसुइया बघेल
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
भूगोल अध्ययनषाला
पं. रविषंकर शुक्ल विष्वविद्यालय
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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