संयुक्त प्रान्त में महिलाओं की सामाजिक स्थिति

स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व संयुक्त प्रान्त में महिलाओं की सामाजिक स्थितिः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
प्रियंका आनन्द
शोध छात्रा, इतिहास विभाग
दी0द0उ0गो0वि0वि0गोरखपुर
स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व संयुक्त प्रान्त (आधुनिक उत्तर प्रदेश) में महिलाओं की स्थिति किसी भी दृष्टि से सन्तोषजनक न थी। यह सदियों से चले आ रहे सामाजिक ढाँचे का ही परिणाम था कि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की स्थिति आदिकाल से ही अच्छी न थी। आधुनिक युग के प्रारम्भ में भी वैचारिक दृष्टि से महिलाओं को पूर्णत हीनतर जाति का माना जाता था। पुरूषों से हीन, जिनका कोई महत्व न हो, कोई व्यक्तित्व न हो, सामाजिक दृष्टि से उन्हे घोर पराधीनता की स्थिति में रखा गया था। उनको कोई अधिकार न था और वह दलित- दमित थी। उन पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे नैतिक रूप से शून्य है। पितृत्तात्मक संयुक्त परिवार, बहु विवाह प्रथा, पर्दा प्रथा, सम्पतिगत ढाँचा, बाल विवाह, सती प्रथा, स्थायी वैधव्य की स्थिति आदि ने महिलाओं के स्वतन्त्र विकास को अवरूद्ध कर रखा था।1
उन्नीसवी शताब्दी में उपनिवेशवादी प्रशासन, अर्थव्यवस्था, पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति, विशेष रूप से पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव के परिणामस्वरूप जब भारत में बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ तो इस वर्ग को धर्म, समाज तथा विशिष्टतया स्त्रियों की दशा में सुधार की जरूरत महसूस हुई। अतएव उन्नीसवी शताब्दी में सुधारवादी आन्दोलन का जन्म हुआ। इन सुधारवादी आन्दोलनों के माध्यम से धार्मिक रूढ़िवादी प्रथाओं के साथ-साथ पर्दा प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, सती प्रथा और अन्य सामाजिक कुरीतियों को आदिम और निकृष्ट मानते हुए उनके विरूद्ध सुधार अभियान शुरू किये गये। यह सुधार अभियान सबसे पहले बंगाल में प्रारम्भ हुआ, जिसके प्रणेता राजाराम मोहन राय थे। धीरे- धीरे यह अभियान देश के अन्य प्रान्तों जैसे: महाराष्ट्र व दक्षिण भारतीय राज्यांे में विशेष रूप से फैला, किन्तु संयुक्त प्रान्त में सुधारवादी गतिविधियाँ बंगाल, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों की भाँति देखने को नहीं मिलती है। तथापि देश के विभिन्न प्रान्तों में चलाए जाने वाले सुधारवादी आन्दोलनों व उसके फलस्वरूप बनने वाले कानूनों का संयुक्त प्रान्त की महिलाओं की स्थिति पर सीमित रूप में ही सही सकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।
संयुक्त प्रान्त में सुधारवादी आन्दोलन में गति उन्नीसवी शताब्दी के उŸारार्द्ध में देखने को मिलती है, जब 13 फरवरी 1856 को अवध प्रान्त का अंग्रेजी कम्पनी के साम्राज्य में सम्मिलित करके यहाँ ब्रिटिश शासन व कानून व्यवस्था को कठोरता से लागू किया गया। यद्यपि 1858 के पश्चात् से ब्रिटिश सरकार की नीति भारतीय समाज व्यवस्था व संस्कृति में अति सीमित हस्तक्षेप की थी फिर भी उनकी शासन प्रणाली, पाश्चात्य शिक्षा, ब्रिटिश सरकार व इसाई मिशनरियो की गतिविधियों के परिणामस्वरूप संयुक्त प्रान्त में सुधारवादी गतिविधियों में तेजी आई। उŸार प्रदेश में सुधारवादी आन्दोलन की शुरूआत राष्ट्रीय स्तर पर चलाये जाने वाले आर्य समाज की गतिविधियों से माना जा सकता है।
1875 में स्थापित आर्य समाज आन्दोलन की सुधारवादी गतिविधियों ने उन्नीसवी शताब्दी के अन्तिम के अन्तिम दो दशकों में बल पकड़ा जिसके अन्तर्गत संयुक्त प्रान्त में सामाजिक, धार्मिक, व सांस्कृतिक गतिविधियाँ निश्चित रूप से प्रारम्भ हुई। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समाज में धर्म के रूढ़िवादी स्वरूप (जिसने सामाजिक कुरीतियों व कुप्रथाओं को जन्म दिया) की पकड़ को ढीली करने के उद्देश्य से वर्ष 1874 में सत्यार्थ- प्रकाश नाम से एक पुस्तक लिखी। स्वामी दयानन्द सरस्वती के नेतृत्व में उनके अनुयायियों के द्वारा महिलाओं के हितों को नुकसान पहुँचाने वाली सामाजिक कुरीतियों जैसे, बाल विवाह, बहु विवाह प्रथा, बेमेल विवाह, स्थायी वैधव्य तथा स्त्री अशिक्षा आदि को समाप्त करने हेतु अभियान चलाए गए। उदाहरणार्थ, स्वामी दयानन्द सरस्वती बाल विवाह के प्रबल विरोधी थे। इसलिए उन्होंने लड़के व लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः 25 वर्ष व 16 वर्ष निर्धारित की। 2 इसके साथ ही साथ आर्य समाज विधवा विवाह का भी समर्थक था। अतएव वर्ष 1882-83 में आर्य समाजियों ने विधवा विवाह की वकालत करते हुए उससे सम्बन्धित नियमावली तैयार की। उन्हीं वर्षो में आर्य समाज द्वारा अपनी स्वप्रकाशित पत्रिकाओं में विधवा विवाह से सम्बन्धित आकड़े प्रकाशित कर लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया। परन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि आर्य समाज अक्षत यौवन (जिनकी कोई सन्तान न हो) के विवाह के हिमायती थे। 3
इसके अतिरिक्त आगरा में शिवदयाल साहिब (तुलसी राम) के नेतृत्व में संचालित राधास्वामी सत्संग आन्दोलन द्वारा भी धार्मिक जीवन में व्याप्त रूढ़ियों को समाप्त करने के उद्देश्य से सुधारात्मक गतिविधियों का क्रियान्वयन किया गया।4 जिससे संयुक्त प्रान्त की महिलाओं को धार्मिक रूढ़िवादी परम्पराओं व उससे पनपने वाली सामाजिक कुप्रथाओं व विसंगतियों से मुक्त होने में मदद मिली।
1870 के दशक के पश्चात् मुस्लिम समाज में भी सर सैय्यद अहमद खाँ के प्रयासों से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मुस्लिम समाज के बौद्धिक केन्द्र के रूप में उभरा व विकसित हुआ।‘‘5 इस आन्दोलन के माध्यम से मुस्लिम महिलाओं में ही शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रयास प्रारम्भ हुए जिससे महिलाओं में शिक्षा ग्रहण करने की कवायद सीमित स्तर पर प्रारम्भ हुई।
इन समस्त प्रयासों के बावजूद बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक संयुक्त प्रान्त परम्परागत रूढ़िवादी समाज विशेष रूप से आधी आबादी वाली महिलाओं के जीवन क्षेत्र में ऐसा कोई विशेष सुधार या परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता जिसे गर्व के साथ बताया जा सके।
इसके पीछे दो कारण प्रमुख रूप से उŸारदायी थे। पहला बीसवीं शताब्दी के पूर्व संयुक्त प्रान्त में जो भी सुधारवादी आन्दोलन चलाए गए चाहे वह आर्य समाज आन्दोलन हो अथवा राधा स्वामी सत्संग आन्दोलन, सभी का मूल धर्म से जुड़ा हुआ था, जो अपने धर्म के विशुद्ध रूप को स्थापित करने के लिए चलाए गए थे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह पाश्चात्य धर्म व संस्कृति के अतिक्रमण तथा इसाई मिशनरियों की तात्कालीक सामरिक गतिविधियों का प्रतिरोध था। दूसरा कारण इन सुधारवादी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका का नगण्य होना अथवा नहीं होना था, जिसके कारण महिलाओं से सम्बन्धित समस्याओं पर न तो खुले तौर पर चर्चा हो पाती थी और नहीं उनकी समस्याओं के वास्तविक स्वरूप को समझने की कोशिश ही की जाती थी। अधिकांश समाज सुधारकों ने पुरूष समाज व पितृसŸाात्मक व्यवस्था को ध्यान में रखकर सुधारवादी गतिविधियों का संचालन किया। उनकी सुधारवादी गतिविधियों का आधार व उद्देश्य स्त्री दशा में सुधार से ज्यादा प्राचीन नारी आदर्शाें व प्राचीन स्त्री-पुरूष सम्बन्धों को स्थापित करना था। वे स्त्रियों को आधुनिक तो बनाना चाहते थे लेकिन अपने हितों, प्राचीन भारतीय आदर्शों व पारिवारिक दायरों के अधीन। उदाहरणार्थ: आर्य समाज आन्दोलन ने विधवा विवाह की वकालत तो की लेकिन साथ ही उसमें अक्षत यौवन जैसी शर्तो को भी जोड़ दिया। इसी प्रकार वे लड़कियों की शिक्षा का समर्थन तो करते थे परन्तु लड़कों के समान शिक्षा पर उनका दृष्टिकोण सकारात्मक नहीं था। (यद्यपि यह दृष्टिकोण सभी आर्य समाजीयों ने नहीं थे) कई आर्य समाजियों का मानना था किय ‘‘ लड़कियों की शिक्षा का चरित्र लड़कों की शिक्षा से भिन्न होना चाहिए........हिन्दू लड़की को हिन्दू लड़कों से भिन्न प्रकृति के कार्य करने होते है। अतः हम उस व्यवस्था को प्रोत्साहित नहीं करेंगे जो उन्हें राष्ट्रीय चारित्रिक गुणों से वंचित कर दे। हम अपनी लड़कियों को एैसी दिशा नहीं देगें जो उनकी सोच बदल दे।‘‘6 अलीगढ़ आन्दोलन को भी इसका अपवाद नहीं कहा जा सकता क्योंकि भले ही यह आन्दोलन पाश्चात्य शिक्षा तथा स्त्री शिक्षा का हिमायती था लेकिन इस आन्दोलन के माध्यम से पर्दा जैसी अस्वस्थ्यकारी प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से कोई मुहिम शुरू नहीं की गयी।
परिणामस्वरूप बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही बुद्धिजीवी महिलाओं ने पुरूष वर्चस्व से मुक्त सुधारवादी गतिविधियों के संचालन के लिए स्वतन्त्र महिला संगठनों के निर्माण की दिशा में गम्भीरतापूर्वक विचार करना प्रारम्भ किया। तत्कालीन समाज में महिला संगठनों की स्थापना की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए संयुक्त प्रान्त की बुद्धिजीवी महिला व समाज सुधारक सरला देवी चौधरी ने ‘ए वीमेन मूवमेन्ट‘ नाम के अपने लेख में लिखा कि ‘‘मैं भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस तथा नेशनल सोशल कान्फ्रेंस आदि संगठनों की सभा आयोजित करने के पक्ष में नहीं हूँ। स्त्री समानाधिकार, स्त्री शिक्षा और स्त्रियों की भलाई की लम्बी डींगे मारने वाले वार्षिक जलसेबाज नेता व सुधारक स्वयं मनु की छाया में रहते हैं और स्त्रियों को पहलकदमी की अनुमति नहीं देते।‘‘7
अतः बीसवी शताब्दी के प्रथमार्द्ध में ही संयुक्त प्रान्त में कुछ स्वयंसेवी महिला संगठनों का गठन किया गया जैसे, 1905 में बनारस में भारत महिला परिषद्,8 1909 में इलाहाबाद की प्रयाग महिला समिति,9 1909 में ही जे0के देवधर द्वारा गठित महिला सेवा सदन,10 1910 में सरला देवी चौधरी द्वारा गठित अखिल भारतीय भारत स्त्री महामण्डल,11 तथा 1911 में प्रयाग की रानी राम प्रिया देवी द्वारा गठित पर्दा प्रथा क्लब,12 आदि।
इन संगठनों द्वारा महिलाओं की दशा सुधारने हेतु व्यवहारिक प्रयास किए गये। इसमें सबसे प्रभावी भूमिका बनारस की भारत महिला परिषद् तथा सरला देवी द्वारा गठित भारत स्त्री महामण्डल की रही। 1905 में बनारस में गठित भारत महिला परिषद्, जो एक क्षेत्रीय महिला संगठन था ने अखिल भारतीय संगठनों का समर्थन किया तथा उनके साथ मिलकर कार्य भी किया। यह संगठन प्रमुख रूप से महिलाओं की व उनकी समस्याओं की चर्चा के मंच के रूप में ज्यादा क्रियाशील थे, उदाहरण के तौर पर अपने स्थापना वर्ष में इस संगठन ने हिन्दू महिलाओं की जीवन प्रणाली के लिए आचार संहिता बनाए जाने तथा आधुनिक भारत के नागरिक के रूप उनकी भूमिका जैसे विषयों पर परिचर्चाएँ आयोजित की । वर्ष 1905 में ही परिषद् ने एक गोष्ठी आयोजित की जिसमें एक दर्जन महिलाओं ने निम्नलिखित विभिन्न विषयों पर अपने पर्चे पढे और अपने विचारों को व्यक्त किया। ‘हिन्दू पत्नी तथा उसे क्या होना चाहिए‘, ‘स्त्री शिक्षा‘, ‘आधुनिक भारत में स्त्रियों का स्थान‘, ‘मातृपूजा‘, ‘हमारी जाति की जिम्मेदारियाँ‘, ‘गृहस्थ धर्म एवं पवित्रता‘, ‘ब्रम्हचर्य‘ तथा उसके लाभ‘, ‘वेदान्त संस्कार‘, ‘शिशु जन्म से सम्बन्ध‘, ‘हवन के लाभ‘, ‘बाल विवाह का नुकसानदायक असर‘, तथा ‘आधुनिक युग में भारतीय स्त्री के कर्Ÿाव्य‘।13
इस प्रकार भारत महिला परिषद् ने संयुक्त प्रान्त में महिलाओं को विचाराभिव्यक्ति का मंच प्रदान करने तथा उनमें वैचारिक क्रान्ति का संचार करने में महŸवपूर्ण भूमिका निभाई। जिसका तत्कालीन समाज की महिलाओं के जीवन व कार्यशैलियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।
1910 में सरला देवी चौधरी द्वारा गठित अखिल भारतीय भारत स्त्री महामण्डलने 1917 में भारत स्त्री महामण्डल की ओर से माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड समिति के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व व प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने महिलाओं के शैक्षिक, राजनीतिक व आर्थिक अधिकारों के संरक्षण की मांग करने के साथ ही उनके सामाजिक हितों के संरक्षण से सम्बन्धित मांग प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘‘भारतीय पत्नियों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए तथा किसी विवाहित भारतीय पुरूष द्वारा किसी विदेशी स्त्री से विवाह करने को आपराधिक एवं गैरकानूनी करार दिया जाना चाहिए।‘‘14 इसके अतिरिक्त उन्होंने विधवा महिलाओं के संरक्षण, महिलाओं को उन्नत स्वास्थ्य एवं प्रसूति सेवाएँ उपलब्ध कराए जाने की माँग की।‘‘15
उपरोक्त संगठन बीसवी सदी के उŸारार्द्व तक अस्तित्व में रहा तथा महिला उत्थान हेतु निरन्तर क्रियाशील रहा। ये संगठन पूर्णतः पुरूष मुक्त संगठन थे।16 इसलिए इन संगठनों के माध्यम से पहली बार महिलाओं को महिलाओं के लिए सार्वजनिक रूप से कार्य करने का अवसर मिला। यद्यपि समाज में अभी भी महिलाओं के लिए एक निश्चित सीमा निर्धारित थी फिर भी उपरोक्त संगठनों ने महिलाओं से सम्बन्धित कार्यक्रमों व गतिविधियों का सक्रिय संचालन भी किया।
इन क्षेत्रीय संगठनों के अतिरिक्त प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् भारत में राष्ट्रीय स्तर के तीन महिला संगठन भारतीय महिला संघ, भारतीय राष्ट्रीय महिला परिषद् और, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन था। इन संगठनों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के हितार्थ कार्य किए, जिसका संयुक्त प्रान्त पर भी प्रभाव पड़ा।
इसके अतिरिक्त महिलाओं की सामाजिक दशा सुधारने हेतु भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस तथा कई राष्ट्रवादी राजनेता, जिसमें महात्मा गांँधी का नाम अग्रणी है, ने सराहनीय प्रयास किए। इन संयुक्त प्रयासों से तत्कालीन समाज व्यवस्था में महिलाओं को कुछ हद तक अमानवीय सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति एवं ढील मिली।
उपरोक्त प्रयासो के बावजूद संयुक्त प्रान्त की महिलाओं की सामाजिक स्थिति में कोई ऐसा विशिष्ट बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता जिससे उनकी स्थिति को सन्तोषजनक कहा जा सके। बीसवीं शताब्दी के उŸारार्द्ध में महिलाओं की दयनीय सामाजिक स्थिति व उससे जुड़ी कुप्रथाओं की कुछ जानकारी समकालीन संयुक्त प्रान्त के साहित्यकारों व कहानीकारों की रचनाओं से भी मिलती है। जिसके आधार पर संयुक्त प्रान्त की महिलाओं की स्थिति का अनुमान किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्य सम्राट ‘मुंशी प्रेमचन्द, की कृतियाँ उल्लेखनीय हैं। उनकी कहानियों में रचित महिला पात्र व उनकी व्यथाएँ उस समय की समाज व्यवस्था व उसके स्वरूप तथा मनोदशा को दर्शाता है उनकी लगभग हर कहानियों व उपन्यासों तथा विभिन्न पत्रिकाओं जैसे, जागरण व हंस में उनके द्वारा लिखे गये लेखों में महिलाओं की स्थिति व उनसे सम्बन्धित समस्याओं को महŸवपूर्ण ढंग से रेखाकिंत किया गया है। उदाहरणार्थ- प्रेमचन्द ने अपने उपन्यास ‘निर्मला‘ में संयुक्त प्रान्त ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित बेमेल विवाह जैसी समस्या व उसके दुष्परिणामों को झेलती एक महिला (निर्मला) के जीवन के हर पहलू का विस्तार से वर्णन किया हैं। इसी प्रकार उन्होंने अपने उपन्यास ‘सेवासदन‘ में बीसवीं सदी के समाज में महिलाओं की दो प्रमुख समस्याओं को उठाया है। पहली दहेज प्रथा तथा दूसरा बेमेल विवाह। इस उपन्यास में प्रेमचन्द बताते है कि किस प्रकार भारतीय समाज की महिलाएँ बेमेल विवाह की वजह से असमय विधवा हो जाती है और परिस्थितियों वश अपने जीवन के निर्वाह के लिए कोई पारिवारिक व सामाजिक सहयोग तथा उपाय न देखकर वेश्यावृŸिा के लिए विवश हो जाती हैं। इसके साथ ही वह अपने उपन्यास ‘गबन‘ में स्पष्ट करते है कि किस प्रकार दहेज के कारण बेमेल विवाह की शिकार विधवा महिला का अपने पिता अथवा पति की सम्पत्ति पर अधिकार न होने की वजह से उसे नारकीय परिस्थितियों का सामना करने व झेलने को लाचार एवं विवश होना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त प्रेमचन्द द्वारा अपनी कहानी ‘स्त्री और पुरूष‘ में समाज की महिला पर रूढ़िवादी धर्म की कड़ी पकड़ को दर्शाया गया है कि किस प्रकार अपने पति की कल्पना के अनुरूप रूपवती न होने पर वह उसके क्रोध, तिरस्कार व अपमान की शिकार होती है। इसके बावजूद वह पति के रूग्ण होने पर पूर्ण सर्मपण तथा श्रद्धा के साथ उसकी सेवा करती है। नारी का यह चरित्र तत्कालीन समाज की सोच के अनुसार एक आर्दश नारी व पत्नी के स्वरूप को दर्शाता है साथ ही कहानी यह भी दर्शाती है कि धर्म के रूढ़िवादी स्वरूप की पकड़ महिलाओं के मनो मस्तिष्क पर इतना अधिक है कि विभिन्न सुधारात्मक प्रयासों के बावजूद, वे किसी भी नारकीय परिस्थिति को झेलने के बाद भी पति से पृथक अपने स्वतन्त्र अस्तित्व के लिए तैयार नहीं होती है। प्रेमचन्द के उपन्यास ‘कर्मभूमि‘ की एक महिला पात्र ‘नैना‘ का भी चरित्र कुछ इसी प्रकार का दिखाया गया है कि किस प्रकार धर्म व समाज के डर से एवं पिता को दुःखी न करने के उद्देश्य से सेठ के आवारा लड़के से वह शादी को तैयार हो जाती है और ससुराल में अमानवीय व्यवहार एवं प्रताड़ना की शिकार होने के बाद भी किसी से कोई शिकायत नहीं करती है। इस सम्बन्ध में नैना की भाभी सुखदा का कथन तात्कालीन महिलाओं के मनोविज्ञान को दर्शाता है, जब वह कहती है कि, ‘‘वह शिकायत करने वाली लड़की नहीं है, अगर वह लोग उसे लातों से मारकर घर से निकालना भी चाहेगें तो वह न तो घर से निकलेगी और न किसी से कुछ कहेगी।‘‘17
दहेज प्रथा समाज में किस प्रकार हावी थी इसका उदाहरण हंस पत्रिका में प्रकाशित दहेज व्यवस्था से परेशान एक पिता की चिट्ठी के जवाब में प्रेमचन्द के प्रत्युत्तर के कुछ अंशों से स्पष्ट होता है, जो इस प्रकार है-
‘एक सज्जन जिनका नाम बताना मुनासिब नहीं समझते, हमारे पास एक पत्र लिखा है, जिससे विदित होता है कि आजकल अपनी कन्याओं का विवाह करने में पिताओं को कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। उक्त सज्जन ने हमसे उस मुसीबत का इलाज पूछा हैं। हम इस विषय में उतने ही निस्सहाय है, जितने स्वयं वह है। हमें तो इसका एक ही इलाज नजर आता है और वह यह है कि लड़कियों को अच्छी शिक्षा दी जाए और उन्हें संसार में अपना रास्ता बनाने के लिए छोड़ दिया जाए तब यदि वह गृहिणी-जीवन करना चाहंेगी तो अपनी इच्छानुसार अपना विवाह कर लेगीं अन्यथा अविवाहित रहंेगी और सच पूछो तो यह मुनासिब भी है। हमें कोई अधिकार नहीं है कि लड़कियों की इच्छा के विरूद्ध केवल रूढ़ियों के गुलाम बनाकर केवल इस भय से कि खानदान की नाक न कट जाए, लड़कियों को किसी के गले मढ़ दें। हमें विश्वास रखना चाहिए कि लड़के अपनी रक्षा कर सकते हैं तो लड़कियाँ भी अपनी रक्षा कर लेंगी।18
इसी के साथ-साथ बीसवीं शताब्दी के तीसरे व चौथे दशक में भारतीय फिल्मकारों ने भी अपने फिल्मों के माध्यम से तात्कालींक समाज के ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को उठाया। उदाहरणार्थ- वी0 शान्ताराम की 1937 में बनी फिल्म ‘दुनिया न माने‘ राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त बेमेल विवाह की समस्या को बड़ी शिद्दत के साथ उठाती है।19 उन्हीं की 1939 में बनी फिल्म ‘आदमी‘ में पहली बार वेश्या को एक हाड़ माँस की भावना प्रवण महिला के रूप में चित्रित करते हुए, वेश्या पुनर्वास की समस्या को गम्भीरता से उठाया गया है।20
अतः स्पष्ट है कि यद्यपि संयुक्त प्रान्त में महिलाओं की सामाजिक दशा सुधारने हेतु विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए। जिससे आदिम व निकृष्ट मानी जाने वाली सामाजिक कुरीतियों से कुछ हद तक उन्हें मुक्त कराने में सफलता मिली और उन्हेें समाजोपयोगी सदस्य के रूप में स्वीकारा जाने लगा किन्तु जैसा कि प्रेमचन्द के उपन्यासों, कहानियांे व पत्रिकाओं तथा तत्कालीन समाज के फिल्मकारों द्वारा बनायी गयी फिल्मों में उठाए गए सामाजिक मुद्दों आदि से संकेत मिलते है कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति में उस सीमा तक सुधार नहीं हुए थे, जिसे सन्तोषजनक कहा जा सके। यद्यपि सम्पूर्ण स्थिति को निराशाजनक नहीं कहा जा सकता। सती, बहुपत्नि प्रथा, पर्दा प्रथा, शाश्वत वैधव्य जैसी कुरीतियों में कमी आयी थी, लेकिन बाल विवाह, बेमेल विवाह, दहेज प्रथा, वेश्यावृŸिा तथा शिशु बालिका हत्या जैसी समस्याएँ अभी भी वृहद रूप से व्याप्त थी।
संदर्भ ग्रन्थ सूची
(1) नीरा देसाई ‘वीमेन इन मार्डन इण्डिया‘ दिल्ली 1977, पृष्ठ सं0- 16
(2) डी0 बैवल ‘द आर्य समाज‘, दिल्ली, 1983, पृष्ठ सं0-11
(3) कीनेथ जोन्स ‘आर्य धर्म‘, दिल्ली, पृष्ठ सं0- 99-102
(4) ए0आर0 देसाई ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठ भूमि, दिल्ली 2004,पृष्ठ सं0- 242
(5) पूर्वोक्त
(6) कीनेथ जोन्स ‘पूर्वोघृत, पृष्ठ सं0- 138
(7) सरला देवी ‘ए वीमेन मूवमेन्ट‘ (लेख) माडर्न रिव्यू, अक्टूबर 1911,कलकŸाा, पृष्ठ सं0- 345
(8) राधा कुमार ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास: 1800-1900‘ दिल्ली, 2002, पृष्ठ सं0- 122
(9) मनोरमा, अक्टूबर 1926,दिल्ली, पृष्ठ सं0- 45,
(10) के0सी0 व्यास ‘द सोशल रेनेसा इन इण्डिया‘, दिल्ली,1987, पृष्ठ सं0-142
(11) मार्डन रिव्यू, अक्टूबर 1911, कलकŸाा, पृष्ठ सं0- 344,
(12) स्त्री दर्पण, दिसम्बर 1911, दिल्ली, पृष्ठ सं0- 328,
(13) वीर भारत तलवार का आलेख ‘वीमेन्स जर्नल्स इन हिन्दी (सं0) सांगरी एवं वैद ‘रिकास्ंिटग
वीमेन, दिल्ली 1989, पृष्ठ सं0- 206
(14) सीताराम सिंह ‘नेशलिज्म एण्ड सोशल रिफार्म इन इण्डिया: 1885-1920‘दिल्ली 1968
पृष्ठ सं0- 206-07
(15) राधा कुमार: पूर्वोघृत, पृष्ठ सं0- 11
(16) एन एकाउन्ट ऑफ द वर्क एमंग वीमेन इन कलकŸाा, इण्डियन लेडीज मैगजीन, 8 मई 1935,
पृष्ठ सं0- 176
(17) प्रेमचन्द‘कर्मभूमि‘बनारस,1932 पृष्ठ सं0-184
(18) हंस ‘मासिक पत्रिका‘ इलाहाबाद, अप्रैल, 1933
(19) डा0 चन्द्र भूषण गुप्त का लेख ‘आजादी की लड़ाई में भारतीय सिनेमा‘ (सं0) एस0एन0आर0
रिजवी‘ स्टडीज इन इण्डियन हिस्ट्री‘ नई दिल्ली 1999, पृष्ठ सं0- 207
(20) पूर्वोक्त, पृष्ठ सं0- 208

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