संस्कृत के पश्चात हिन्दी भाषा को ही श्रेष्ठता मिली

महर्षि दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, विनोबा भावे आदि उच्च विचारकों ने अपने विचारों को व्यक्त करने का साधन हिंदी भाषा को ही बनाया। जिसके परिणाम स्वरुप कई जन जागरण हुए। इतिहास इसका प्रमाण है।
'हिन्दी मय है देश हमारा,
इस पर निर्भर विकास हमारा।
पावन धरती को बोली हिन्दी
यह तो भारत माँ की बिंदी।Ó
हिन्दी हिंदुस्तान की जान है। आन, बान एवं पहचान है। इसमें देश का गौरव समाप्त है। खड़ी बोली हिंदी का प्रारंभ, शौरे सैने अपभ्रंश से हुआ। किंतु वास्तविक प्रारं्र 100 ई से माना जाता है। हिंदी के पौने दस सौ वर्षों को विद्वानों के द्वारा तीन भागों में बांटा गया।
1. आदिकाल 2. मध्यकाल 3 आधुनिक काल।
आदिकालीन हिंदी अप्रभंशयम थी। इसके अंतर्गत 'एÓ और 'औÓ दो नए स्वरों का अविश्कार हुआ। मध्यकाल (1500 ई. से 1800 मई तक) में हिंदी के अंतर्गत अद्भूत परिवर्तन हुए। इस युग में हिंदी की बोलियां विकसित हुई। धार्मिक साहित्य की रचना हुई। महत्वपूर्ण व्याकरणात्मक प्रयोग हुए। यह काल हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल घोषित हुआ। मुगल सम्राट 'औंरगजेबÓ तथा 'जहांगीरÓ ने हिंदी में रचनाए लिखी। इसी काल में तत्संम शब्दों का हिंदी में प्रयोग एक प्रतिभापूर्ण कार्य कर गया। जिसन हिंदी को एक वैभवपूर्णऐ भाषा बना दिया।
आधुनिक काल खड़ी बोली का युग है। खड़ी बोली का प्रारंभ 'फोर्ट विलियम कॉलेजÓ की स्थापना के साथ हुआ। पत्रकारिता के प्रभाव से हिंदी के महत्व में 'चार चाँद लग गयेÓ। 'गद्यÓ 'पद्यÓ, 'नाटकÓ, सभी विधाओं में पर्याप्त लेखन हुआ। किसी ने कहा- 'हिंदी का संसार, अनार और संसार की हिंदी अनार का रस है।Ó हिंदी की आधार शिला उसकी प्रमुख शाखाएं तथा उसकी बोलियाँ हैं। इनके संयोजन से ही हिंदी का सौंदर्य निखरता है।
इस विशाल धरती के दो महाखंड है। यूरोप और एशिया। हिंदी एशिया खंड की प्राचीन भाषा संस्कृत से जन्मी है। एक विद्वान ने कहा है-
हिंदी भारतीय धर्म की धुरी,
अनुशीलनों की अनुकुली
शुभविचारों की मूली
सामाजिकों की सहोदरी
राजभाषा की दृष्टि से आज भारत में दस हिंदी भाषी राज्य है। बिहार, दिल्ली, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़।
आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान हिंदी से होने लगी है। भारत के अतिरिक्त मारीशस, सूरीनान, गुयाना, मोजाम्ढीक, अंगोला, सिंगापुर, मलाया, थाईलैंड तथा दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों ने हिंदी को एक अंतर्राष्ट्रीय परिक्षेत्र दिया है।
आज हिंदी के तीन रुप है। पहला रुप भारतीयों की मातृभाषा, दूसरा स्वरुप राजभाषा का तथा तीसरा स्वरुप भारत के बाहर बसे विश्व में प्रवासी भारतीयों को। इसका यह स्वरुप सर्वाधिक व्यापक है। विश्व में कई देश ऐसे हैं जहाँ लाखों लोगों की व्यावहारिक भाषा हिंदी है। हिंदी आज विश्व की प्रमुख भाषाओं की पंक्ति में आ चुकी है।
हिंदी भाषा एक दिखावटी फूल नहीं वरन सुगंध मय, परागमय पुष्प है। इसी सुगंध के कारण रूस के 'वक्क वमांग्नि कोवÓ तथा 'बोलाजियम के बुलकेÓ भारत में आकर हिंदी को समर्पित हो गए।
श्रीमती पुष्पा यादव
(कवियत्री)
कुशालपुर, रायपुर (छ.ग.)

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