सच्ची और झूठी सफलता

सफलता के विषय में कुछ लिखने के पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि सफलता किये कहते हैं। बजुत लोग सफलता का यह अर्थ करते हैं कि उनकों कार्य या प्रयत्न समाप्त होने पर इच्छित फल मिल जाय। परन्तु सफलता का इतना ही अर्थ नहीं है। कोई-कोई मनुष्य अपना कार्य पूरा करने पर जब अपने विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति तथा प्राप्ति नहीं कर सकते-जब उन्हें इच्छित फल नहीं मिला-तब वे अपने को असफल मान लेते हैं। परन्तु सच बात ऐसी नहीं है। संसार में ऐसे बहुत से दृष्टान्त मिलते हैं जिन्हें हम असफलीभूत अथवा ''अकृतकार्य सफलताÓÓ कह सकते हैं। फिर सफलता है क्या? वह भी एक साधन या उपाय ही है। वह अंतिम ध्येय की सर्वोच्च सीढ़ी है, परन्तु यह स्वयं अंतिम ध्येय नहीं है। ऐहिक सुख ऐसे होते हैं जो उचित रीति से प्रयत्न करने पर अवश्य मिल जाया करते हैं। यदि दुर्भाग्यवश किसी कारण से न भी मिलें तो इसके लिए किसी कार्यशील सज्जन का जीवन निष्फल और निरर्थक कभी नहीं माना जा सकता। एक विद्वान अंग्रेज कवि कहता है कि -
If what shone afar so grand
Turn to nothing in thy hand.
On again, the virtue lies,
In the struggle, not the prize.
- R.M. Milnes.

अर्थात मनुष्य के सद्गुणों का दर्पण उसके कार्यों का दृश्यफल नहीं है, वरन् उसके सद्गुणों का सच्चा दर्पण उसकी अदम्य उत्साहपूर्ण कार्य-शक्ति ही है। क्योंकि स्तुति करने योग्य तो वही मनुष्य हो सकता है जो कंटीले वृक्ष पर स्वयं चढ़कर फल तोड़ सके। नहीं तो बांस अथवा किसी यंत्र के द्वारा फल तोडऩे वालें साधारण मनुष्य इस संसार में बहुत से पाये जाते हैं। राजा राममोहनराय, स्वामी दयानंद, महात्मा तिलक, महात्मा गांधी आदि के नाम प्रसिद्ध क्यों हैं? इसलिये नहीं कि इन लोगों ने अपने जीवन में कोई नया राज्य स्थापित किया हो, किन्तु केवल इसीलिये कि वे अपने निश्चित उद्देश्य के अनुसार कंटकमय पथ में चलते हुए कभी भी विचलित नहीं हुए। बस, जो मनुष्य इस तत्व का आजन्म पालन करेगा उसी का जीवन सफल है। अतएव विचारशील पुरूषों ने कहा है कि दुर्दमनीय धैर्ययुक्त कार्यशीलता के अंतिम स्वरूप का ही-चाहे वह कैसा भी हो-नाम सफलता है। परन्तु यदि हमारा उद्देश्य ही दोषपूर्ण हो और अंत में हमें किसी दु:खमय तथा अनिष्टकारक परिणाम का सामना करना पड़े तो इसके दोष के भागी भी हमी हैं। ऐसी दशा में हमारा जीवन सफल नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा होता तो शराब पीने से मृत्यु होने पर शराबी मनुष्य का भी जीवन सफल कहा जा सकता। किसी उद्देश्य को स्थिर करने और कार्य का आरंभ करने के पहले हमें यह देख लेना उचित है कि वह उद्देश्य अच्छा है या बुरा। इसके लिए एक अंग्रेज लेखक हमें यह उपदेश देता है -
See first that the design is wise and just,
That ascertained, pursue it resolutely,
Do not for one repulse forego the purpose.
That you resolved to effect.

अर्थात् किसी काम को करने के पहले यह विचार कर लेना आवश्यक है कि वह काम किसी तरह से हानिकारक तो नहीं है। इसके बाद जब यह मालूम हो जाय कि वह कार्य न्यायसंगत है, तब उसको पूरा करने के लिए जी तोड़ कर परिश्रम करो, फिर चाहे कितनी और कैसी भी बाधायें आ जावें, उस कार्य को अधूरा मत छोड़ों। कार्य करते समय मनुष्य को इस बात की तनिक भी परवाह न करनी चाहिए, कि उसका फल अमुक ही प्रकार का हो, उसका ध्यान केवल इसी बात पर रहना चाहिए कि वह उस कार्य को उत्तम रीति से एक मनुष्य के समान कर रहा है या नहींं। प्राकृतिक नियमों के अनुसार अथवा ईश्वर की योजना के अनुसार हमें केवल कार्य करने का अधिकार और शक्ति है। हमें यह अधिकार नहीं दिया गया है कि हम अपने कर्म के फलों को अपनी इच्छा के अनुरूप बना लें। इसीलिए भगवद्गीता में श्रीकृष्ण भगवान का उपदेश है -
कर्मण्येवाडधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भू: मा ते संगोडस्त्वकर्मणि।।
यदि प्रत्येक मनुष्य अपने इच्छानुसार कर्म-फल प्राप्त कर सकता तो फिर ऐसे मनुष्य संसार में देखने को भी न मिलते जो करोड़पति होकर भी अंत तक पश्चााताप में लिप्त रहें, अथवा यह कहिए कि प्रत्येक भिखारी रईस हो जाता। सारांश यह है कि सफलता के यथार्थ स्वरूप पर ध्यान देकर ही प्रत्येक मनुष्य को इस जीवन-संग्राम में अपना-अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए।
बहुत से मनुष्य ऐसे होते हैं जो अपने जीवन की सफलता अथवा निष्फलता की कर्साटी उनके प्रति जनसाधारण की राय को मानते हैं। यदि लोग उन्हें अच्छा कहें तो वे अपने जीवन को सार्थक समझते हैं और बुरा कहें तो निरर्थक कहने लगते हैं। परन्तु यह बड़ी भारी भूल है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं हो समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रिय और पूज्य मालूम हो। देखिए, स्वयं श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण जैसे अवतारी पुरूष भी अपने जीवनकाल में सब लोगों को एक ही से प्रिय और पूज्य न थे। उनकी भी निन्दा करने वाले और शत्रु थे ही। ऐसी अवस्था में आश्चर्य नहीं कि किसी मनुष्य के तत्वपूर्ण विचार भी कुछ कमसमझ मनुष्यों को अप्रिय मालूम होने लगें। इसलिए लोगों की टीका टिप्पणी की विशेष परवा नहीं करनी चाहिए। उचित उपाय तो यही है कि यदि हमें सचमुच सुखी और कृतकार्य बनना है, तो दूसरों के अन्याय-संगत और विरोधी विचारों का उल्लंघन करने में तनिक भी संकोच न करना चाहिए। जो मनुष्य सभी लोगों को प्रसन्न करने के प्रयत्न में लगा रहेगा उसकी वही दशा होगी जैसे धोबी के कुत्ते की होती है, जो न घर का होता है न घाट का।
ईश्वर प्रत्येक मनुष्य को कुछ कर्तव्य का भार सौंप कर संसार में भेजता है और उसे उस कार्य को सफलतापूर्वक निभा लेने के लिए आवश्यक अधिकार या योग्यता भी देता है। यह समझ निरी भूल-भरी और अत्यंत हानिकारक है कि कर्तव्य-पालन का अधिकार या योग्यता कुछ विशिष्ट इने गिने लोगों को ही है। प्राय: लोग कहा करते हैं कि ''हम अमुक देशकार्य या सामाजिक सेवा करना चाहते हैं, पर क्या करें हम में योग्यता नहीं, हमारा अधिकार नहीं।ÓÓ ऐसे आत्म-विनाशी विचारों से हमारे तरुण विद्यार्थियों को सदा बचे रहना चाहिए। दृढ़ विश्वास रहे कि हम मनुष्य हैं, और मनुष्य के नातें हमकों अपने कर्तव्य पालन का तथा अपने जीवन को सुखी करने का पूरा अधिकार है। प्रत्येक मनुष्य को पहले इस बात का पता लगाना चाहिए कि ईश्वर ने उसे किस काम के लिए उत्पन्न किया है। जब उसे मालूम हो जाय कि वह अमुक कार्य को करने की स्वाभाविक योग्यता रखता है, तब उसे उचित है कि वह एक क्षण का भी विलम्ब न करके उस महत्कार्य को उत्साह से आरंभ कर दे और अपने परम पिता जगन्नियन्ता से प्रार्थना करे कि ''हे जगदाधार! तेरी इच्छा के अनुसार ही मैंने अपनी जीवन नौका को इस संसार समुद्र में छोड़ दिया है। अब मुझे केवल तेरा ही सहारा है।ÓÓ इतना करने पर वह अपना कर्तव्य करता रहे। फिर ईश्वर भी उसका सच्चा सहायक बन जायेगा। अवश्य ही उसक मनुष्य का अंत में बेड़ा पार होगा। केवल धैर्य की आवश्यकता होगी, क्योंकि उसे समय-समय पर संसार-समुद्र की लहरों और तूफानों का सामना करना पड़ेगा। उसमें उसको अनेक नाशकारी चट्टाने मिलेंगी। यदि उसने इन सब बाधाओं को कुशलता और सहनश्ीलतापूर्वक हटा दिया तो फिर उसका जीवन सफल होगा। ऐसे ही मनुष्य को विजयी कहते हैं। उसी का नाम इतिहास के पृष्ठों को प्रकाशित करता है और लोग उसी को कर्म-वीर, देशभक्त, परोपकारी कहने में अपना गौरव समझते हैं।
यदि तुम्हारा जीवन-निर्वाह करने का धंधा दूसरों से तुच्छ गिना जाता हो तो तुम उसको तुच्छ मत मानो। तुम्हारे लिये यही श्रेयस्कर होगा कि उसे तुम समस्त संसार के सभी कामों में बढ़कर समझो और उसको उसी प्रकार से किया करो जैसे कोई मनुष्य अपने उच्चातिउच्च व्यवसाय को अनुपमेय उत्साह से करता है। तुच्छ या छोटा धंधा करना कोई लल्ला की बात नहीं है। लज्जा तो भीख मांगने और परतन्त्रता में होनी चाहिए। हाँ, यह अवश्य एक लज्जास्पद बात होगी यदि तुम अपने कर्तव्य को स्वयं घृणा और अपमान की दृष्टि से देखोगे। इसके लिए एक अच्छा दृष्टान्त है। विलायत में मिस्टर ग्रे नाम का एक प्रसिद्ध पुरूष था। बचपन में उसकी साम्पत्तिक और व्यावसायिक स्थिति बहुत ही शोचनीय थी। उसके एक मित्र ने उससे एक दिन हंसी में कहा - ''मिस्टर ग्रे! अब तो तुम बहुत बातें करना सीख गये, परन्तु क्या तुम्हें वह बचपन का जमाना याद है जबकि तुम ढोल बजा-बजा कर अपने जीविका चलाया करते थे।ÓÓ प्रिय विद्यार्थियों! देखिए, मि. ग्रे ने इसका कैसा भावपूर्ण और उचित उत्तर दिया है! उसने कहा ''महाशय! मुझे पूर्णतया स्मरण है कि मैं बचपन में किस तरह से उदर-पोषण किया करता था। मैं जानता हूँ कि मैं ढोल बजाया करता था। परन्तु क्या आपको याद है कि मैं किस उत्तम रीति से तथा प्रफुल्लित हृदय से ढोल बजाया करता था?ÓÓ तात्पर्य यही है कि छोटापन या बड़ाापन, तुच्छता या श्रेष्ठता, किसी विशेष व्यवसाय में नहीं है, किन्तु अपने हृदय के उस भाव में है जिससे वह व्यवसाय का काम किया जाता है। सफलता के यथार्थ स्वरूप के विषय में उक्त रीति से विचार करने पर पाठकों को झूठी और सच्ची सफलता का भेद आप ही आप मालूम हो जायेगा।
अब यह देखना चाहिए कि सफलता के लिए और किन-किन गुणों की आवश्यकता है? ऊपर कहा जा चुका हे कि सबसे पहले धैर्य की बड़ी आवश्यकता है। साथ ही साथ जो कार्य हाथ में लिया जाय उसमें पूर्ण उत्साह चाहिए, क्योंकि जिस काम में उत्साह नहीं होता वह बीच में ही छोड़ दिया जाता है। परन्तु धैर्य और उत्साह से भी बढ़कर एक और बड़ा भारी गुण है, जिसके बिना किसी कार्य में मनुष्य को सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। उस गुण का नाम है अपनी आत्मशक्ति अर्थात् कार्य करने की योग्यता पर दृढ़ विश्वास। जब तक निश्चय पूर्वक हमें यह दृढ़ विश्वास नहीं रहेगा कि हममे अमुक काम करने की पूरी योग्यता है तथा उसे हम हर हालत में अवश्य कर सकते हैं, तब तक हमारा मन हमें उस काम के करने में योग नहीं देगा और फलत: हम उसकों कभी पूरा नहीं कर सकेंगे। हाँ, जो मनुष्य उचित मार्ग का अनुसरण करता हुआ भी किसी कारण-वश सफलता नहीं प्राप्त कर सकता उसका फिर कुछ दोष नहीं है। संसार की अंधी आँखों में चाहे वह भले ही अकृत कार्य समझा जाय, परन्तु सहृदय जन उसे ऐसा कभी न समझेंगे। किसी पाश्चात्य कवि ने कहा है जिसका अर्थ यह है कि-
जीवन-संग्राम में पराजित अथवा असफल मनुष्य कौन है? क्या आफत का मारा, परन्तु दीर्घोद्योगी कोलंबस अकृतकार्य कहा जा सकता है? या लिव्हिंग्स्टन को हम एक पराजित मनुष्य कह सतक हैं जिसने जननी जन्मभूमि के हित के लिए अफ्रीका के जंगलों में जन्म भर खाक छानी है? नहीं, ये पराजित नहीं समझे जा सकते, क्योंकि इन्होंने आशारूपी रस्सी के सहारे से, बारम्बार गिरने पर भी आकाश में चढऩे का प्रयत्न किया है। इनका यही व्रत था कि ''कार्य वा साध्येयम् शरीरं वा पातयेयम्।ÓÓ ये तो अपने व्रत-साधन में, अपने प्राणों की आहुति देकर यथार्थ में कृतार्थ और सफल हो गये। असफल और पराहित मनुष्य वही है जिसने गिरने के डर से कभी खड़े होने का प्रयत्न तक नहीं किया। अहा! क्या ही उत्तम उक्ति है। विचारने की बात है कि जो अपनी इष्ट-सिद्धि को पूर्ण करने के प्रयत्न में लगे रहने पर भी जावेगा, वह सच्चा कर्म-वीर धन्य है, या वह आलसी गीदड़ धन्य होगा जो असफलता रूपी राक्षसी का नाम सुनते ही डर जाता है और किसी भी कार्य का आरंभ नहीं करता।
सफलता के विषय में खरगोश और कछुवे की कहानी पाठकों से छिपी नहीं है। पढऩे वाले का आश्चर्य होता है कि इतना मन्दागामी कछुआ ऐसे शीघ्रगामी खरगोश से दौडऩे में कैसे जीत गया। परन्तु इसी बात को समझने में हमको सफलता रूपी कुंजी मिल सकती है। कहानी बतलाने वाले ने कछुवे को मंद परन्तु कभी न थकनेवाली महान शक्ति का स्वरूप माना है और खरगोश से उस व्यक्ति का नमूना देख पड़ता है जो अधिक शक्ति होने पर भी किसी कार्य को अहं-भावपूर्वक तुच्छ समझ कर बीच में परित्याग कर देता है। बस, इस छोटी सी कहानी में ही सफलता का पूर्ण तत्व विद्यमान है। इसलिए अपने जीवन को सफल करने की इच्छा रखने वाले इस जीवन-संग्राम में विजय प्राप्ति की कामना करने वाले प्रत्येक युवक और तरुण विद्यार्थी को उचित है कि वह हजार बाधाओं के रहते हुए भी अपनी इष्टसिद्धि के लिए सदा प्रयत्न करता रहे, फिर सफलता उसकी दासी बनकर उसके पैरों तले लौटेगी।
बहुतेरे मनुष्य पहले अपने कार्य को बड़े उत्साह के साथ आरंभ किया करते हैं, परन्तु थोड़ी भी बाधा आने पर वे उसे छोड़ बैठते हैं। यथार्थ में देखा जाय तो बाधारहित सफता में कुछ भी स्वाद नहीं रहता। मिठाई खाते-खाते आप फिर से मिठाई खाइए तो आपको उसमें कुछ विशेशता या अपूर्व स्वाद नहीं मिलेगा परन्तु यदि कुछ कटु पदार्थ के खाने पर आपको मिठाई दी जायेगी तो आपको सचमुच मालूम हो सकेगा कि मिठाई और मीठापन क्या वस्तु है। यही हाल सच्ची सफलता और विध्न बाधाओं के पारस्परिक संबंध का है। जिस मनुष्य को अपने इष्टकार्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न करने में विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है वही सफलता के सच्चे मर्म को जान सकता है। जिसने स्वप्न में भी विघ्न-बाधाओं की सूरत नहीं देखी वह सफलता के रहस्य को जान नहीं सकता। एक श्लोक में भर्तृहरि ने कार्यशीलता और सफलता के विषय में तीन प्रकार के मनुष्यों का वर्णन किया है। वह श्लोक यह है -
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै:
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्या:।
विघ्नै: पुन: पुनरपि प्रतिहन्यमाना:
प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति ।।1।।
अर्थात् नीच पुरूष विघ्नबाधाओं के भय से कार्य का आरंभ ही नहीं करते। उनमें इतना साहस ही नहीं होता। जो मध्यम पुरूष हैं वे बड़ी कठिनाई से कार्य का आरंभ तो कर देते हैं, परन्तु थोड़ा सा धक्का लगने पर वे उस कार्य को तिलांजलि दे बैठते हैं। इन लोगों की गणना उत्तम पुरूषों में नहीं हो सकती। उत्तम पुरूष कहलाने का दावा तो वे ही रखते हैं जो सहस्र बार बाधाओं के आने पर उस कार्य को करने के लिए कोटि बार उद्यत रहें-जो उस कार्य को अंत तक निभा लें। बस सफलता ऐसे ही सत्पुरूषों के कार्यों को अलंकृत किया करती है- ऐसे ही महात्मा सफल मनोरथ हुआ करते हैं।

सच्ची और झूठी सफलता

लेखक
पं. माधव राव सप्रे
संपादन
डॉ. तृषा शर्मा

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