समुच्चयी सामंजस्य के सृजनधर्मी - पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी

भारत की पावन धरती पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लेकर अपने सत्कार्यों से अमरता प्राप्त की है। उन महापुरुषों में कुछ वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ शामिल किए जा सकते हैं। बीसवीं सदी में जिन महापुरुषों ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की हमारी देशवासियों पर अमिट छाप छोड़ी है, उनमें पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का साहित्यिक व्यक्तित्व सदैव स्मरण किया जाएगा।
पं. त्रिवेदी असाधारण प्रतिभा के धनी तथा इन्द्रधनुषी व्यक्तित्व के वंदनीय महापुरुष थे। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र तथा हिंदी के हित में होम हो गया। मोम की भांति तिल-तिल जलकर जग को आलोकित कर सकने का उनमें अदम्य साहस था। उनका व्यक्तित्व महान था। उनका आचार-विचार रहन-सहन, उनका स्वभाव उनकी संवेदनशीलता, उनकी सादगी, उनकी उदारता उनके जीवन के दुर्लभ गुण थे। जो भी उनके संपर्क में आता उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता।
पं. त्रिवेदी जी का समय तिलक युग तथा गांधी युग था। अत: उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, देशभक्ति तथा स्वदेशी भावना के तत्वों का प्राचुर्य है। त्रिवेदी जी पर गांधीवाद और राष्ट्रवाद का गहरा प्रभाव रहा। वे मध्यप्रदेश विशेषकर छत्तीसगढ़ क्षेत्र की पुरानी पीढ़ी के उन लोगों में से हैं, जिन्होंने साहित्य और पत्रकारिता दोनों के माध्यम से एक साथ सामाजिक चेतना फैलाते हुए स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा प्रदान करने में सहयोग दिया।
तात्कालीन परिवेश एवं राष्ट्रवादी पारिवारिक वातावरण में पं. त्रिवेदी जी ने अपने कृतित्व का सफर शुरु किया। बचपन से ही वे अध्ययन प्रेमी थे। बाल साहित्य, अंग्रेजी, हिंदी, पत्रिकाओं का अध्ययन में उनकी रूचि रही संभवत: उसी से उनके कृतित्व का विकास हुआ। त्रिवेदी जी ने साहित्य के लगभग सभी विधाओं में सृजन किया पर मूलत: उनका रूप कवि का है। उनकी कविताओं का मूल स्वर राष्ट्रीय है। वे साहित्य और पत्रकारिता के पथ पर चलकर सीधे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ जाते हैं।
पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने 1942 की क्रांति को कविताओं में कई आयामों में अभिव्यक्त किया है,
'बयालिस का संघर्षÓ शीर्षक कविता 1942 की क्रांति पर लिखी गई है, इसमें त्रिवेदी जी ने स्वतंत्रता संग्राम में आम जनता की सहभागिता और गांधी जी के प्रभाव का वर्णन किया है। त्रिवेदी जी की कविताएँ जमीन से जुड़ी हुई हैं, उन्होंने अपनी कविताओं में गुलाब शंकर, भोला जैसे उन तरुणों की राष्ट्रीय सेवाओं को भी रेखांकित किया है, जो कि अब किसी की स्मृति में नहीं है। इसी तरह 'बलिपथ का इतिहासÓ एक ऐसी काव्य रचना है, जो राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत है, तथा उन शहीदों का गाथागान है जिन्होंने देश के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।
देश को आजादी दिलाने में साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा है, इतिहास गवाह है कि कलम के सिपाहियों ने जो राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाई उसकी मिसाल हिन्दी भाषा और साहित्य में है। त्रिवेदी जी की कविताओं में वे जोश है, जो नौजवानों को देश के लिए मर मिटने को प्रेरित करती रही है। उन्होंने युवकों को प्रेरणा देते हुए उनमें आजादी का जोश भरने का भरपूर प्रयास किया।
त्रिवेदी जी का मानना था कि जब तक त्याग और बलिदान के लिए तैयार नहीं रहेंगे, तब तक सफलता नहीं मिल सकती। उनके इन मनोभावों को 'बलिदान न कोई रोक सकाÓ कविता में स्वत: ही देखा जा सकता है।
पं. त्रिवेदी की प्रारंभिक कविताएँ अंग्रेजों के अत्याचार, आतंक और जनविरोधी भावनाओं के कारण प्रस्फुटित हुई। समय के साथ-साथ वे स्वयं चलते रहे तथा भारत माँ की दासता की बेडिय़ाँ काटने में उनकी कविता रूपी तलवार ने पूर्ण सहयोग दिया है। वे सजग प्रहरी के समान अपनी कविताओं के माध्यम से देश को निद्रा से जगाते रहे। इस तरह राष्ट्रीय चेतना जगाने में एक कवि तथा साहित्यकार के रुप में पूर्ण योगदान दिया। देश को आजादी दिलाने में जो योगदान मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर आदि राष्ट्रीय कवियों का है, वही योगदान पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का भी है।
पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी एक ऋषि तुल्य थे, उनमें पत्रकार, संपादक, समाजसेवक और देशभक्त का समुच्चयी सामंजस्य विद्यमान था।

श्रीमती सीमा चंद्राकर
सहायक प्राध्यापक
गुरुकुल महिला महाविद्यालय
रायपुर (छ.ग.)

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