सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता

डी.के.पांडेय
राजभाषा हिन्दी - अनुवाद एवं तकनीकी समावेश की सार्थकता
स्वातंत्र्योत्तर भारत में स्वाधीनता और स्वावलम्बन के साथ-साथ स्वभाषा को भी आवश्यक माना गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गाँधी जी ने खुले शब्दों में कहा कि 'प्रांतीय भाषा या भाषाओं के बदले में नहीं बल्कि उनके अलावा एक प्रांत से दूसरे प्रांत का संबंध जोडऩे के लिए एक सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता है। ऐसी भाषा तो एकमात्र हिन्दी या हिन्दुस्तानी ही हो सकती है।Ó राजभाषा के संबंध में संविधान सभा के सदस्यों ने काफी चिंतन-मनन किया। तदनुसार 14-09-1049 को देवनागरी में लिखित हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया हमारा संवैधानिक दायित्व है। इस दायित्व की पूर्ति हमारी निष्ठा पर निर्भर करती है। हम सरकारी कार्यों से संबंधित लक्ष्यों को जिस तरह हासिल कर रहे हैं, उसी तरह हिन्दी प्रयोग संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भी हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
राजभाषा स्वीकार ने का मुख्य उद्देश्य है कि जनता का काम जनता की भाषा में संपन्न हो। प्रशासन की भाषा एक अलग की भाषा होती है जो सीधे-सीधे अपने विषय पर बात करती है। उसमें साहित्यिक या क्लिष्ट भाषा शैली के लिए कोई स्थान नहीं होता। अत: सरल हिन्दी का प्रयोग करते हुए हम राजभाषा के प्रयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। उच्चारण के लिए भी शब्दकोश देखने की आवश्यकता पड़ती है। अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग रटनी पड़ती है, जबकि हिन्दी के शब्दों की वर्णमाला-स्वर व व्यंजन तथा बारह खड़ी को रटने से हिन्दी के किसी भी शब्द को पढऩा-लिखना हो जाता है। यही कारण है कि हिन्दी में किसी भी भाषा को लिखना या उसका उच्चारण करना सरल होता है। इस तथ्य की पुष्टि इस बात से भी होती है कि 'माइक्रोसॉफ्टÓ के मालिक बिल गेट्स ने हिन्दी भाषा और लिपि को विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में सबसे अधिक वैज्ञानिक माना है। सरकारी काम-काज में हिन्दी के प्रयोग के क्षेत्र में प्रगति हुई है, किंतु अब भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सके हैं। सरकारी कार्यालय में हिन्दी का प्रयोग बढ़ा है किंतु अभी भी बहुत सा काम अंग्रेजी में हो रहा है। राजभाषा विभाग का लक्ष्य है कि सरकारी कामकाज में मूल टिप्पण और प्रारूपण के लिए हिन्दी का ही प्रयोग हो। यही संविधान की मूल भावना के अनुरूप भी होगा, आज भी सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिन्दी का कार्य अनुवाद के सहारे चल रहा है। प्राय: अनुवाद भाषा को कठिन बनाता है। इसका कारण दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ की कमी या अनुवादक को हर विषय-क्षेत्र की गहन जानकारी नहीं होना है। वैसे भी किसी को हर क्षेत्र की पूरी जानकारी होना संभव भी नहीं है।
चिकित्सा, अभियांत्रिकी, पारिस्थितिकी, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न विषयों में होने वाले विकास व अनुसंधान के फलस्वरूप रोज नई संकल्पनाएं जन्म ले रही हैं, नए शब्द गढ़े जा रहे हैं। चूँकि इन विषयों में रोज़ नए अनुसंधान विश्व के कोने-कोने में विभिन्न भाषाओं में हो रहे हैं अत: इनका साहित्य और उपलब्ध जानकारी मूल रूप से हिन्दी में मौजूद नहीं है। इसके फलस्वरूप, बदलते वैश्विक परदिृश्य में अनुवादकों की भूमिका काफी बढ़ गई है। इन नए विषयों का अनुवाद करते समय अनुवादकों के लिए मात्र स्रोत भाषा व लक्ष्य भाषा पर ही पकड़ काफी नहीं है अपितु उनके लिए विषय का भी पुरा ज्ञान जरूरी है। परंतु, यह व्यावहारिक भी नहीं है कि अपेक्षा की जाए कि एक अनुवादक विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि सभी विषयों में पारंगत हो। निस्संदेह यह पूर्णत: अनुवादक की प्रतिभा पर निर्भर करता है कि वह जिस भाषा से और जिस भाषा में अनुवाद कर रहा है उन भाषाओं पर उसका कितना अधिकार है और इन भाषाओं की अनुभूतियों में वह कितनी तारतम्यता कायम रख सकता है। यहाँ यह जरूरी है कि विषय को समझने के लिए अनुवादक को उस विषय से संबंधित विशेषज्ञ की सहायता ले लेनी चाहिए क्योंकि विषय ज्ञान के बिना अनुवाद में प्राण नहीं फूँके जा सकते। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि अनुवाद ऐसे विषय विशेषज्ञ से कराया जाए जिसे स्रोत भाषा व लक्ष्य भाषा का भी पूरा ज्ञान हो। ऐसे तकनीकी साहित्य का अनुवाद करने के लिए उन्हें अच्छा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा हो पाता है तो इससे विषय की मौलिकता बनी रहेगी।
कार्यालयी भाषा की दृष्टि से एक सफल अनुवादक वही है जो अनूदित पाठ को सरल व स्पष्ट बनाए रखे। उसे किसी विषय को स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त वाक्य जोडऩे से परहेज नहीं करना चाहिए। कभी-कभी अंग्रजी के एक शब्द को स्पष्ट करने के लिए पूरा एक वाक्य भी देना पड़ सकता है। इसे भाषिक संप्रेषण क्षमता की कमी नहीं समझना चाहिए। दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा के पूरे वाक्य के लिए हिन्दी भाषा का एक शबद ही पर्याप्त हो। भाषा का स्वरूप निर्धारित करते समय यह ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि पत्र या प्रारूप किस व्यक्ति को संबोधित है। उस व्यक्ति की सामाजिक, पदीय स्थिति और हिन्द भाषिक योग्यता के अनुरूप ही शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। छोटे-छोटे वाक्य लिखना सुविधाजनक होता है और वैसे भी कई उपवाक्यों को मिलाकर एक वाक्य की रचना करना हिन्दी की प्रकृति नहीं हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी के परिवेश में हिंदी भाषा ने अपना स्थान धीर-धीरे प्राप्त कर लिया हैं। अब हिन्दी की उपादेयता पर कोई भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता। सूचा प्रौद्योगिकी विभाग ने हिन्दी के लिए विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर विकसित किए हैं। 'मंत्र-राजभाषाÓ एक मशीन साधित अनुवाद टूल हैं जो विशिष्ट विषय-क्षेत्र के अंग्रेजो पाठ का हिन्दी में अनुवाद करता हैं। 'मंत्र-राजभाषाÓ के संबंध में लोगों के मध्य यह भ्राँति है कि यह अनुवादकों का पूरक हैं परंतु ऐसा नहीं है क्योंकि मंत्र-राजभाषा साफ्टवेयर अनुवादकों की सहायता के लिए बना है। अनुवादक उसकी मदद से किए गए अनुवाद का पुनरीक्षण कर अपना कार्य आसानी से एवं शीघ्रता से कर सकता है। सी-डैंक, पुणे के इंजीनियर राजभाषा विभाग के साथ मिलकर इस सॉफ्टवेयर को और बेहतर एवं स्वीकार्य बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इंटरनेट के क्षेत्र में हिन्दी किसी भी मायने में अंग्रेजी से पीछे नहीं हैं। कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते समय अक्सर लोगों को (ङ्खशह्म्स्र, श्व3ष्द्गद्य, क्कश2द्गह्म् क्कशद्बठ्ठह्ल) आदि में तैयार किये गये दस्तावेजों में प्रयोग किए जाने वाले फोंट्स की इनकम्पौबिलिटि के कारण दस्तावेजों स्थानांतरण / विनिमय की समस्या का सामना करना पड़ता है।
यह समस्या मानक भाषा इनकोंडिग को प्रयोग न करने से पैदा होती है। यूनिकोड इनकोडिग़ को सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मानक के रूप में मान्यता दे दी गई है। जैसे किसी अंग्रजी फोंट में कंप्यूटर पर तैयार / उपलब्ध फाइल को दूसरे कंप्यूटर पर अंग्रेजी फोंट में देखा जा सकता है उसी प्रकार अब यूनिकोड इनकोडिग़ के जरिए विंडो-2000 एवं उसके बाद वाले विंडोज ओ.एम. में सहजता से हिन्दी में कार्य कर सकते हैं। यूनिकोड समर्थित फोंट्स में बनी स्रशष्, 3द्यह्य, व श्चश्चह्ल फाइल किसी भी यूनिकोड समर्थित कंप्यूटर पर देखी व संशोधित की जा सकती है। इस कंपैटिबलिटी के लिए आवश्यकता केवल यह है कि हम कोई भी वह फोंट प्रयोग करें जो यूनिकोड समर्थित हो और जो भी सॉफ्टवेयर प्रयोग करें वह यूनिकोड को सपोर्ट करता हो। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग व राजभाषा विभाग द्वारा कंप्यूटर पर हिन्दी प्रयोग को सरलता, कुशलता व प्रभावी ढंग से करने के लिए पर्याप्त संसाधन व समाधान उपलब्ध कराये जा चुके हैं। ये सॉफ्टवेयर सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की वेबसाइट (// द्बद्यस्रष्. द्दश1 द्बठ्ठ/द्धद्बठ्ठस्रद्ब/द्धस्रश2ठ्ठद्यशड्डस्र द्धद्बठ्ठस्रद्ब द्धह्लद्व) व राजभाषा विभाग की वेबसाइट (222.ह्म्ड्डद्भड्ढद्धड्डह्यद्धड्ड. त्रश1.द्बठ्ठ) से नि:शुल्क डायनलोड किए जा सकते हैं। निस्संदेह, हिन्दी ही ऐसी भाषा हैं, जो पूरे देश को एकसूत्र में बाँध सकती हैं और हिन्दी में काम करना राष्ट्र सेवा का ही एक रूप है। स्वतंत्रता सेनानी व कवि राम प्रसाद बिस्मिल की इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी कलम को विराम देना चाहूँगा-
लगा रहें प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखूँ हिन्दी
चलन हिन्दी चलँू, हिन्दी पहरना, ओढना खाना
भवन में रोशनी मेरे रहे हिन्दी चिरागों की
स्वदेशी ही रहे बाजा, बजाना, राग का गाना

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