सर्वाधिक प्रभावकारी भौगोलिक पदार्थ तत्व जलवायु

जलवायु का कृषि पर प्रभाव - जीव व वनस्पति किसी भी चल व अचल पदार्थ पर अपना गहरा प्रभाव डालने वाला तत्व है जलवायु। भौगोलिक पदार्थ में सर्वाधिक प्रभाव कारी तत्व जलवायु है। दीर्घकालीन वायुमंडलीय घटनाओं को जलवायु की संज्ञा दी जाती है।
मौसम और ऋतु से मिलकर जलवायु का श्रृजन होता है। मौसम जलवायु की अल्पकालिक घटना है और जलवायु किसी स्थान की दीर्घकालिन वायुमंडलीय घटना है जिसका प्रभाव सभी पदार्थ पर पड़ता है।
आज हम देख रहे हैं कि चहु ओर जलवायु परिवर्तन की बात सुनाई पड़ती है और दृष्टिगोचर भी होता है। क्योंकि प्रकृति का एक नियम है कि जैसे ही ताप की वृद्धि होती है तो इसका प्रभाव धरातल पर होने लगता है। और धरातल के गर्म होने से ऊंचस्थ पर्वतों में स्थित बर्फ पिघलने लगते हैं और धरातल पर इसका प्रभाव दिखने लगता है। लेकिन यह सब प्रकृति के नियम के अनुरुप ही होता है। आदिकाल से आजतक हम देखें तो हमारी पृत्वी की जलवायु कई बार गर्म और कई बार ठंडी हो चुकी है प्रृति अपने आपको मैनेज (कंट्रोल) कर चलती है और ठंड, गर्म का यह वातावरण समय तक प्रभावी रहता है। आज हम सभी तरह जलवायु परिवर्तन की बातें सुनते हैं। यह जलवायु लगभग 120 वर्ष या 125 वर्ष तक एक सा बना रहता है। बाद में जलवायु बदलती है।
वैज्ञानिक बतलाते हैं कि विगत 100 वर्षों में 6 सेंटीग्रेट ताप बढ़ गयी है क्योंकि वैश्विक परिवेश में ध्यान देवे तों किसी देश में दिन तो किसी देश में रात्रि होती है। इसका प्रभाव जलवायु और सभी पदार्थों पर दिखाई पड़ता है।
विगत 10 वर्षों से ष्ट०२ की मात्रा बढ़ी है और लगातार बढ़ रही है वायुमंडल में ध्यान देवे तो गैसों की स्थिति एक सी नहीं है। नाईट्रोजन की मात्रा 78 प्रतिशत, ऑक्सीजन की मात्रा 21 प्रतिशत और अन्य गैसे हिलियम और कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा 0.3 प्रतिशत बतलायी जाती है। लेकिन आज की स्थिति में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा 0.6 प्रतिशत हो गई है।
सन् 1970 के बाद तापमान बढ़ रही है। और तापमान हर महीने बढ़ रही है। तापमान आती है और वह वापस भी वायुमंडल में चली जाती है लेकिन ताप कहीं ना कहीं संचित होकर रह जाती है और जितना ताप पृथ्वी को प्राप्त होता है वह उसे पूरा ताप परिवर्तित नहीं करती है। यहीं संचित ताप पृथ्वी के ताप वृद्धि का कारण है।
विश्व स्तर पर यह बात कही जाती है कि तापमान बढऩे का एक मात्र कारण प्रदूषण एवं ष्ट०२ (कार्बनडाईऑक्साइड) की मात्रा का बढऩा है। इसे बढ़ाने में बारत का प्रथम स्थान है। ऐसा विदेशियों का मानना है कि क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि कार्य करने से ष्ट॥४ (मिथेन) का निर्माण ज्यादा होता है अत: ष्ट॥४ की मात्रा भारत बढ़ा रहा है, इस कारण तापमान में वृद्धि हो रही है ओर वही जलवायु परिवर्तिन का कारण सिद्ध हो रहा है। भारत में पंजाब, हरियाणा और तामिलनाडू में इसकी मात्रा सर्वाधिक (लगभग 14.3 प्रतिशत) है लेकिन असिंचित क्षेत्र होने के कारण छयगय में मिथेन की मात्रा कम पायी जाती है।
कार्बन की मात्रा गाय की गोबर से बढ़ती है ऐसा विदेशी लोग तर्क देते हैं। आज भारत में लगभग 2 करोड़ गाय की संख्या है। इस कारण मिथेन की मात्रा बढ़ रही है और ऐसा कर भारत विश्व को संकट में खड़ा कर रखा है। ऐसी इनकी मान्यता है।
उपरोक्त सभी कारणों से तापमान बढ़ता जावेगा। और एक वर्ष में लगभग 6 डिग्री तापमान बढ़ जायेगा। अत: धरातल के बर्फ पिघलकर पृथ्वी पर आ जावेगा 2004 से 2009 तक ताप में व्यापक वृद्धि देखी गयी हैं। और विद्वान मानते हैं कि यदि ऐसी ही ताप वृद्धि दर रही तो 2041 तक पूरा गैशियर (बर्फ) पिघल जावेगा।
आज देंखें तो केदारनाथ, गंगा, गंगोत्री का जलस्तर बढ़ रहा है। विद्वानों के मतानुसार इसी ताप वृद्धि दर के कारण बंग्लादेश (ढाका) और निदरलैंड (हालैंड) ये सभी देश सागर में डूब जावेगा।
सागर से नमक की खेती होती है वह भी प्रभावित हो सकती है। रामेश्वरम के पास धनुषटंकार नामक क्षेत्र उभरा हुआ था वह अब डूब गया है।
आज की स्थिति देखे तो रायपुर में 19 जून को मानसून आया और 6 जुलाई को बारिश हुई। यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तव को प्रदर्शित करता है। मौसम विज्ञानी बताते हैं दो तीन दिनों में 50 मि.मी. पानी आनी चाहिए वर्षा की मात्रा कहीं घट रही है तो कहीं बढ़ रही है। विस्तार के भी यही स्थिति बनी हुई है।

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