सौन्दर्य बोध का एक नया आयाम

बीना क्षत्रिय
समकालीन भारतीय नेपाली
कविता का सौन्दर्य
भूमिका:-
अधिकांश विद्वान ई. 1990 को समकालीन भारतीय नेपाली लेखन प्रस्थान बिन्दु के रुप में देखते हैं क्योंकि इसी समय से समाजशास्त्र एवं अन्य स्रोतों के माध्यम से समकालीन चिंतन एवं प्रयोग का नेपाली भाषा-साहित्य में समावेश हुआ। क्षेत्रीय और वैश्विक परिवर्तन, राजैतिक उतार-चढ़ाव, आर्थिक उदारीकरण से उत्पन्न व्यवसायिक भूमंडलीकरण और इसके प्रभाव से निर्मित उत्तर औपनिवेशक परिस्थिति, साइबर टेक्नोलॉजी और नई मशीनी मानव संसार, उत्तर आधुनिक चिंतन अवधारणा से प्रभावित मानव चेतना ही समकालीन लेखन के मुख्य चिंतन का आधार या स्रोत बना। यही चेतना समकालीन भारतीय नेपाली कविता के सौन्दर्यबोध की प्रेरक और उपलब्धि साबित हुई। संक्रमण लेखन (सन् 1995), विचलन लेखन (2008), किनारीकरण (हाशियेकरण) का लेखन (2008) आदि कविता के समकालीन सौन्दर्यबोध के अनुसंधान में समर्पित लेखन अभिमान है। इस समय साहित्य और कला के क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति की भावना के प्रबलता के कारण कविता पाठधर्मी हुई और पाठक कविता में एक सशक्त सहभागी के रुप में सामने आया। बहुलतावादी समकालीन लेखन में वैश्विक अर्थ के लिए स्थान और अवकाश को उदारपूर्वक विस्तार मिला। समकालीन नेपाली कविता का सौन्दर्य चिंतन वास्तविक रुप से क्षेत्रीय, प्रान्तीय, सीमान्तीय, जनजातीय और जन-सांस्कृतिक चेतनाओं से पुष्ट हुआ है।
समकालीन नेपाली कविता का कथ्य सौन्दर्य:-
समकालीन भारतीय नेपाली कविता में बहुआयामिक सृजनशीलता के प्रति गहरे आग्रह का भाव मिलता है तथा कविता में सभी विषयों और विचारों के बाह्य एवं आंतरिक द्वन्द की व्यापक अभिव्यक्ति हो रही है। इस समावेशी प्रवृत्ति के कारण भारतीय नेपाली कविता को एक विशेष स्वरुप प्राप्त हुआ है। आज राजनीति सहज रुप से कवि कर्म का विषय बन गई है। राजनीति जैसा व्यवहारिक ज्ञानानुशासन और मानव जाति की बुनियादी सरोकारों को समकालीन नेपाली कविता में विशेष सौन्दर्य चेतना के रुप में अपनाया गया है। समकालीन नेपाली कविता राजनीति की छद्म बयानबाजी न होकर एक ईमानदार आलोचनात्मक प्रतिपक्ष की भूमिका मेंं दिखाई देती है। रेमिका थापा की कविता की एक पंक्ति इस प्रकार है-
''आम बजट के मसौदे में मेरे नाम पर बहस कब शुरु होगी? सदैव ''अन्यÓÓ की पंक्ति में खड़ा लोकतंत्र के इस संपूर्ण संज्ञा पर राष्ट्रीय बहस कब से शुरु होगी? ÓÓ
वास्तव में समकालीन भारतीय नेपाली कविता आधुनिकता विशिष्ट केंद्रवाद से मुक्त होकर सामाजिक समृद्धवाद की ओर उन्मुख है। इसलिए इसमें सामूहिक सौन्दर्यवाद की चेतना प्रबल है। समावेशी प्रवृति की प्रधानता के कारण ही समकालीन कविता में रूढि़वादी समाज द्वारा थोपी गई वर्जनाओं, निषेधों, अमान्यताओं आदि के प्रति विरोध का स्वर तेज है। अच्छा-बुरा, सुंदर-कुरुप, श्लील-अश्लील, नैतिन-अनैतिक आदि मूल्यों की आदर्शवादी व्याख्या को निरस्त करती हुई एक नई व्याख्या का प्रस्ताव भी आज की कविता में सौन्दर्य बोध का एक नया आयाम आविष्कृत करती है। मनुष्य की नैसर्गिक इच्छा, आकांक्षाओं का बिंब भी समकालीन कविता में पुनर्मूल्यांकन और पुनस्र्थापना के पाठ को जोडऩे में प्रवृत्त दिखाई देते हैं।
निम्न और वर्जित समाजों के सौन्दर्य की खोज समकालीन भारतीय नेपाली कविता की नई उपलब्धि है। व्यवस्था के अधिकारिक मुख्य धारा से अमान्य और बहिष्कृत किया गया अल्प संख्यक समुदाय, युद्ध पीडि़त, शरणार्थी, निम्नवर्ग, नारी, बालक, वृद्ध, अपंग आदि समकालीन कविता के प्रतिपाद्य विषय बन चुके हैं। किनारीकरण के समाज पर आधारित लेखन अभियान (2008) की अवधारण्य में निम्न और वर्जित-बहिष्कृत समाजों के सौन्दर्य पर काफी विचार-विमर्श किया गया है। समकालीन भारतीय नेपाली कविता में हाशिये के समाज के संघर्षों के कटु यथार्थ को चित्रित किया गया है। हाशिये के लोगों का इतिहास, भूगोल, राजनीति, संस्कृति आदि विविध आयामों के संबंध में समकालीन कविता सृजनशील है। भारत में नेपाली जाति एक अल्पसंख्यक समुदाय है जो अपने ही देख की मुख्य धारा द्वारा आधिकारिक मान्यता के लिए संघर्षरत है। उनके आत्मसंघर्ष और युग संघर्ष को कवियों ने लेखन का बुनियादी दायित्व और सरोकार के रुप में स्वीकार किया है जिसे उत्तर औपनिवेशिक सौन्दर्य शास्त्र के आधार पर अध्ययन किया जा रहा है। कवि मनप्रसाद सुब्बा भारत के विशाल संघीय लोकतंत्र और मुख्यधारा में अपने जातीय अस्तित्व और राष्ट्रीय पहचान की खोज कुछ इस तरह करते हैं- ''अपने चेहरे पर देश का मानचित्र चिपकाकार मैं देश का परिचय लिए चल रहा, चलता ही रहा... लेकिन मेरा परिचय देश के मानचित्र में चिपका ही नहीं क्यों?ÓÓ
समकालीन भारतीय नेपाली कविता में वैस्थानिक (वैश्विर+स्थानिक) चेतना तीव्र रुप में प्रकाशित है। कविता अपने निजी स्थानिकता और आत्मीयता के प्रति गंभीर रुप से आग्रही है तो उतना ही उत्तरदायी रुर में वैश्विक चेतना के प्रति सचेत है। कविता में कवि का निजी मूल्य मान्यताओं और लोकतांत्रिक सौन्दर्य की सुगंध पाई जाती है तो इन मूल्यों के वैश्विक विस्तार से वैस्थानिक सौन्दर्य की खोज की गई है।
समकालीन भारतीय नेपाली कविता की लेखकीय प्रतिबद्धता मानव से लेकर मानवेत्तर जगत तक विस्तृत है। आज के कवियों ने प्रकृति के लिए भी कविताएं लिखी हैं। आज विश्व की ज्वलंत समस्या के रुप में पर्यावरण संकट को कवियों ने अपने सृजन दायित्व के रुप में स्वीकार किया है. कविता में मनुष्य की संवेदनाओं की उर्वरता की वृद्धि के प्रति, मनुष्य के कम परपीड़क होने के प्रति और अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमाबद्ध रखने के प्रति गंभीर आग्रह रखा गया है। इस संबंध में भूपेंद्र सुब्बा की कविता इस प्रकार है:-
केवल घूमता है सिर/पंखा और पंखा/सिर
नींबू की तरह
दो भाग करके
हरामी विचारों से
निचोड़-निचोड़ कर रखी गई है
पृथ्वी...
बेहद बढ़ गया है तापमान
सूखे से ग्रस्त शरीर
मुश्किल से खड़ा है
कमजोर मेरुदंड पर
सिर से टपककर गिर पड़ती है
पृथ्वी...
समकालीन भारतीय नेपाली कविता का कथन सौन्दर्य:-
समकालीन भारतीय नेपाली कविता के कथन कौशल ने सभी आदर्शवादी और रोमांटिक औपचारिकताओं को निरस्त कर दिया है। अत्यंत औपचारिक, स्वाभाविक और सरल प्रकार के कथन के अन्त: तह में कविता तत्व को संप्रेषित करना समकालीन नेपाली कविता का कथन सौन्दर्य है। इस प्रकार का कौशल स्वयं में चुनौतीपूर्ण है क्योंकि सरल कथन द्वारा कला का उत्कृष्ट स्वरुप निर्माण कर पाना खतरनाक कसौटी है। कविता कथन के इस कौशल का एक मात्र अभीष्ट ''जन-संस्कृतिÓÓ को कविता में समावेश कर पाना है क्योंकि सौन्दर्य रचना की इसी शिल्प के द्वारा एक प्रखर बौद्धिक एवं उच्च-संवेदनशील पाठक और एक सामान्य मानसिकता के पाठक दोनों को अपने-अपने स्तर में प्रभावित कर पाना संभव है। इस वजह से समकालीन कविता में अनावश्यक बिंब, प्रतीक, अलंकार, मिथ आदि का प्रयोग कम हो गया है और भव्य शब्दों का आतंक भी समाप्त माना गया है।
उपसंहार:-
इस प्रकार समकालीन भारतीय नेपाली कविता सौन्दर्य रचना के उच्च अवस्था में सृजनरत है और कविता इस सौन्दर्यबोध द्वारा सर्वसमावेशी ''जन संस्कृतिÓÓ के निर्माण में प्रतिबद्ध दिखाई देती है।

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