हाजिर है पुरातन शैली का नक्काशीदार फर्नीचर

घरों में फर्नीचर की सजावट के लिहाज से जब से कथित 'नया जमानाÓ आया है, नक्काशीदार फर्नीचर बनने और मिलने बंद हो गए हैं। पुराने अमीर-उमराव या पारसियों के घरों में तो आपको ऐसे फर्नीचर मिल जाएंगे, परंतु नवधनाढ्य या उच्च मध्यमवर्गीय लोग जो रेडीमेड फर्नीचर लेते हैं, वे आधुनिक डिजाइन के होते हैं- सीधे-सीधे हत्थे और चपटी पीठ वाले। आंशिक परिवर्तन को छोड़ दें तो ज्यादातर एक जैसे ही दिखते हैं। पुरातन पद्धति के नक्काशी किए हुए फर्नीचर ढूंढे नहीं मिलते। अब अगर कोई बनवाना चाहे तो मुंबई में उनका कारीगर मिलना मुश्किल है। ज्यादातर लोग मशीनों से सीधी कटाई-छंटाई करते हैं ताकि कम समय में ज्यादा से ज्यादा फर्नीचर बन और बिक सके। फिर भी किसी को ऐसे फर्नीचर की तलाश है तो निराश होने की जरूरत नहीं है। बांद्रा के एस.वी. रोड पर अब भी ऐसी 10-12 दूकानें बच गई हैं (दूकानें कहां, वे तो सड़क किनारे के झोपड़े हैं), जहां ऐसे कारीगर मौजूद हैं जो हाथ की कला के आधार पर ऐसे फर्नीचर के फ्रेम बनाकर आपको दे सकते हैं। अगर आप में फ्रेम बनने तक 15-20 दिन गुजारने, उसे उठाकर पॉलिश कराने तथा कपड़ा-गद्दी मढ़ाने का धैर्य व समय (साहस भी) है तो आफका घर पुरातन शैली के आलीशान फर्नीचर से संवर उठेगा। बड़े शो रूमों में अगर आप ऐसा फर्नीचर बनवाने जाएं तो आपको कम से कम ढाई गुना ज्यादा राशि देनी पड़ेगी। यहां कम कीमत का फर्नीचर मिलने का प्रमुख कारण यह है कि यहां पुरानी लकड़ी से यह फर्नीचर बनता है। जब पुराने मकान गिराए जाते हैं तो उसकी लकडिय़ां बेच दी जाती हैं। मुंबई के दाऊद बाग में ऐसी पुरानी बल्लियां एवं लकडिय़ां मिलीत हैं जिसे यहां के दूकानदार खरीद लाते हैं। चूंकि यह लकड़ी बरसों से मौसम की मार खाकर सूख चुकी होती है, इससे फर्नीचर बनने के बाद उसके आकार-प्रकार में परिवर्तन नहीं आता। इसके अतिरिक्त उसकी नक्काशी में मेहनत भी कम लगती है। नई लकड़ी के मुकाबले उसमें ज्यादा बारीक काम संभव है।
इन्हीं दुकानों में काम करने वाले एक बेहतरीन कारीगर हैं नौशाद अहमद। अन्य मालिकों और कारीगरों की तरह वे भी सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) के हैं। वे बताते हैं कि यहां नक्काशीदार सोफा सेट की फ्रेम 5000-6000 रूपए तक, ड्रेसिंग टेबल (जिसे हाफ टेबल भी कहते हैं) 4500 रूपए तक, आलमारी की मोल्डिंग 1000 से 2000 रूपए तक मिलती हैं। आइने के नक्काशीदार फ्रेम भी उपलब्ध हैं जो स्वतंत्र रूप से लग सकते हैं और ड्रेसिंग टेबल पर तो लगते ही हैं। डिजाइनों के अनुसार कीमत में घट-बढ़ होती है।
नौशाद अहमद के अनुसार पुराने उस्ताद और 'पेट की आगÓ उन्हें कारीगर बनाती है। मुंबई के मुकाबले सहारनपुर में लकड़ी व मजदूरी सस्ती होने तथा प्रतिस्पर्धा ज्यादा होने के कारण यह फर्नीचर वहां और भी सस्ता मिलता है। एक फर्नीचर तैयार होने में 10 से 30 दिन तक लग जाते हैं। यह समय डिजाइन पर निर्भर करता है। लगभग 2 माह की मेहनत करने के बाद ही कलाकार तैयार हो पाते हैं। आप सोच सकते हैं कि अकेले फ्रेम खरीदकर आप बाकी काम कराने के लिए कहां-कहां घूमेंगे? तो इन दुकानदारों के पास गद्दी-कपड़े चढ़ाने वाले, पॉलिश करने वाले भी काम की तलाश में चक्कर मारते रहते हैं। इन्हीं के पास अन्य काम कराने वालों के नाम-पते मौजूद होते हैं जो आपका काम आसान करा देते हैं। थोड़ी सी जहमत उठाकर आप अपने घर को प्राचीन भव्यता व गरिमा दे सकते हैं, वह भी आज के बाजार को देखते हुए तुलनात्मक रूप से काफी कम कीमत पर।

नवभारत, मुंबई, सोमवार 8 मई 2000

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