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अज्ञेय की कहानियों का पारिस्थितिकी पाठ

जिज्ञास, शरणदाता, हारिति और रोज के विशेष संदर्भ में - मनमीत कौर
हमारी पृथ्वी एक महान पारिस्थितिक तंत्र है जिसमें समस्त जीव समुदाय एक-दूसरे पर आश्रित हैं। प्रकृति में सभी जीव जरूरी हैं तथा पर्यावरण पर सभी का हक है। सभी जीवों में मानव चूँकि सबसे अधिक विकसित और सोचने-विचारने वाले दिमाग का प्राणी है तथा पर्यावरण का उपभोक्ता भी है, अत: इसके भले-बुरे का जिम्मा भी उसी का है। यह पारिस्थितिक चिंतन वर्तमान समय का सबसे ज्वलंत मुद्दा है। प्रस्तुत आलेख में पारिस्थितिकी के संदर्भ में अज्ञेय की कुछ कहानियों पर विचार किया जा रहा है।

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गुरू नानक के काव्य में प्रकृति-चित्रण - मनमीत कौर

गुरू नानक सिक्खों के आदि गुरू हैं। उन्हें कोई गुरू नानक, कोई बाबा नानक, कोई नानक शाह, कोई गुरू नानक देव, कोई नानक पातशाह और कोई नानक साहब कहते हैं। भारतीय धर्म-संस्थापकों एवं समाज-सुधारकों में इनका गौरवपूर्ण स्थान है। मध्ययुग के संत कवियों में उनकी विशिष्ट एवं निराली धर्म-परंपरा रही है। वह उस धर्म के संस्थापक हैं जिसके आंतरिक पक्ष में विवेक, वैराग्य, भक्ति, ज्ञान, योग, तितिक्षा एवं आत्म-समर्पण की भावना निहित है और बाह्य पक्ष में सदाचार, संयम, एकता, भ्रातृभाव आदि पिरोए हुए हैं। गुरू नानक मध्ययुग के मौलिक चिंतक, क्रांतिकारी सुधारक, अद्वितीय युग-निर्माता, महान् देशभक्त, दीन-दुखियों के परम हितै

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