हिन्दी अध्ययन-अध्यापन की समस्यायें

वर्तमान में दुनिया वैश्वीकरण की चकाचौंध से दमक रही है। उसी चकाचौंध में मीडिया की ताकत और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नाम पर एक प्रकार से हम सांस्कृतिक एवं भाषायी हमलों से घिरते जा रहे हैं। यह कहते हुए हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि इन परिस्थितियों में हम कभी खुद को बचाते हुए रक्षात्मक मुद्रा में तो कभी उदारवादी विचारधारा को अपनाते हुए साहसिक मुद्रा में भी नजर आते हैं। सच क्या है? वस्तुस्थिति को निरपेक्ष भाव से समझना और बिना किसी लाग-लपेट के यथार्थ को स्वीकारना। यथार्थ का परिचय भी या तो अनुभवों से होता है, या जीवन अध्ययन से।

अनुभव प्रमुखत: प्रत्यक्षीकरण से संभाव्य है, जिसका दायरा बहुत सीमित है। अध्ययन की कोई सीमा नहीं होता, वह असीमित है।

बात हिंदी अध्ययन और अध्यापन की है। सांस्कृति हमलों के इस दौर में भाषायी हमले भी हो रहे हैं। गाहे-बगाहें अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा का राजमुकुट धारण करके घूम रही है। पहले भी दुनियाँ के अधिकांश देशों में अंग्रेजों की हुकूमत थी। आज अंग्रेजी भाषा की हुकूमत चल रही है। हिंदी तो हिंदुस्तान में भी बगलें झांकती नजर आ रही है। देश को स्वतंत्र हुए आधी सदी से बी अधिक समय हो गया किंतु राष्ट्रभाषा पर तर्क-कुतर्क अब भी जारी है।

सच पूछिए तो यह आम जनता और शासकों के बीच एक ईमानदार बेबाकसंवाद की कमी का ही दुष्परिणाम है। देश में एक ओर वे मुट्ठी भर लोग हैं, जो सत्ता, पूंजी और पद की प्रतिष्ठा में दमक रहे हैं। इनमें से अधिकांश का असली मोह और आस्था तो अंग्रेजी से ही है। वे हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति की महानता के पक्ष में बड़े-बड़े पर्चे लिखते-पढ़ते भी नजर आते हैं। यह भारतीयों के प्रति निहायत घिनौने दर्जे का दोगलापन है। अंग्रेजी के प्रति इस भक्ति ने हमें आज भी परोक्ष रूप से गुलाम बनाए रखा है। इस सच्चाई को स्वीकार न करने की कोशिश में, तथा हिंदी-भक्त होने के पक्ष में हम कम से कम हिंदी दिवस तो मना ही लेते हैं। बस इस हिंदी पखवाड़े के दिनों को छोड़कर, शेष दिनों में हिंदी के अनेक अध्यापक भी अपने आपको अंग्रेजी में निपुण मानने में अधिक गर्व महसूस करते हैं।
- डॉ. मृणालिका ओझा

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