डॉ. विमल कुमार पाठक की गीत सृष्टि

डॉ. विमल कुमार पाठक गीतकाव्य के महान गायक है। गीतकाव्य के समस्त गुण उनके काव्य में विद्यमान है। डॉ. पाठक के गीतों में भावों की विशुद्धता और तीव्रता है। आत्मभिव्यक्ति, प्रकृति के प्रति रागात्मकता, संगीतात्मकता, भावप्रवणता, सहज अन्त प्रेरणा, राष्ट्रीय, सामाजिक चेतना आदि सभी विशेषताएं डॉ. पाठक के गीतों में उपलब्ध है। यही कारण है कि वे इतने समर्थ गीतकार बन सके हैं। डॉ. पाठक मूलत: गीतकार है। अत: उन्होंने हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी दोनों मे ंही समान गति से गीतों की रचना की है। लोक-जीवन और समाज के विविध प्रसंगों को बड़ी मधुरता से गीतों में ढालते रहे हैं।

Tags: 

समुच्चयी सामंजस्य के सृजनधर्मी - पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी

भारत की पावन धरती पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लेकर अपने सत्कार्यों से अमरता प्राप्त की है। उन महापुरुषों में कुछ वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ शामिल किए जा सकते हैं। बीसवीं सदी में जिन महापुरुषों ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की हमारी देशवासियों पर अमिट छाप छोड़ी है, उनमें पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का साहित्यिक व्यक्तित्व सदैव स्मरण किया जाएगा।

Tags: 

बस थोड़ी देर बाद

मेरे बेटे
जब छोटे थे तुम
मेरे हाथों को रहता
बहुत सारा काम
मिल नहीं पाता था
जरा भी आराम
तुम चाहते थे मैं
हर पल रहूँ तुम्हारे साथ
और मैं कहती
आती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद

1.
तुम्हारी आखें मुझे देखते ही
विहंस उठतीं
अंग-अंग चपल हो कहता
माँ लो सीने से लगा
पर मैं तुम्हें झूले में लिटा
कहती हूँ बेटा
बस थोड़ी देर बाद

Tags: 

मैं बस्तर हूँ

समृद्ध, संपन्न
लेकिन निर्धन
$खून से तर हूँ
मैं बस्तर हूँ

मैं मुर्गी हूँ
जो सोने का अण्डा
देती है
और अण्डे को
बारूद पर सेती है
मैं गुमनाम लोगों का
घर हूँ
अब तो बन्द
हो गई रुलाई
एक तर$फ कुँआ
एक तर$फ खाई
एक तर$फ जवान
एक तर$फ हैवान
मौत के आगे

मैं मजबूर हूँ
सो बदतर हूँ
मैं बस्तर हूँ

मेरे नामा पर राजनीति
•िान्दगी हार गई
मौत जाती
अब समझ गये
चिमनियों की ऊँचाई
कितनी होती
मैं खौ$फ हूँ
मैं डर हूँ
मैं बस्तर हूँ

Tags: 

सभी चीजें खरीदी नहीं जाती - पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे

आप सौदागर हैं
कुछ भी $खरीद
सकते हैं
परन्तु
इतनी-सी बात
आपकी समझ में
नहीं आती
कि
दुनिया में सभी
ची•ों खरीदी
नहीं जाती

आप मँहगा पलंग
$खरीद सकते हैं
पर नींद नहीं
आप व्यन्जन
$खरीद सकते हैं
पर भूख नहीं
आप औरत
$खरीद सकते हैं
पर प्यार नहीं
आप चाटुकार
$खरीद सकते हैं
पर यार नहीं

मानता हूँ
पैसे में बहुत
ता$कत होती है
पर सभी ची•ों
बिकाऊ नहीं होती हैं

Tags: 

अंतर्नाद - नारायण प्रसाद ठाकुर

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748

आवरण सज्जा:कन्हैया साहू
प्रथम संस्करण : 2015
मूल्य : 150 रुपये
कॉपी राइट : लेखकाधिन
ISBN- 81-89244-02-7
BY :
Published by
Vaibhav Prakashan
Amin Para, Purani Basti
Raipur, Chhattisgarh  (India)
First Edition : 2015
Price: Rs.150

Tags: 

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य परंपरा डॉ. श्रीमती श्रद्धा चंद्राकर

लोकनाट्य के लिए कई शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जैसे-लोकनाट्य, जनपद नाटक, पारंपारिक नाटक, ट्रेडीशनल नाटक, आनुष्ठानिक आर्ट किंतु ये सब गढ़े हुए आधुनिक शब्द हैं। लोकनाटक का सीधा-सादा अर्थ है, वह लोगों के साथ रहा है। किसी विद्वान ने बहुत अच्छी बात कही है कि लोटनाटक का प्रारंभ नहीं होता और अंत नहीं होता। वह हमेशा लोगों के साथ रहा है और रहता रहेगा। जिस दिन वह लोगों के साथ नहीं रहेगा वह मर जायेगा, खत्म हो जाएगा। कुछ ऐसे लोकनाट्य हैं जो खत्म हो चुके हैं।

लोकनाट्य के पीछे कोई शास्त्रीय योजना नहीं होती, वह लोकमानस का प्रतिबिंब है।

Tags: 

देश को आजाद कराने की जद्दोजहद

पं. स्वराज्य प्रसाद द्विवेदी
मेरा बचपन उस जमाने से गुजरा जब देश के निवासी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मार्ददर्शन में तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र बाबू तथा सरदार पटेल जैसी अजीम हस्तियों की रहनुमाई में देश को आजाद कराने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। मेरा स्वयं का परिवार आजादी के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रुप से जुड़ा हुआ था अतएव मेरा यह सौभाग्य था कि मैं राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक स्तर की अनेक विभूतियों का सामीप्य प्राप्त कर सका। लेकिन इससे पहले उन दिनों की थोड़ी सी चर्चा जरुरी है।

Tags: 

Pages

Subscribe to Chhattisgarh Mitra RSS