October 22, 2026

FILM इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि…

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इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि यह वास्तव में वॉर मूवी नहीं, एंटी वॉर फिल्म है ! यह 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए सबसे युवा परम वीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित है। युद्ध की पृष्ठभूमि पर होने के बावजूद इसमें हिंसा, वीभत्स मारपीट, चमत्कारी बहादुरी नहीं दिखाई गई है।

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि इसे देखने के बाद सिनेमाघर से निकलते वक्त आप में हीन भावना आ सकती है कि कैसे हमारे सैनिकों ने कैसे-कैसे बलिदान किये हैं और हम देशवासी कैसे हैं जो इस देश को बर्बाद करने में तुले हैं – भ्रष्टाचार, बेईमानी, जातिवाद, भाई भतीजावाद कहाँ से हमारे खून में आ गया है? फिल्म में तो दुश्मन को सम्मान देते हुए दिखाया गया है जबकि हम तो अपने देशवासियों की लिंचिंग करने से बाज नहीं आते!

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि कहाँ तो हम अपने ही देश में एक दूसरे के खून के प्यासे हैं और इस फिल्म में हमारे जवान युद्ध के मैदान में भी एक दूसरे का सम्मान करते हैं ! फिल्म में हीरो टैंक लेकर पाकिस्तानी सीमा में घुसता है और उसे अटपटा यह लगता है कि दोनों देशों में कोई अंतर ही नहीं है। रिटायर्ड ब्रिगेडियर धर्मेंद्र पाकिस्तान के लाहौर जाते हैं तो वहां युवक एक प्रमुख चौराहे का नाम भगत सिंह के नाम पर करने के लिए आंदोलन करते हुए मिलते हैं ! भगत सिंह पर तो हमारा कॉपीराइट है ना?

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि इसमें जिंगोइज्म यानी आक्रामक राष्ट्रवाद है ही नहीं। इसमें उरी या फाइटर में दिखाए गए ‘हाऊ इज़ जोश’ जैसे डायलॉग्स और सीना ठोकते सीन हैं ही नहीं ! इस फिल्म में सैनिकों की बहादुरी का ओवर-ग्लोरिफिकेशन और इमोशनल मैनिपुलेशन नहीं है। इसमें जोर-शोर वाली देशभक्ति नहीं, बल्कि गहरा मानवीय और इमोशनल ड्रामा है !

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि यह भावुकतापूर्ण और हैरजअंगेज बहादुरी के दृश्यों से भरी है जो रौंगटे खड़े कर देंगे। इक्कीस फिल्म युद्ध की मानवीय कीमत, भाईचारा और माफ करने की सीख देती है। यह दिल को छूने वाली कहानी है, खासकर दूसरे हाफ और क्लाइमेक्स में इमोशंस पीक पर पहुंच जाते हैं। हमें तो वॉर फिल्म में इमोशन नहीं, डोले-शोले लेकर हैंडपंप उखाड़ता हीरो चाहिए! टैंक चलाता हीरो हमारे लिए बीपीएल टाइप है, हमारा हीरो तो वही है जो फाइटर प्लेन भी ऑटो रिक्शा जैसा उड़ाए, एक खुकरी से बीस-पच्चीस को मार डाले और मरे ही नहीं।

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि इसमें युद्ध के सीन्स रियलिस्टिक और इंटेंस हैं। वीएफएक्स और सिनेमेटोग्राफी फिल्म को विजुअली प्रभावशाली बनाते हैं, इसके एक्शन सीन वास्तविक हैं – हीरो अकेला ही पूरी आर्मी को नहीं हराता । हमें तो ऐसा हीरो चाहिए जो अकेला पूरी दुश्मन -फ़ौज का बैंड बजाकर आ जाये!

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि इसे बनाने में भाई भतीजावाद हुआ है ! अमिताभ बच्चन के नाती यानी श्वेता नंदा के छोरे को ही हीरो बना दिया और उसे देखकर आपको एमएस धोनी फिल्म के सुशांत सिंह राजपूत को याद आ सकती है ! अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया को हीरोइन बना दिया, नसीरुद्दीन शाह के छोरे विवान शाह और किरण खेर बेटे सिकंदर खेर को रोल दे दिया। जयदीप अहलावत को पाकिस्तान का फौजी और जहीन आदमी बता दिया ! धर्मेंद्र को उनकी अंतिम फिल्म में पाकिस्तान जाकर इमोशनल बता दिया जिसमें वे यह बोलना तो भूल ही गए – “कुत्ते -कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा!” जब धरम पाजी का छोरा सनी दो दो बार पाकिस्तान जाकर ग़दर मचा चुका, तो धरम जी तो उसके बाप हैं बाप!

इक्कीस फिल्म मत देखना क्योंकि इसमें “ये नया हिंदुस्तान है, ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी!”, “पाकिस्तान को दुनिया के नक़्शे से मिटा दूंगा”, “पूरी पाकिस्तानी फौज के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूँ”, “दूध मांगोगे तो खीर देंगे “, जैसे डायलॉग हैं ही नहीं ! इसकी जगह इसमें एक पात्र कहता है कि जब भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच होता है तब माहौल जंग का हो जाता है, तब दूसरा पात्र कहता है कि क्रिकेट की जंग में किसी की मौत नहीं होती! इस वॉर फिल्म में हीरो फौजी अफसर होकर भी बकरे की बलि ठीक से ले नहीं पाता, जबकि आजकल के हीरो तो एनीमल होते हैं!

… अगर इतना लिखने पर भी आपको फिल्म देखने जाना ही है तो भिया, जाने वालों को कौन रोक सका है?
~डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

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