March 6, 2026

लघुकथा डॉट कॉम का अभिमत

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(अंजू खरबन्दा की दृष्टि में )

जयप्रकाश मानस जी का नया लघुकथा-संग्रह ‘बची हुई हवा’ आधुनिक हिन्दी लघुकथा के परिदृश्य में एक ताज़ा, प्रखर और वैचारिक अभिव्यक्ति-सा उपस्थित होता है। यह संग्रह केवल लघुकथाओं का संकलन भर नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक-यथार्थ पर लेखक की पैनी दृष्टि, भाषिक सर्जना और गहरी संवेदना का समृद्ध दस्तावेज़ है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की भूमिका ‘स्वप्न और यथार्थ का शिलालेख’ संग्रह को दार्शनिक गहराई देती है। वे लघुकथाओं को मानव-अंतर की सतह पर उतरने वाली कलात्मक रेखाओं के रूप में देखते हैं, जो जीवन की दरारों को भी उजागर करती हैं और उम्मीद की रोशनी भी खोज लेती हैं। वे लिखते हैं- ‘सपाट वर्णन लघुकथा को सर्वाधिक कमजोर करते है, तो हर अख़बारी समाचार को उलट -पलटकर लघुकथा बना देना हास्यास्पद है।’

‘कथ्य को सपाटबयानी में प्रस्तुत न करके सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करना कठिन है। यह काठिन्य ही उसका सौंदर्य है।’

लेखकीय टिप्पणी ‘लघुकथा का निबंध’ में जयप्रकाश मानस स्वयं लघुकथा की प्रकृति, उसकी चुनौतियों और उसके समकालीन रूप पर विचार रखते हुए पाठक को अपनी सर्जना-दृष्टि से परिचित कराते हैं। एक बानगी देखिए –

‘लघुकथा जीवन के एकांश का साक्षात्कार है, किसी एक दृश्य की वीडियोग्राफी है, व्याधिग्रस्त किसी एक अंत:अंग का एक्सरे है। लघुकथा में अतिरिक्त कथा या प्रसंग का प्रवेश वर्जित है।’

‘सीमितता लघुकथाकार का अंकुश है। सीमित शब्दों की सुसंगति से पाठक लघुकथा जैसे बीच में ही पौधे और उसकी समूची हरीतिमा से पलावित हो सकता है।’

इन सुंदर टिप्पणियों से सजी यह पुस्तक केवल साहित्यिक संग्रह नहीं, बल्कि लघुकथा-शिल्प को समझने का एक मार्गदर्शक भी बन जाती है।

संग्रह की सबसे बड़ी खूबी है विषय, भाषा और प्रस्तुति; तीनों में नयापन है। इस संग्रह की लघुकथाएँ छोटे फलक में भी बड़े सवाल उठाती हैं, सामाजिक संवेदनाओं को उकेरकर सामने रखती हैं, साथ ही साथ पाठक के मन में देर तक गूँजने वाला प्रभाव छोड़ती हैं। लघुकथाओं में प्रतीकों और रूपकों का सधा हुआ प्रयोग किया गया है। कई कथाएँ व्यवस्था, भ्रष्टाचार, और सामाजिक तनाव की ओर संकेत करती हैं और साथ ही साथ बदलते सामाजिक–राजनीतिक वातावरण की विसंगतियों पर तीखी टिप्पणी करती हैं, जैसे ‘नींव’ में विकास के नाम पर मानवीय स्मृतियों का बेरहमी से मिटा दिया जाना।

शीर्षक इस संग्रह का अलग आकर्षण हैं। निराले, अर्थपूर्ण और एक ही क्षण में पाठक का ध्यान पकड़ लेने वाले। उदाहरणार्थ टूटन की पूजा, बेंच के नीचे की भाषा, जूते का दर्पण, दोहरी स्याही, कच्छप स्वप्न, कथा और कपट, लोकतंत्र की चिपचिपाहट, डिजिटल श्राद्ध, शिलालेख आदि जैसी लघुकथाओं के शीर्षक ही अपने भीतर संपूर्ण संवेदना समेटे हुए हैं। संग्रह का शीर्षक ‘बची हुई हवा’ उन छोटी-छोटी उम्मीदों, स्मृतियों और संवेदनाओं का रूपक है, जो परिस्थितियों के बीच भी मनुष्य को जीवित रखती हैं।

लेखक ने अपने कथानक उन छोटे-छोटे दृश्यों और अनुभवों से उठाए हैं, जो आम तौर पर अनदेखे रह जाते हैं; लेकिन जिनमें समाज की सबसे गहरी विडंबनाएँ छिपी होती हैं। प्रस्तुत लघुकथा संग्रह में मिलने वाले कुछ प्रमुख कथ्य हैं :-

भाषा और पहचान का संघर्ष, शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ, मानवीय संवेदना का ह्रास, संबंधों में छिपे असमंजस, टूटन, मन की पीड़ाएँ, तकनीक, आधुनिकता और बदलते संस्कारों के प्रश्न, आम आदमी का संघर्ष आदि।

संग्रह की कथाएँ न सिर्फ पढ़ने में सहज हैं; बल्कि अपने अर्थों में बहुस्तरीय हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। शिल्प और भाषा की बात की जाए, तो जयप्रकाश मानस जी की भाषा संवेदी, सीधी और प्रभावशाली है। वे नाटकीयता के बजाय सादगी से कटु सत्य कह देते हैं, संवाद कम होते हुए भी अर्थ अधिक रचते हैं, यही लघुकथा के शिल्प की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनकी भाषा में व्यंग्य की महीन धार है, भावनाओं की गरमाहट के साथ- साथ यथार्थ की कड़वाहट भी है। हर लघुकथा अलग रंग, अलग स्वर और अलग तापमान लिये हुए दिखलाई पड़ती है। यहाँ मैं कुछ लघुकथाओं पर बात करना चाहूँगी

‘टूटन की पूजा’-यह लघुकथा अपनी संक्षेपता में ही एक गहरी दार्शनिक बात कह जाती है। एक निर्जीव पत्थर को केंद्र में रखकर लेखक ने मानवीय मनोविज्ञान, आत्म-सम्मान, संघर्ष और विकास की अनिवार्य प्रक्रिया को बहुत सुंदर प्रतीकों में प्रस्तुत किया है। लेखक ने इस लघुकथा में पत्थर का मानवीकरण किया है। पत्थर का अपने टूटने, खरोंचने, चोट खाने और फिर भी पूजा योग्य बनने की बात करना! यह मनुष्य की अपनी यात्रा का रूपक है।

हम भी जब तक ‘घिसते’ नहीं, जब तक जीवन हमें तराशता नहीं!

“तुम्हारे चरणों में चंदन मेरे ऊपर पैरों के निशान!”

यह वाक्य पूरी लघुकथा का भाव-केन्द्र है।

पूजा की जाने वाली मूर्ति भी कभी पत्थर ही थी। घाव, चोटें, टूटन इन्हीं से वह ‘पूजनीय’ बनी। यह कथ्य बताता है कि जीवन में सम्मान उन्हीं को मिलता है, जो टूट कर, झुक कर, सह कर निखरते हैं। लघुकथा के माध्यम से लेखक यह संदेश बहुत सरल भाषा में दे देते है कि विकास और रूपांतरण हमेशा पीड़ा का प्रतिफल होते हैं।

जब पत्थर ने कहा

“अब मेरी बारी है।”

यह वाक्य स्वीकार करने की परिपक्वता दर्शाता है कि रचना और निखार का मार्ग कभी भी आसान नहीं…पर यही मार्ग व्यक्ति को महान बनाता है। संग्रह की यह पहली लघुकथा प्रतीकात्मक, प्रेरक और विचारोत्तेजक है। छोटी होते हुए भी इसमें जीवन-दर्शन का बड़ा संदेश है-“टूटन से डरो नहीं क्योंकि सृजन यहीं से शुरू होता है।”

‘बेंच के नीचे की भाषा’-यह लघुकथा शिक्षा, भाषा और पहचान के संघर्ष को बखूबी दर्शाती है। बच्चे की आँखों से दिखाया गया दर्द पाठक पर गहरा असर छोड़ता है। यदि बच्चे को उसकी भाषा से काट दिया जाए, तो हम उसे उसकी जड़ों को ही काट देते हैं। यह एक ऐसी रचना है जिसे हर शिक्षक, हर अभिभावक और हर नीति-निर्माता को पढ़ना चाहिए। यह लघुकथा बहुत छोटी है, लेकिन इसका प्रभाव बेहद गहरा है। लेखक ने भाषा, पहचान और आत्मसम्मान के प्रश्न को एक बच्चे की मासूम नज़र से दिखाया है और यहीं इसकी ताक़त है। लघुकथा पढ़कर मन में एक चुभन रह जाती है।

शिक्षक का कहना- “कक्षा में केवल अंग्रेज़ी बोली जाती है।”

यह वाक्य बताता है कि कैसे स्कूल भाषा-प्रभुत्व को आगे बढ़ाते हैं। यहाँ बच्चा दोषी नहीं; लेकिन उसे शर्मिंदा किया जाता है और वही शर्म एक बच्चे की आत्मा में सबसे गहरा घाव बनती है।

घर लौटते हुए वह देखता है- माँ द्वारा दी गई भाषा अब उसके हाथ में नहीं थी। वह ‘नालों में गिरे अधूरे होमवर्क की तरह’ बह चुकी थी। यह उपमा अद्भुत और भयावह दोनों है, जैसे आने वाली पीढ़ियाँ अपनी मातृभाषा से कटती जा रही हों। आख़िरी वाक्य में छिपा गहरा व्यंग्य मन को तार- तार कर देता है – अब भाषा बेंच के नीचे नहीं रोती; क्योंकि अब वह मर चुकी है।

‘जूते का दर्पण’- लघुकथा जूते की दुकान के दृश्य के माध्यम से समाज की कई परतों, कई वर्गों और उनके सपनों-संघर्षों का अद्भुत रूपक प्रस्तुत करती है। यह लघुकथा दिखाती है कि जूता यहाँ वस्तु मात्र नहीं; बल्कि स्थिति, इच्छा, अभाव, और जीवन-दृष्टि का दर्पण बन जाता है। यहाँ लेखक ने जीवन की वर्गीय असमानता, आकांक्षा और संघर्ष को बेहद प्रभावशाली ढंग से पकड़ा है। लघुकथा लंबी नहीं होती, गहरी होती है। और यह लघुकथा पाठक को भीतर तक छूकर अपने पीछे एक मीठा-सा दर्द और विचार छोड़ जाती है।

‘प्रश्न’ – एक ऐसी लघुकथा है, जो आज के शिक्षित युवा और पारंपरिक समाज के बीच खड़े द्वंद्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। विवाह की कुंडली देखते समय पंडित द्वारा ‘मंगल दोष’ बताना और उसके समाधान में एक लाख ग्यारह हज़ार के अनुष्ठान का सुझाव देना हमारे समाज की जड़ीभूत मान्यताओं का प्रतिबिंब है। लघुकथा यहाँ तब तीखा मोड़ लेती है, जब बेटी नासा के आँकड़े, ग्रहों की वैज्ञानिक स्थितियाँ और फैक्ट्स सामने रखती है। पंडित का असहज होना और पिता का पहली बार अपनी बेटी को नए नजरिए से देखना, कथा को अत्यंत संवेदनशील बनाता है।

सबसे अर्थपूर्ण वाक्य है-“नहीं पंडितजी, सिर्फ़ आपके एक लाख ग्यारह हज़ार पर सवाल उठाती हूँ।”

यह सिर्फ़ पंडित के कथन पर प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे शोषणकारी तंत्र पर एक तीखा पर विनम्र और तर्कशील प्रहार है।

‘नींव’ – लघुकथा पाठक को झकझोर देती है। यह याद दिलाती है कि विकास के बड़े बोर्डों के नीचे कितनी छोटी-छोटी ज़िंदगियाँ दबी पड़ी होती हैं। शुरुआत सुबह पाँच बजे बुलडोज़रों की गड़गड़ाहट से होती है। मुख्य पात्र विष्णु को शासकीय अधिकारी कागज़ दिखाते हैं जिन पर लिखा है- ‘अनधिकृत निर्माण’। विष्णु के हाथ काँप रहे हैं; लेकिन जिन चीजों की वह रक्षा करना चाहता है, वे किसी भूखंड की दीवारें नहीं ; बल्कि वे हैं बेटी की स्कूल फाइलें, पत्नी की चूड़ियाँ, बेटे का फर्स्ट डिवीजन सर्टिफ़िकेट, छह महीने बाद उसी जगह पर सरकारी बोर्ड लग जाता है-‘स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट – प्रगति का प्रतीक’

इस लघुकथा में गहरे प्रतीक प्रयोग किए गए है, टूटा फोटो फ्रेम = परिवार की टूटी स्मृतियाँ, बुलडोज़र = सत्ता का कठोर चेहरा, स्मार्ट सिटी का बोर्ड = चमकदार विकास की चकाचौंध में छिपा अमानवीय चेहरा, काँच के टुकड़े = विकास की कीमत पर बिखरी जिंदगियाँ।

यह लघुकथा सवाल उठाती है- यदि विकास की नींव मनुष्यों की टूटी तस्वीरों पर रखी जाए, तो वह नींव कितनी टिकाऊ है? मुझे लगता है जयप्रकाश मानस जी की यह रचना संग्रह की सबसे सशक्त, सबसे विचारोत्तेजक लघुकथाओं में से एक है।

‘नमक‘ लघुकथा में सत्ता और नैतिकता की टकराहट को अत्यन्त संक्षेप परन्तु तीव्र शैली में प्रस्तुत किया गया है। लघुकथा का केंद्र बिंदु एक छोटा-सा दृश्य है। मंत्रीजी का चमकता कारकेट, पॉलिश की हुई सफेद कुर्ती, नई सैंडल और गाड़ी की नंबर प्लेट पर उनका स्वर्णाक्षरी नाम। बाहरी चमक-दमक व्यवस्था की ऊँचाई का प्रतीक है। उसी पल प्रवेश करता है एक बिखरे दाढ़ी वाला, आँखों में आग लिए युवक “मेरिट लिस्ट में मेरा नाम था; लेकिन आपके साले के बेटे ने मेरी सीट खा ली!” यह वाक्य लघुकथा का विस्फोटक केन्द्र है।

उस युवक की शिकायत व्यवस्था के भ्रष्टतंत्र के विरुद्ध है। उसके शब्दों में न्याय की तड़प, अपमान की आग और हक छीने जाने का दर्द एक साथ बोलते हैं। कथा का असली मोड़ है ‘नमक’!

जब मंत्रीजी अपनी सफे़द कुर्ती देखते हैं, उन्हें लगता है “यह पेशाब नहीं, नमक का घोल है, जो उनके कपड़ों पर झर रहा है।”

यह बिंब अद्भुत है।

युवक का दर्द, उसका अपमान, उसकी आवाज़, मंत्रीजी ने भले ही न सुनी हो पर जो नमक उनके कपड़ों पर लगा, वह व्यवस्था की सड़न की साक्षी बन गया। अंतिम दृश्य बेहद प्रतीकात्मक है। गाड़ी चल रही है, नंबर प्लेट अब भी गीली है, सोने के अक्षर धुंधले हो रहे हैं। लघुकथा बेहद छोटी है, पर मुद्दा बड़ा: योग्यता बनाम रिश्तेदारी।

भाषा सटीक, दृश्य स्पष्ट, अंत तीखा। सत्ता की चकाचौंध और आम नागरिक की पीड़ा – दोनों एक ही फ्रेम में रखे गए हैं। इस एक क्षणिक घटना से व्यवस्था की पूरी विकृति उजागर हो जाती है।

लघुकथा ‘दो दोस्त’ एक अत्यंत रोचक रूपक है, जिसमें मनुष्य के भीतर सह-अस्तित्व रखने वाली दो प्रवृत्तियों साहस (गुरिल्ला) और भय (कायर ) का संघर्ष दिखाया गया है। लघुकथा का कथ्य सरल, पर अर्थ गहरा है :

हर व्यक्ति के भीतर दो स्वभाव बसते हैं। एक हमें जगाता है, चुनौती देता है “उठो! दुनिया को बदलना है।”

दूसरा हमें रोकता है “बैठ जाओ, अभी नहीं।”

धीरे-धीरे जब गुरिल्ला कमजोर पड़ता है और कायर खुश दिखता है, तो लगता है कि भीतर का साहस मर गया पर चरम मोड़ पर पता चलता है गुरिल्ला मरा नहीं था, वह कायर के भीतर समा गया था। अर्थ यह कि मनुष्य तब मजबूत होता है जब दोनों प्रवृत्तियाँ संतुलित हो जाएँ। न केवल आवेग-उत्साह, न केवल भय-समझदारी, बल्कि दोनों का सयुंक्त रूप ही असली शक्ति है।

अंतिम वाक्य कथा का सार है “असली जीत दोनों के बीच के संतुलन में है। साहस और समझदारी जब साथ चलें, तभी मनुष्य विजेता बनता है।

संग्रह की लघुकथाएँ पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि कुछ कथाओं में प्रतीक इतनी गहराई लिये हुए हैं कि शान्त मन से वाचन करने पर ही उनके अर्थ और स्तर तक तक पहुँचा जा सकता है। कुछ लघुकथाएँ इतनी सहज हैं कि वे बहुत जल्दी समाप्त हो जाती हैं। मेरे जैसा पाठक उनमें थोड़ा और ठहराव चाहता है।

लघुकथा संग्रह का समग्र मूल्यांकन करने पर आप पाएँगे कि ‘बची हुई हवा’ समकालीन हिन्दी लघुकथा को नए मुकाम पर ले जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है। यह उन सभी पाठकों के लिए आवश्यक है जो साहित्य में ताजगी और अर्थ की तलाश करते हैं, समाज के बदलते चेहरे को समझना चाहते हैं और कम शब्दों में गहरे प्रभाव की कला का आनंद लेना चाहते हैं। यह संग्रह पाठक को कहीं उदास करता है, कहीं उद्वेलित करता है तो कहीं चौंकाता है; लेकिन हर जगह समृद्ध करता है। निस्संदेह, यह आधुनिक लघुकथा-परंपरा में एक महत्वपूर्ण जोड़ है। नए विषय, नयी भाषा और ताज़ा संवेदनाओं से भरा यह संग्रह आज की लघुकथा-साहित्य यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होता है।

लघुकथा-जगत को ऐसी समृद्ध, संवेदनशील और सृजनात्मक कृति देने के लिए जयप्रकाश मानस जी को हार्दिक बधाई एवं अभिनंदन। उनकी लेखनी आगे भी इसी तरह नए प्रश्न उठाती रहे, नई संवेदनाओं को स्वर देती रहे और हिन्दी लघुकथा को नई राहें दिखाती रहे।

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