“ नेगल “
ऋषि गजपाल
पाठ – बाईस
विलास मनोहर ( मूल – मराठी )
हिंदी अनुवाद ( दि.वा.उर्ध्वरेषे )
नेशनल बुक ट्रस्ट , १९९० ( हिंदी प्रथम संस्करण )
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क्या धरती के किसी भाग में सिरजे गये किसी ऐसे निवास या आश्रम की कल्पना की जा सकती है जहाँ इंसानों वाले भरे-पूरे परिवार में आदमखोर सिंह , बाघ, तेंदुआ , अजगर , कुता , बिल्ली , स्याही , बन्दर , गोह , साँप , मगर , हिरन , हिरावल , भालू और मैना-कबूतर इत्यादि जंगली जानवर सब एक साथ परिवार के सदस्य की तरह हिल-मिल कर रहते हों | आज जब धर्म-जात-वर्ण में बुद्धिजीवी इन्सान ईर्ष्या-द्वेष के तेजाब में पूरी तरह नहा चुका हो तब बुद्धिहीन समझे जाने वाले जीव-जन्तु किस मानसिकता और सामाजिकता में निर्दोष जीवन जीने के लिए हामी भरते नजर आते हैं | महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में घने आदिवासी जंगल गाँव हेमलकसा में डाक्टर प्रकाश आमटे का निवास जिसकी बुनियाद उनके पिता मशहूर पर्यावरणविद और समाजसेवक भारत रत्न बाबा आमटे ने १९७५ में कुष्ठ निवारण आश्रम के रूप में रखी थी | अब उस जीवंत परम्परा को विस्तार देते हुए उनके यशस्वी पुत्र डाक्टर प्रकाश आमटे और उनकी बहू डाक्टर मंदा ने कायम रखा है और यह परम्परा अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होने के लिए प्रतिबद्ध है पूरी तरह गई | जिन्हें भी दूरदर्शन में चर्चित सांस्कृतिक स्तम्भ सुरभि के एक एपिसोड में रेणुका शहाणे और सिद्धार्थ काक द्वारा इन गतिविधियों को जीवंत देखने जानने का सौभग्य मिला होगा , वह रोमांचित हुए बिना रह ही नहीं सकता | फिल्मों में नकली दृश्यों के बने बनाये सेटों में किसी बच्चे या इन्सान को प्रशिक्षित खतरनाक जानवरों के बीच गुजर बसर करते देखना और बात है लेकिन सचमुच के नैसर्गिक जीव-जन्तु को नजदीक से देखना , स्पर्श करना और उनके साथ समय व्यतीत कितना रोमांचक होगा यह उस अद्भुत जगह पर जाकर देखने महसूस करने से ही पता चल पाता है |
हिंसक जीव-जन्तुओं से भरे और घोर नक्सल पीड़ित क्षेत्र में तमाम असुविधाओं के बीच उस समर्पित दाम्पत्य के साथ और भी कुछ हितैषी जुड़ जाते हैं | पूना के निवासी और इस किताब के लेखक विलास मनोहर , जो एक समय सफल शिकारी रह चुके थे , ने कई वर्षों तक उस आश्रम में रहकर इन्सान और जानवर के बीच के अद्भुत अहिंसक वातावरण को न सिर्फ करीब से देखा बल्कि उनके दुःख-सुख में हाथ बंटाकर सदैव कंधे पर लटकने वाली हत्यारी बंदूक को आजीवन तिलांजली दे दी | जानवरों और इंसानों के बीच के सम्बन्ध को रेखांकित करते हुए लेखक का आकलन है कि वास्तव में इंसान तो जानवरों से ज्यादा क्रूर और स्वार्थी होता है | जानवर जैसे जैसे बड़े होते हैं उनके शरीर के बाल खुरदुरे होते जाते हैं | मनुष्य के बड़े होने पर उसका मन खुरदुरा होता जाता है | जानवर का शरीर भारी होता जाता है तो मनुष्य के विचार जड़ होते चले जाते हैं | जानवर के नाख़ून तीखे होते हैं तो मनुष्य की जबान जहरीली | मनुष्य की बातों से भले ही शरीर जख्मी न हो लेकिन मन पर लगाये जख्म सदा हरे रहते हैं |
मादा तेंदुआ को माड़िया आदिवासिओं की भाषा में नेगली कहा जाता है और उसके बच्चे को – नेगल | किसी शिकारी की करतूत से बच गए नेगली ने इसी आश्रम में एक शावक को जन्म दिया जिसने अपनी आँखें और पंजे इसी जगह खोले | जंगल से एकदम अलग घरेलू माहौल में उसने किसी को किसी का शिकार होते नहीं देखा और अपने आसपास दयालु ,ममतालु जीवों को हो देखा , महसूस किया | तभी तो वह घर के छोटे से सदस्य के साथ भी पारिवारिक सदस्य की तरह बर्ताव करने में ही नियति देख सुनकर बड़ा हुआ और एक नया संसार रचा | उसके जैसे अनेकों पीड़ित जीवों ने इस जगह अपना परिवार बनाया | एक दूसरे का साथ दिया लिया | क्या मजाल है कि किसी ने किसी पर कोई हमला करने की सोची हो , उलटे वह तो उसका सेवक बनकर हरदम हाजिर हुआ | हम अपने बच्चों को जानवरों से इस डर से दूर रखते हैं क्योंकि वे काटते हैं , उनके नाख़ून लगते हैं | यदि बच्चों में यह डर पैदा न किया जाए तो वे शेर के साथ भी बड़े आनंद औए बराबरी से खेल सकते हैं | बाघ जैसे जानवर को भी बच्चों के साथ बहुत संभल कर खेलते हुए देखा जा सकता है | डाक्टर प्रकाश की बेटी आरती भारी भरकम नेगल ( तेंदुआ ) की पीठ पर सवारी करती दिखती थी | मनुष्य के बच्चे और जानवरों का स्वभाव एक जैसा होता है | मेरे एक मित्र ने उस जगह का भ्रमण किया और बताया कि आज भी ये सब उसी तरह जीवंत और सच है |
कभी कभी बाघ और तेंदुए , गांवों में घुसकर आदिवासियों के जानवर मार देते हैं | इनमें इन जानवरों की गलती नहीं | जंगल काटकर मनुष्य दिन-प्रतिदिन जंगली जानवरों के इलाके पर हक जमाता जा रहा है | जंगली प्राणियों के नुकसान की पूर्ति वन विभाग स्वयं करता है | लेकिन वह धनराशि अपर्याप्त होती है और उसे लेने के लिए आवश्यक कार्यवाही और कानून इतने कष्टदायक और पेंचीदा होते हैं कि कभी किसी को उस धनराशि का भुगतान शायद ही हुआ हो | आदिवासी भी नुकसान की धनराशि पाने के झन्झट में पड़ने के बदले मारे हुए जानवर के शरीर में चूहामार जहर भर देता है | दूसरे दिन बचा हुआ शिकार खाने पर बाघ वहीँ तड़प कर मर जाता है | उसके खाल को दो-तीन हजार रूपये देकर ( सन १९८० में ) खरीदने वाले व्यापारियों की कमी नहीं है जबकि यही खाल विदेशों में और भी महंगे दामों में हाथों हाथ खरीद लिए जाते हैं |
आदिवासियों द्वारा सौंपे हुए या घायल अवस्था में पाए गए जीवों को आश्रम में लाकर ठीक घर जैसे वातावरण में पालने से वे स्वतः अपना हिंसक आचरण छोड़ देने में ही सहूलियत पाते हैं | जैसे हम बच्चों को एक नाम देकर प्यार से पुकारते हैं उसी तरह इन जीवों के भी नाम डाई जाने से वे अपने आपको सहज पाते हैं जैसे लंगूर का बच्चा ( लिम्बू ) , पिसुरी हिरन ( मेंटी ), मादा भालू ( रानी ) , नील गाय ( नीला ) , बंदर ( राजू ) , कुता ( नेली ) , कुतिया ( बवली ), तेंदुए शावक ( लूसी – बेन ), पामेरियन कुत्ते ( पिंकी – टिनी ), बायसन ( राजा ) इत्यादि | अपने नामों से पुकारे जाने पर वे अपना अस्तित्व पाते हैं | इस समर्पित परिवार के अद्वितीय कार्य की खूबी यह है कि ये सब जंगली जानवर इनके पास रहते हुए भी पूर्णतः प्राकृतिक वातावरण में ही फल फूल रहे हैं | इतना सब होने से प्रचार भी कुछ ऐसा हुआ कि कई लोग इस प्रकल्प में रह रहे जीवों पर जींवंत बनाकर शाबाशी बटोरने में पीछे नहीं रहे | फिर भी हमारी सरकारी व्यवस्थाओं की चर्चित निर्ममता , निस्वार्थ सेवा कर रहे इस परिवार को क़ानूनी दांवपेंच में उलझाने की संवेदनहीनता कहीं भी पीछे नहीं रही | जब अवसर मिला इस परिवार को किसी भी प्रकार की सहायता न देकर उलटे अपनों तथाकथित नियमों का हवाला देकर परशान ही किया |
एक सौ पैंतीस पेज के इस सचित्र किताब “ नेगल “ विलास मनोहर ने मराठी में लिखा था और बाद में इसका ह्निदी संस्करण अनुवादक उर्ध्वरेषे की मेहनत से आ पाया और हिंदी जगत के व्यापक संसार ने इस घोर नक्सल पीड़ित धुर आदिवासी क्षेत्र में कई वर्षों से चल रहे सफल प्रकल्प के बारे में जानने पढ़ने सुनने का अवसर पाया | वे कौन लोग हैं जो डाक्टर जैस ऊँची पढ़ाई कर के भी ऐसे निस्वार्थ , लोभ-रहित सेवा में सारा जीवन खपा देने में संकोच नहीं करते और भरसक अगली पीढ़ी को भी वही जज्बा सौंप देने में तत्पर रहते हैं | जिस जगह पर कई सालों से बिजली नहीं है और घर में केवल मिट्टी तेल से रोशन होने वाले ढिबरी, चिमनी या लालटेन भर की सुविधा हो और जानवरों को दिए जाने वाली दवाइयों को सुरक्षित रखने वाले फ्रिज भी मिट्टी तेल से चलता हो वहाँ सपरिवार ऐसे जीव-जन्तु के बीच सपरिवार सहज गुजर बसर करना और जी जान से सेवा करना सिर्फ कल्पना की ही बात है लेकिन यह सच है | मूल लेखक विलास मनोहर जो पुणे के रहने वाले जाने मने शिकारी रह चुके है , ने अपने परिवार सहित इस कार्यस्थल में अपने अमूल्य पच्चीस वर्ष दे दिए | लेकिन उन्हें भी कोई मलाल नहीं है बल्कि उन्होंने प्रकृति के मूल स्वभाव को आत्मसात करने का सौभग्य पाया , ऐसा इनका विचार है | अंत में लेखक इस अंश को उद्घृत कर किताब की समाप्ति खूबसूरती से करते हैं – नेगली ( मादा तेंदुआ ), राजा ( नर तेंदुआ ) और डेढ़ वर्ष का सिंह एक ही पिंजरे में बड़े आनंद से रहते हैं | खास बात यह है कि सिंह और मादा तेंदुआ का समागम हो रहा है और वह भी राजा तेंदुआ की उपस्थिति में |