नई किताब : लोहार्णव … लोह ज्ञान सागर
भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल दर्शन,अध्यात्म और साहित्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने विज्ञान,प्रौद्योगिकी और प्रयोगधर्मी ज्ञान के क्षेत्र में भी अद्भुत उपलब्धियाँ अर्जित कीं। ‘लोहार्णव’ ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है, जो प्राचीन भारत के लौह-विज्ञान, धातु-प्रौद्योगिकी और उससे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ द्वारा मूल संस्कृत पाठ के हिन्दी अनुवाद, सम्पादन और व्याख्या ने इस दुर्लभ ग्रन्थ को आधुनिक पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बना दिया है।
प्राचीन भारतीयों ने लोहे कई रूप और प्रकार खोज लिए थे। मिट्टी और पत्थर के बाद लोहे का मिलना मानव सभ्यता में किसी क्रांति की मशाल से कम नहीं। कठिन कर्म ही लोह कहे जाने लगे। लोह की लकीर से लोहपथ गामिनी तक विकास का आधार लोहा। और, संकल्प के धनी लौह पुरुष या लौह स्त्री कहलाए।जहाँ लोहा, वहाँ लोहपुर, लुहारिया, अयसवाल, लोहार्गल! लौहकर्मी लुहार, लवार या लोहार। ग्रहों में शनि को लोहासन दिया गया और ऐसे लोह न्याय के बदले विक्रम पर शनि सवार हो गए। जातक के जन्मकालिक पायों में लोहपाया असरकारी रहा तो घुड़सवारों के लिए रकाब!
अयस्क से लोहा पाने लिए गलन भट्टियाँ तैयार हुईं। लोहारों ने लोहे से उपकरण और आयुध ही नहीं बनाए गए आयुधों की श्रृंखलाएं खड़ी की गईं। लोहा तलवार का पर्याय बना। काष्ठ और पाषाण के स्तंभ से आगे लौह स्तंभ बनना सामान्य घटना नहीं थी और उसमें भी जंग रहित लौहा बनाना यानी क्षरण के पर्याय काल को जितना।
उसके भस्म से औषधियाँ भी बनाई गईं। लोहे में जंग लगने के आधार पर वर्षा का काल निकट जाना गया।लौह धातु भौतिक ही नहीं, रसायन का अंग बना। उसके स्पर्श से कीटदंश दोष दूर किया जाने लगा तो लौह धोवन और देह पर वारण से व्याधियों का निवारण भी हुआ। ये उपाय आज तक प्रचलन में है।
लोहे की खोज समाज के लिए असाधारण रही । लोग तब लोहे के प्रचार के लिए गाँव – गाँव गाड़ियाँ लेकर जाने लगे। ‘लोहा लेना ‘ कहावत क्या कहती है ? खेती और रणनीति की क्रांति के मूल में लोहा था। भूमि ही नहीं, आकाशीय उल्का पिण्डों से भी लोहा खोजा गया।पहली बार संस्कृत का महत्वपूर्ण लौहशास्त्र अनुवाद और संदर्भ सहित विवेचित रूप में सामने आया है …
‘लोहार्णव’ वास्तव में अपने नाम के अनुरूप लौह-ज्ञान का एक अथाह सागर है।इसमें भारतीय विज्ञान की प्राचीन उपलब्धियों का अद्भुत वैभव है।यह पुस्तक इतिहास, विज्ञान, आयुर्वेद, धातु-विज्ञान और भारतीय ज्ञान-परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी और संग्रहणीय है।
लोहार्णव को पढ़ते – पढ़ते… पारुल तोमर
इंडोलॉजी के अग्रणी प्रकाशक परिमल पब्लिकेशन ( दिल्ली – अहमदाबाद) द्वारा हाल ही इसका प्रकाशन हुआ है।शेष बात फिर…