सामान्य दिन व्हाया वही पुरानी चाय
[ जयप्रकाश मानस ]
सुबह उठा तो दरवाज़े पर
एक चींटी मरी पड़ी थी।
उसे उठाया नहीं
क्योंकि दफ़नाने की जगह नहीं थी।
चाय की चुस्की ली
तो वही पुरानी चाय
जिसमें चीनी कम थी
और उदासी ज़्यादा।
रास्ते में एक आदमी मिला
उसने पूछा – “कहाँ जा रहे हो?”
मैं चुप रहा
क्योंकि जवाब नहीं था।
शाम को बारिश हुई
घर की छत टपकी
एक बाल्टी रख दी
फिर सोचा—
“कल सुधार लेंगे।”
कल भी वही होगा
चींटी, चाय, बारिश, छत।
और मैं?
मैं भी वही रहूँगा
बस थोड़ा और टूटा हुआ।
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[फ़ोटो : श्रीलंका के किसी चाय बागान में तीन भाई बहन यानी कुणाल, किरण और मुमताज ]